मेरी भावना शुद्ध है

मैं अच्छा आदमी हूँ और मेरी भावना शुद्ध है ।

मैं उस तरह के अच्छे लोगोंमें हूँ जो जानते हैं कि बुराई क्या है और वह क्या है जो पुरुषों कोऔर स्त्रियों और बच्चों को भी-जो सब जन्म से अच्छे ही पैदा होते हैंलेकिन जो उन्हें बुरी परिस्थितियों के कारण बुरा बना देता है।

मैं असहिष्णुनहीं हूँ।

न मैं वैसा शुद्धतावादी हूँ जो ऐसे लोगों के खिलाफ़ फ़ैसले देताफिरूँ! जो बुरे दिनों का सामना करने के कारण बुराई का सहारा लेने केलिए विवश हो जाते हैं।

मैंने समाजशास्त्र की कई किताबें पढ़ी हैं जिनमें कहा गया है किअपराध करने के कारण बहुत ज़्यादा जटिल हैंऔर उन्हें आसानी से अलग-अलग करके न फ़ैसले दिये जा सकते हैं न सज़ा दी जा सकतीहै।

सच्चाई तो यह है कि मैं उस विचारधाराको मानता हूँ जिसके अनुसार हर अपराध समाज के खिलाफ़ टिप्पणी हैऔर जब-जब कोई आदमी या औरत फॉँसी पर चढ़ती है या जेल जाती हैतो हर बार यह समाज की विफलता का सूचक होती है।

मैं फ़ैसले नहींदेता।

मैं जानता हूँ कि ईश्वर के उपाय अनन्त हैं और हम मनुष्यों कोउन्हें उह्ण्डता से नहीं बल्कि नम्नता से समझने का प्रयास करना चाहिये।

अपने बारे में मेरा यह विवरण पढ़कर बहुत से लोग यह सोचेंगे किमैं हमेशा दूसरों को उपदेश देनेवाला दम्भी हूँ जो हर वक्‍त यह करो औरयह मत करो कहता नज़र आता है।

लेकिन यह बात नहीं है।

यद्यपि मैंहमेशा मुस्कुराता रहता हूँ लेकिन इसका कारण यह नहीं है कि मैं अपनेको दूसरों से श्रेष्ठ समझता हूँ बल्कि यह है कि चेहरा भावहीन बनाये रहनेसे अच्छा मुस्कुराते रहना है।

और मैं इसलिए भी बर्दाश्त के काबिल हूँ क्योंकिमैं बुरा करने वालों के ऊपर भी फ़ैसले नहीं देता बल्कि उन लोगों से भीबचा लेता हूँ जो ऐसे फ़ैसले देते रहते हैं।

जैसा मैं पहले ही कह चुका हूँ ईश्वरके ढंग अनन्त हैं; इसलिए किसी को यह कहने वाला कि उसने अच्छा किया याबुरा मैं कौन होता हूँ ?

लेकिन इससे लोग यह भी सोच सकते हैं कि मैं आरामतलब आलोचकहूँ जो दूसरों के गुण-दोष तो निकालने से नहीं चूकते पर खुद कभी कुछ व्यावहारिककाम नहीं करते।

लेकिन यह भी सही नहीं है।

मैं अपने साधारण ढंग से बहुतकुछ करता रहता हूँ।

अगर सड़क पर लोगों को लड़ते-झगड़ते देखता हूँ तो उन्हेंसमझाने के लिए रुक जाता हूँ।

जब मैं किसी ताँगे की सवारी करता हूँ तो घोड़ेको चाबुक नहीं मारने देता-और ताँगेवाले को डॉटता भी नहीं हूँ क्योंकि पता नहींकिन घरेलू परेशानियों के कारण वह अपना गुस्सा चाबुक चलाकर निकाल रहाहै।

जहाँ तक चोरी का सवाल है मैं जानता हूँ कि मेरे नौकर चोरी करते हैं।

कईदफ़ा ये छोटी-छोटी चोरियाँ होती हैं जैसे मेरी छ्विस्की की बोतल से एक-दो घूँटपी लेना और उसकी जगह पानी डालकर उसे पूरा कर देना।

कई दफ़ा मेरे पर्ससे पैसे निकाल लिये जाते हैं क्योंकि वे सोचते हैं कि कितने पैसे पर्स में हैं इसकामुझे पता नहीं होगा और एक-दो रुपये निकाल लेने से कुछ पता भी नहीं चलेगा ।

लेकिन मैं चतुराई से इसका उपाय कर लेता हूँ जैसे खुद उसे हिक्की का पैग देकरया नौकर का वेतन बढ़ाकर या उसकी बीवी या बच्चे को अलग से एकाध रुपयादेकर कि “तुम्हारा पति-या पिता-ज़्यादा नहीं कमाता इसलिए तुम यह खर्च करो /इस तरह मैं न्याय की कोशिश करता रहता हूँ और रात को चैन की नींद सोताहूँ।

