लाल टाई

दीवार में बनी अँगीठी के ऊपर की कॉर्निस पर कुहनियाँ टेके चिशतीआराम से खड़ा था।

उसने अपने पैर दोनों तरफ़ फैला रखे थे औरनीचे से उठकर आ रही गर्मी से अपनी पीठ सेक रहा था ।

हमें उसकी टाँगोंसे बनी V के भीतर जलती आग दिखाई दे रही थी।

हमारा यहाँ कोई महत्त्वनहीं था केबल चिश्ती ही यहाँ सब कुछ था।

वह खूब खा-पी चुका थाऔर मीठी बातें कर रहा था।

हम उसके इर्द-गिर्द घेरा बनाये खड़े थे-कुछप्रशंसा करते कुछ मज़ाक उड़ाते और कुछ ईर्ष्या से जलते हुए।

डिनर खत्म हो गया था लेकिन हमजैसे भारतीयों के अंग्रेज़ियत रँगे लोगों में जैसा रिवाज़ था लेडीज़ अभी भी डायनिंग रूम मेंजमा थीं।

लेकिन चिश्ती जहाँ भी जाता उसेरिवाज़ों को धता बतानी होती थी।

मेज़बानमहिला खुद चिश्ती की बाँह पर हाथ टिकायेखड़ी थीं और हँसी से लोट-पोट हो रही थीं।

चिश्ती हमेशा आकर्षण काकेन्द्र रहता था। वह हमेशा बोलता रहता था।

वह जब भी यहाँ आता एकक्षण भी शान्ति नहीं रहती थी और उनकी दूसरी पार्टियों में यह माहौल नहोना उन्हें बहुत खलता था ।

जैसे ही ज़रा-सी शान्ति होती चिश्ती की आवाज़सुनाई देने लगती “मैं बताऊँ उस दिन मेरे साथ क्या हुआ” या “आपने मेरायह एकदम नया मज़ाक सुना ?

मेरा खयाल है यह बहुत मजेदार है यहउनके पति के मुश्किल से बताये मज़ाकों से जिन्हें वे इस तरह शुरू करते“आज कोर्ट में एक मज़ेदार मामला पेश आया’-और जो हमेशा एक ही कहानीहोती थी-कहीं ज़्यादा मनोरंजक होता था।

मेज़बान महिला ने चारों तरफ़ देखते हुए कहा आपने चिश्ती कीशादी की परिभाषा सुनी है ?

मेरा खयाल है यह बहुत मज़ेदार है।’ हम सब इसे सुन चुके थे और जानते थे कि यह चिश्ती की नहीं है।

लेकिन इस बातका कोई महत्त्व नहीं था।

मेज़बान महिला ने चिश्ती को अपनी दोनों बाँहों में घेररखा था और उससे ज़िद कर रही थीं कि इसे बताये। चि३ती एहसान-सा करताहुआ मुस्कुराया और कहने लगा ‘हाँ यह सचमुच मज़ेदार है बहुत ही मज़ेदार ।.अच्छा देखता हूँ।

हाँ याद आया। शादी चूइंगगम की तरह है शुरू में मीठीअन्त में चिपचिपी।

हा हा!” चिश्ती अपने मज़ाकों पर भी खुद ही सबसे पहलेहँसता था। उसकी हँसी में साथ देने के लिए स्त्रियाँ भी ज़ोर-ज़ोर से हँसना शुरूकर देती थीं। कुछ पुरुष मुस्कुराते-बाक़ी चुप बैठे रहते।

चिश्ती पुरुषों की प्रतिक्रिया पर ध्यान नहीं देता था । ये सब स्त्रियों में उसकीलोकप्रियता से जलते-भुनते रहते थे। उसके ज़्यादातर साथी गंजे मोटे और सुस्तपड़ गये थे। चिश्ती हमेशा हँसता-खेलता रहता था।