अपने बारे में यह सब मैं इसलिए बता रहा हूँ कि इसके बिना आप मेरीयह कहानी जो एक चोर की है और जिसे मैं अब बताने जा रहा हूँ समझ नहींसकेंगे।

कुछ दिन पहले ही कलकत्ता में यह घटना हुई। अगर आप कलकत्ता केबारे में ज़्यादा नहीं जानते तो मैं उसे भी बताये देता हूँ क्योंकि कहानी में इसकाभी महत्त्व है।

यह बड़ा शहर है-दुनिया के सबसे बड़े शहरों में एक यहाँ चालीसलाख लोग बहुत थोड़ी जगह में घुसे-बसे रहते हैं।

यहाँ बहुत ज़्यादा भीड़-भाड़ हैगंदगी है और भिखारी हैं।

यहाँ क्रूरता भी ज़्यादा है क्योंकि यहाँ के रहने वाले कष्टसहने के अभ्यस्त हो गये हैं।

यहाँ हरेक आदमी अपने पड़ोसी के खिलाफ़ रहताहै क्योंकि यहाँ पैसा ज़्यादा नहीं है और उन लोगों की संख्या बहुत ज़्यादा है जिन्हेंइसकी ज़रूरत है इसलिए भिखारियों के अलावा रंडियाँ और फुटपाथों पर गुज़र-बसरकरने वाले-जो हर गरीब शहर में होते हैं-बहुत ज़्यादा हैं और चालबाज़ों जेबकतरोंऔर साधारण चोरों की भी कमी नहीं है।

यह घटना एक गर्मी की शाम के वक्‍त हुई जब ज़्यादातर लोग आराम कररहे थे।

पैसेवाले अपने ठंडे किये गये कमरों में और गरीब छायादार फुटपाथों परया पेड़ों की छाँह में ।

मुझे दिन में सोना पसन्द नहीं है इसलिए मैं शहर में घूम-फिररहा था। मैं एक फुटपाथ पर चल रहा था जो ट्राम की पटरियों और सड़क केबीच बना हुआ था।

एक तरफ़ चौरंघी की सजी-धजी दुकानें थीं और दूसरी तरफ़बड़ा मैदान जो इस महानगर का अकेला मैदान है। सड़क और मैदान खाली थे।

यहाँ आधी रात के समय जो रोशनी होती है वैसी ही इस समय दिन में भी थी।

न मोटरें न गाड़ियाँ न रिक्शे न राहगीर-बस सड़क पर बिछे तारकोल से उठतीगर्मी की चमक और सूखी हुई घास पर विशाल बरगदों की छाया में जगह-जगहलाशों की तरह लेटे बहुत से लोग। वहीं बहुत-सी टैक्सियाँ भी पार्क करके खड़ीथीं जिनके ड्राइवर खिड़कियों से बाहर पैर निकाले सीटों पर ही सो रहे थे।

अचानक एक पेड़ के नीचे शोर सुनाई दिया।

दो तगड़े सिख ड्राइवर बास्केटऔर खाकी निकर पहने एक छोटे से कद के बंगाली को पीट रहे थे। उनमें सेएक ने उसकी दोनों बाँहें पीछे से पकड़ी हुई थीं और दूसरा बायें हाथ से उसकेबाल पकड़कर दायें से उसे कस-कसकर मार रहा था जिससे उसे खून भी निकलनेलगा था-हर थप्पड़ के साथ वह गालियाँ भी बकता जाता था जिसमें सिख किसानमाहिर होते हैं।

“यह तेरी माँ के लिए…यह तेरी बहन को…यह बेटी को…औरयह…

अचानक सारा इलाक़ा जाग उठा।

खिड़कियाँ खुलने लगीं और लोग चमकमें आँखें मिचकाते हुए देखने लगे।

चारों तरफ़ से लोग दौड़कर और यह चिल्लातेहुए आने लगे कि इतना मत मारो…बन्द करो अब ! मैं भी उधर ही दौड़ा।

मैंसिख हूँ इसलिए कुछ लोग मेरी तरफ़ आकर मुझे रोकने के लिए कहने लगे।

उनका खयाल था कि मेरा उन पर ज़्यादा प्रभाव पड़ेगा।

सिख होते हुए भी मैं नलम्बा-चौड़ा और बड़ा हूँ और न हिम्मतवाला।

लेकिन किसी अच्छे उद्देश्य के लिएडरपोक आदमी में भी हिम्मत पैदा हो जाती है और सच कहूँ तो मैं उतना ज़्यादाडरपोक कभी नहीं हूँ।

आखिरकार सिख हूँ। मैं तेज़ी से आगे बढ़ा भीड़ का घेरातोड़कर भीतर पहुँचा और मारने वाले सिख का हवा में उठा हाथ कसकर पकड़लिया।

“इसे मारना बन्द करो । कया तुम इसे मार ही डालोगे ? मैं गुस्से से चिल्लाया।

अपने दूसरे हाथ से मैंने दूसरे सिख की जकड़ से बंगाली के बालों को छुड़ा लिया ।बेचारा बंगाली ज़मीन पर बैठ गया उसने मेरे पैर कसकर पकड़ लिये और अपनासिर मेरे घुटनों में घुसा दिया। इसके बाद वह चीख-चीखकर रोने लगा।

‘मुझे इन लोगों से बचा लो…भगवान के वास्ते…दोनों सिख मेरे दोनों तरफ़आ खड़े हुए। दोनों मुझसे एक-एक फुट ऊँचे थे। उनके बाल भी मुझसे ज़्यादाथे और देखने में भी खूँखार थे।

‘तुसी कौन हो जी ?

‘ममैं कोई नहीं हूँ लेकिन मैं तुम्हें इस ज़रा से आदमी को मारने नहीं दूँगा।तुम्हें शरम नहीं आती?” ‘शरम? एक ने मुँह टेढ़ा करके कहा। ‘तुसी जानदे होए कौन है ? “नहीं और जानना भी नहीं चाहता। लेकिन तुम्हें मारने नहीं दूँगा ।’

अच्छा ?

हाँ मैंने चिल्लाकर कहा।

बंगाली रोये जा रहा था। ‘मुझे बचा लो। बचा लो भगवान के…

“यह चोर है’ दूसरा सिख बोला “मेरी गाड़ी के पहिये के वाल्व चुरा रहाथा मैंने रंगे-हाथों पकड़ा है / उसने दो वाल्व जेब से निकालकर अपनी हथेली पररखे और सबको दिखाये फिर अपनी हथेली मेरी नाक के सामने लगा दी।

देखो ।

उसने फिर उस आदमी के बाल पकड़ लिये और मेरे घुटनों के बीच से उसकासिर खींचने लगा। “तुम ये नहीं चुरा रहे थे सुअर की औलाद? मैंने पिछले पहियेपर तुम्हारा हाथ नहीं पकड़ा था? इन्हें बता नहीं तो मैं तुम्हारी माँ को…’

‘मुझे बचाओ बचाओ भगवान के…” वह डर से काँप रहा था। उसके गालोंपर घाव हो गये थे और होंठों से खून टपक रहा था।

तुमने ये चीज़ें चुराई ?” अब मैंने भी उससे पूछा और सिख के हाथ से उसकासिर छुड़ा लिया। उसने फिर अपना सिर मेरे घुटनों में घुसेड़ो की कोशिश कीऔर रोकर बोला “मैंने नहीं चुराया। मुझे इनसे बचा लो बचा लो…”

दूसरे सिख ने उसे पीछे से लात मारी। ‘झूठे’ वह ज़ोर से चीखा। “दुनियाका सबसे बड़ा झूठा। मैंने अपनी आँखों से देखा ।’

दोनों ने उसे बाहर खींच लिया दो थप्पड़ मारे और उसके कपड़ों की तलाशीलेने लगे । उसकी जेबों से वाल्व ही नहीं गाड़ियों की और भी बहुत सी चीज़ें एक-एककरके निकलने लगीं। उन्होंने ये सब सबको दिखाई।

“अब समझ में आ रहा है त्वाडी ?

यह प्रश्न मेरे लिए था। लेकिन बंगाली फिर मेरे पैरों में छिपने की कोशिशकरता रहा और चीखता रहा।

‘तुमने यह चोरी क्‍यों की ?’ मैंने पूछा ‘मैं भूखा था। तीन दिन से कुछ खानेको नहीं मिला था ।

‘झूठ बकता है’ एक सिख फिर चिल्लाया। ‘पहले कहता है कि मैंने नहींचुराये अब कहता है तीन दिन से कुछ नहीं खाया। क्या यह तीन दिन का भूखालगता है ज़रा देखिये ?”

एक बार फिर उसे दर्शकों के सामने पेश किया गया। वह भूखा तो नहींलगता धा-लेकिन तीन दिन में किसी की हड्डियाँ तो नहीं निकल आतीं। औरतीन दिन की भूख से आदमी क्‍या हो जाता है यह कौन बता सकता है ?