उसने निरन्तर कसरत करतेरहकर अपने शरीर को बनाये रखा था।

अब वह चालीस का था लेकिन जब वहअट्टारह का था एक औरत ने उसे देखकर कहा था ‘किसी ग्रीक देवता की तरहनज़र आता है।

उसके बाद उसने अपना यह नक्शा बनाये रखने का जैसे प्रणही कर लिया।

तीस का होने पर उसे यह लड़ाई हारती हुई दिखाई दी : उसकामाथा जो पहले जितना होना चाहिये उतना चौड़ा था लेकिन अब वह बढ़ता हीचला जा रहा था।

उसके चौड़े सीने के नीचे अब पेट बढ़ता दिखाई देने लगा था।और पहले का सपाट पेट भी फूलने लगा था जिसे अपनी जगह रखने के लिएचिश्ती पेट की पेटी कसकर बाँधने लगा था।

चेहरा ही चिश्ती की अकेली हेलेनी निशानी नहीं था।

यह उस अंग काभी सवाल था जिसे ग्रीक मूर्तियों में ठक दिया जाता है। इस क्षेत्र में चिश्ती कीउपलब्धियाँ रहस्य ही बनी थीं और यह भी ज़ाहिर नहीं था कि पत्ती के नीचे क्‍याऔर कैसा है।

उसके जादुई सम्बन्धों की कहानियाँ पुरुषों में ईर्ष्या से लपेट करकही जातीं जिन्हें स्त्रियाँ बड़े ध्यान से सुनती थीं।

जैसे उसने किस तरह किसीमहिला का हाथ डिनर टेबिल के नीचे ही थाम लिया और यहीं से उनका प्रेम-सम्बन्धशुरू हो गया और उसने किस तरह पैसे वालों की बीवियों अफ़सरों की बीवियोंक्लर्कों की बीवियों बूढ़ी औरतों जवान लड़कियों कॉलेज और स्कूल की लड़कियोंको भी फँंसाया था और उनके साथ ऐश की थी ।

कुछ लोग कहते थे कि ये कहानियाँपूरी तरह सही नहीं हैं और बढ़ा-चढ़ाकर कही जाती हैं।

लेकिन चिश्ती को पार्टियोंमें जो देख लेता वह इन पर विश्वास करने लगता था।

चिश्ती से जब इस बारेमें पूछताछ की जाती तो वह कुछ इस तरह नज़र डालता मानो कह रहा हो ‘और

महिलाएँ डायनिंग रूम से धीरे-धीरे निकलीं और पुरुष कॉफ़ी पीने बैठ गये।चिश्ती अब भी आग की तरफ़ पीठ करे खड़ा लोगों को देख रहा था। ‘मैं आपकोउस कहानी के बारे में बताऊँ जो मैंने अपने पिछले टूर में ही अनुभव की है।एकदम अविश्वसनीय। रेलवे स्टेशन पर जब वह आगे की गाड़ी का इन्तज़ार कररहा था तब यह औरत उसे मिली थी। यह टाई भी उसने मुझे दी थी !! यह कहकरउसने अब ज़रा सिकुड़ी हुई लाल टाई उठाकर दिखाई । उसके पति की हो सकतीहै। पता नहीं उसके सामने कया बहाना बनाया होगा । हा-हा !! हम सब भी ताज्जुबकरने लगे।

उस दिन चिश्ती को दिन में एक शहर का दौरा करने को कहा गया था। उसनेसवेरे की ट्रेन पकड़ी और एक फर्स्ट क्लास के डिब्बे में जा चढ़ा जहाँ वह अकेलाथा।

उसने अपनी अटैची मेज़ पर रख दी और शीशे के सामने खड़े होकर अपनेको देखने लगा। अपनी लाल टाई उतारकर कील पर टाँग दी। फिर करीने से काढ़ेहुए बालों पर हाथ फेरा । वह जानता था कि देखने में वह सुन्दर है। लेकिन उसकेभीतर हिम्मत की कमी क्‍यों है ?