“आपका जो नुकसान हुआ है उसे मैं भर दूँगा’ मैंने अन्त में घोषणा कीऔर गर्व से ऊपर देखा।

“हमें आप का पैसा नहीं चाहिये’ ड्राइवर ने कहा ‘यह चोर है और झूठाभी है। हम इसे पुलिस में देने जा रहे हैं। तब इसे चोरी करने का अंजाम पताचलेगा ।’

दर्शकों को यह बात सही लगी। “आजकल चोरियाँ बहुत बढ़ गई हैं औरजब तक इन्हें सख्त सज़ा नहीं दी जाती शहर में शान्ति नहीं होगी / यह जैसेएक चुनौती थी । यह आदमी चोर था । शायद यह पाकिस्तान से आये लाखों शरणार्थियोंमें से एक हो जो पेट भरने के लिए शहरभर में घूमते-फिरते हैं। शायद इस आदमीकी बीवी और बच्चे भी हों जो अगर यह जेल चला गया तो भूखे मरने लगेंगे।

‘भाइयो मेरी बात सुनो मैंने लोगों से कहा ‘यपह आदमी चोर है और झूठाभी है। लेकिन अब इसे काफ़ी सज़ा मिल चुकी है। अब इसे जेल क्‍यों भेज रहेहैं? इसके बीवी-बच्चों का क्‍या होगा ?

चोर ने मेरी बात की पुष्टि की। ‘हाँ’ वह ज़ोर से बोला ‘मेरी बीवी औरतीन बच्चे भूखे मर जायेंगे। मैंने ऐसा काम पहले कभी नहीं किया। मेरे बच्चे भूखेमर जायेंगे। इस दफ़ा माफ़ कर दीजिए फिर कभी नहीं चुराऊँगा ।’

“यह झूठ बोल रहा है’ दर्शकों में से एक आदमी बाहर निकलकर कहनेलगा। ‘मैंने इसे इसी मैदान में कुछ महीने पहले चोरी के लिए गिरफ़्तार कियेजाते देखा है। तुम पहले नहीं पकड़े गये थे ?”

उसने फिर मेरे पैर पकड़ लिये और पहले से ज़्यादा ज़ोर-ज़ोर से चीखने-चिल्लानेलगा। उसके पास कोई जवाब नहीं था। मेरे पास भी नहीं था। वह पक्का चोरऔर झूठा दोनों ही था।

उसके शायद परिवार था ही नहीं अगर था भी तो वेउसके जेल आने-जाने के अभ्यस्त हो गये होंगे यह समाज के लिए खतरा है औरइसे कहीं बन्द करके रखना ही सही है।

लेकिन मैंने उसे और मारने-पीटने नहीं दिया। उन्होंने अपनी पगड़ियों सेउसके दोनों हाथ पीठ के पीछे बाँधे और उसे पुलिस स्टेशन ले गये। मैं उसकीचीख-पुकार सुनता रहा। वे नुक्कड़ से आगे बढ़ गये तो आवाज़ बन्द हो गई।मैंने अपना कर्तव्य कर दिया था और मेरी भावना शुद्ध थी। मैंने अपने दिमागसे यह घटना निकालने की कोशिश की।

हो सकता है कि उसकी कोई बीवी भी हो जो किसी पुल के नीचे भिखारियोंके साथ रहती हो? नहीं! वह झूठ बोलता था और उसकी किसी बात पर यकीननहीं किया जा सकता। मैंने अपना कर्तव्य निभा दिया था। मेरी अन्तरात्मा साफ़धी।

मैं होटल लौट आया और एक बड़ा पैग स्कॉच और सोडा लाने का ऑर्डरदिया। मेरे सामने भरे हुए गिलास में बर्फ़ तैरने लगी।

मुझे अच्छा लगने लगा।कहीं उसके बच्चे तो भूख से नहीं तड़प रहे ? मैंने एक और पैग मँगाया। उसकेबच्चे होंगे ही नहीं।

उस जैसे आदमी पर कैसे विश्वास किया जा सकता है? मैंनेअपना कर्तव्य कर दिया था। मेरी आत्मा साफ़ थी।

मैंने एक दो तीन और चार पैग लिये और 6 रुपये के बिल पर दस्तखतकिये। अब डिनर के लिए मेरी भूख खत्म हो गई थी और मैं एयर-कंडीशन्ड बेडरूममें सोने चला गया।

मुझे उससे यह पूछना चाहिये था कि उसके बीवी-बच्चे रहतेकहाँ हैं।

मैं उन्हें बचा सकता था और ये 6 रुपये उन्हीं को दे सकता था। लेकिनमैं एक चोर और झूठे के लिए इतना परेशान क्‍यों हो रहा हूँ ? मैंने अपना कर्तव्यकिया और मेरी आत्मा साफ़ है। अब मैं आराम से सो जाऊँगा।

मैंने रात के कपड़े पहने।

पैंट तह करके तकिये के नीचे रख दी जिससेउस पर इस्तरी हो जाये।

फिर मैंने अपने घुटनों पर नज़र डाली जहाँ बंगाली चिपटरहा था। वहाँ खून के निशान थे।

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