कई बदसूरत आदमी जो हासिल कर चुके हैंवह उसे आज तक प्राप्त नहीं हुआ। औरतें उसके बारे में बातें करती हैं लेकिनआज तक वह एक को भी जीत नहीं पाया। कॉलेज के दिनों से ही वह अपनेपर्स में कंडोम रखकर निकलता था और सोचता था कि कभी-न-कभी तो इनकेउपयोग का अवसर आ ही जायेगा। उसने अपनी भीतरी जेब टटोली। हाँ उसमेंपर्स रखा है।

इसे रखना उसे अच्छा लगता था और वह अपने को मर्द महसूसकरता था। चिश्ती सीट पर बैठ गया और एक मैगज़ीन निकालकर पढ़ने लगा।ट्रेन स्टेशन से चली और कई छोटे स्टेशनों पर रुकती जहाँ गाँवों के लोगधक्का-मुक्की करते उसमें चढ़ने की कोशिश करते आगे बढ़ने लगी चिश्ती आरामसे अपने डिब्बे में अकेला बैठा उपेक्षा से यह सब तमाशा देखता रहा।

कुछ समयबाद एक जंक्शन स्टेशन पर उसकी ट्रेन एक और ट्रेन की बगल में आकर रुकीजो दूसरी दिशा में जा रही थी।

उसका अपना डिब्बा दूसरी ट्रेन के एक तीसरीक्लास के डिब्बे के सामने था । ट्रेन में खचाखच भीड़ थी। उसमें बैठे कई मुसाफिरखिड़कियों से मुँह निकालकर उसके डिब्बे में देखने लगे कि उसकी सीटें कितनीशानदार हैं बेंत की कुर्सियाँ पड़ी हैं और तीन पंखे चल रहे हैं-और उसमें एकसूटेड-बूटेड साहब आराम से लेटा बाहर देख रहा है।

लग रहा था जैसे वह अपनेघर में ही आराम कर रहा हो जहाँ उसकी टाई एक कील पर टँगी है दूसरी परकोट लटका है और मेज़ पर सामान रखा है।

चिश्ती अच्छे परिवार में पला थाऔर उसे इस तरह की ताक-झाँक पसन्द नहीं थी। वह खिड़की का शटर गिरानेके लिए उठा। इस क्रिया में उसने बाहर की तरफ़ भी एक नज़र डाली। उसकेसामनेवाले डिब्बे से लगा ज़नाना डिब्बा धा जिसमें भीड़ काफ़ी थी। खिड़की परएक औरत बैठी थी जो एकटक उसे ही देखे जा रही थी।

चिश्ती ने खिड़की काशटर नीचे गिरा दिया था और वह बन्द हो ही रही थी लेकिन इसे देखते ही उसनेशटर ऊपर उठाकर खिड़की फिर से खोल दी। फिर उसने अपनी बैठने की स्थितिबदली और खिड़की पर इस तरह आ बैठा कि औरतों को ज़्यादा साफ़ देख सके |यह औरत उसे पलक झपके बिना देखे जा रही थी ।

चिश्ती में उत्तेजना भरने लगी ।क्या यह उस तरह की…औरत थी ? ज़रूर होनी चाहिये । उसके बाल भी घुमा-घुमाकरकाढ़े हुए थे जिनमें चारों तरफ़ रंग-बिरंगी क्लिपें लगी थीं।

आँखों में सुरमा भीनज़र आ रहा था।

ओठों पर लाल लिपस्टिक थी। वह बराबर सुपारी चूसे जा रहीथी और यह नज़र! अब कोई शक नहीं रहा। चिश्ती यह सब देखकर परेशान होउठा।

फिर उसने सिगरेट निकाली और उसे पीने लगी। लेकिन उसका पीने काढंग दूसरों से एकदम अलग था। वह हाथ की मुट्ठी-सी बनाकर उसमें सिगरेट कसेहोंठों में लगाकर खींचकर धुआँ निकालती और फिर मुँह से बाहर छोड़ देती । फिर: उसने दोनों नथुनों से धुआँ छोड़ना शुरू कर दिया । अब तो उसे बिलकुल भी सन्देहनहीं रहा और उसने हिम्मत करके उसकी ओर देखा-इसमें कामना भी थी औरडर भी था। अगर वह उसकी अपनी ट्रेन में होती तो कैसा मज़ा आता! यह विचारआते ही उसका खून चेहरे में तेज़ी से दौड़ने लगा। वह उसे देखता बैठा रहा।

सामने खड़ी ट्रेन ने लम्बी सीटी दी और ट्रेन धीरे-धीरे आगे बढ़ने लगी।जनाना डिब्बा चिश्ती के सामने आने लगा।

चिश्ती का चेहरा गुलाबी हो उठा।

उसे लगा कि उसे कुछ करना चाहिये…कुछ ऐसा जो इस स्थिति के अनुरूप हो।वह औरत अब उसके बिलकुल सामने थी।

चिश्ती ने बड़ी हिम्मत करके औरसारा ज़ोर लगाकर उसकी तरफ़ देखा बायीं आँख बन्द की और वासना की नज़रउसकी ओर फेंकी और फिर अपनी सीट पर आराम से बैठ गया।

उसका दिलज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था और बदन निढाल हो गया था।

तभी सामने के प्लेटफार्म से चीखने-चिल्लाने की आवाज़ें आने लगीं जिससेचौंककर वह उठने लगा । ट्रेन के ब्रेक चीखकर खड़खड़ाये और कुछ गज़ आग बढ़कःवह रुक गई।

चिश्ती ने ज़नाना डिब्बे की तरफ़ देखा।

वह उसके डिब्बे से कुछ गज़ आगही रुक गया था। औरत ने उसकी तरफ़ नज़र डाली और फिर वह खिड़की सेगायब हो गई।

चिश्ती के मन में अचानक खयाल आया कि कहीं वह उसके डिब्बेमें तो नहीं आ रही है।

क्या वह उसे पिटवायेगी ?

हो सकता है वह वैसी औरतन हो…चिश्ती यह सोचकर तेजी से उठा और लेवेटरी में घुसकर दरवाज़ा भीतरसे बन्द कर लिया।

कुछ मिनट बाद चिश्ती को अपने डिब्बे का दरवाज़ा खुलने की आवाज़ सुनाईदी फिर लेवेटरी के बहुत पास पैरों की आवाज़ें सुनाई देने लगीं। चिश्ती ने साँसरोक ली और चुप होकर बैठ गया।

उसे लग रहा था कि बहुत समय बीत रहाहै। अन्त में गार्ड ने सीटी बजाई । चिश्ती को लोगों के बाहर निकलने और दरवाज़ाबन्द किये जाने की आवाज़ें सुनाई दीं ।एक और सीटी बजी-यह इंजन की धी-औरट्रेन ने चलना शुरू किया।

चिश्ती कमोड की सीट से उठा और लेवेटरी का दरवाज़ा ज़रा-सा खोलकरउसने बाहर झाँका।

डिब्बे में कोई नहीं था।

उसका कोट और अटैची गायब थे।

उसकी टाई अभी तक कील पर लटकी थी लेकिन उसके निचले छोर से थूक टपकरहा था। जो हो उसे यह देखकर धीरज बँधा । कोई औरत उसका पर्स उसमें रखीचीज़ों के साथ उठा ले गई थी।

“और चिश्ती ने पैंट की जेब में हाथ डाले-डाले कहा ‘वह मेरे लिए निशानी के तौर पर यह टाई छोड़ गई। अब चलिये महिलाओं के साथ हो लें ।

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