महल की दीवार

एक दिन खोजा राजमहल के सामने से गुजर रहा था।

उसने देखा किमंत्रियों की निगरानी में बहुत से मजदूर महल के अहाते की दीवार पहलेसे ज्यादा ऊंची बना रहे हैं।

यह देखकर उसे बड़ा ताज्जुब हुआ।

आगे बढ़कर उसने एक मंत्री से पूछ लिया “भाई! यह दीवार तो पहले से काफी ऊंची हे।

इसे ओर ऊंचा बनाने की क्‍या जरूरत है ?”

“तुम भी केसे मूर्ख हो खोजा। इतनी-सी बातभी नहीं समझते।”

मंत्री बोला “यह दीवार बाहर से आने वाले चोरों को रोकने के लिए चुराकर न ले जा सकें।

” यह सुनना था कि खोजा बनाई जा रही है जिससे कि वे राजमहल से सोना-चांदी-हीरे-मोतीपहले तो मंद-मंदमुस्कराया फिर थोड़ा खुलकर हंस पड़ा।

फिर भी उसका मन शांत नहीं हुआ तो जोर-जोर से हंसने लगा।

खोजा को हंसते-हंसते काफी देर हो गई लेकिनकिन उसकी हंसी थमने का नाम नहीं ले रही थी।

खोजा को हंसते देख वहां मौजूद मंत्रीऔर अफसर पहले तो इसी बात पर हैरान हुए कि खोजा इतनी-सी बातक्र हंस क्‍यों रहा है ?

फिर जब काफी देर तक हंसता ही रहा तो उन्हेंहंसी में अपनी बेइज्जती महसूस हुई।

खोजा तो चलो बाहरी आदमी था थोड़ी-बहुतउसकी साख भी थी बादशाह तक उसे पहचानता था इसलिए एक बारको उसकी हंसी को मंत्री और अफसर सहन कर सकते थे लेकिन जबमजदूर भी हंसने लगे तो उनका पारा सातवें आसमान पर जा पहुंचा।

वे खुद तो ख़ोजा को उसकी हंसी के लिए कोई सजा नहीं दे सकतेथे इसलिए उन्होंने खोजा को पकड़ा और उसे राजमहल के भीतरले चले।

अब आलम यह था कि आगे-आगे हंसता हुआ ख़ोजा चल रहाथा और उसे दोनों तरफ से पकड़े मंत्री और अफसर चल रहे थे।

उनसबके पीछे कुछ मजदूर भी लग लिए थे।

मंत्रियों ने राजदरबार मेंपहुंचकर सख्रोजा को बादशाह के सामने पेश किया और उस पर आरोपलगाया कि वह जोर-जोर से हंस कर मजदूरों का ध्यान उनके काम परसे हटा रहा था।

इसलिए सरकारी काम में अड्चन डालने के जुर्म मेंखोजा को कड़ी सजा दी जाए।

बादशाह ने खोजा से पूछा “खत्रोजा! क्या तुम्हें अपना जुर्म स्वीकारहै ?” खोजा ने कहा “नहीं जहांपनाह!

जुर्म मैं नहीं ये आपके मंत्री औरअफसर कर रहे हैं।

मैं तो इनकी मूर्खता पर हंस रहा था। यदि कोईसजा देनी जरूरी है तो वह सजा इन्हें दी जाए।”

बादशाह की समझ में नहीं आया कि खोजा ने उसके मंत्रियोंऔर अफसरों को कौन-सा जुर्म करते देख लिया है।

उधर मंत्रियों औरअफसरों की भी यही दशा थी। उन्हें भी यह नहीं पता था कि वेकौन-सा जुर्म कर रहे थे। यह तो राज कार्य था। इसमें भला जुर्म वालीबात कहां से आ गई ?

एकाएक बादशाह को लगा कि हो न हो खोजा ने इन्हें या तोदीवार बनाने वाले मसाले में मिलावट करते देख लिया है या फिरदीवार के लिए आई सामग्री में से कुछ सामग्री अपने घरों में ले जातेदेख लिया है या फिर इनके द्वारा की जा रही किसी लापरवाही कोदेख लिया है।

इनमें से दरअसल हुआ क्या है यह खुद खोजा से ही जानने केलिए बादशाह ने कहा “स्त्रोजा! हम जानते हैं कि न तो तुम झूठ बोलतेहो न किसी की परवाह करते हो।

हमेशा आम जनता की और हमारीरियासत की भलाई ही सोचते हो। इसलिए हम जानना चाहते हैं कितुमने हमारे राजकर्मचारियों को कौन-सा जुर्म करते देख लिया है।

इसकाखुलासा करो। हम तुम्हें यकीन दिलाते हैं कि यदि वे सचमुच गुनहेगारपाए गए तो हम उन्हें सजा देंगे और तुम्हें इनाम भी देंगे।”

जिन मंत्रियों ने अब तक खोजा की दोनों बांहें पकड़ी हुई थीं उन्हें अपनीबांहें छोड़ देने के लिए आंखों ही आंखों में इशारा करने के बाद खोजा ने कहा

“जहांपनाह! मैं जब राजमहल के बाहर से गुजर रहा था तब मैंने देखा किराजमहल की सुंदर दीवार ऊंची की जा रही है।

मैंने इसकी वजह जाननीचाही तो इन्होंने बताया कि चोरों को राजमहल में जाने से रोकने केलिए ऐसा किया जा रहा है।”

“यह तो हमें भी खबर है पर इसमें हंसने-हंसाने वाली क्‍याबात हुई ?” बादशाह ने खोजा को टोका।

मैं वही तो बताने जा रहा हूंजहांपनाह! दरअसल पहले तो मुझे यह जानकर ही अफसोस हुआ किये लोग राजमहल की दीवार को ओर भी ऊंचा करके इसकी खूबसूरतीको मटियामेट कर रहे हैं फिर यह सोचकर भी अफसोस हुआ किदीवार की ऊंचाई और बढ़ जाने से आम लोग यही सोचेंगे कि बादशाहने उनके और अपने बीच और भी दूरी बढ़ा ली है। इससे आपकी शानमें बेवजह गुस्ताखी होगी।

ये दोनों बातें सोचकर मुझे अफसोस हुआ। मेरीशुरू की हंसी दरअसल हंसी नहीं बल्कि अफसोस का सिसियाना इजहारथा। फिर मैं जोर से इसलिए हंसा क्‍योंकि तभी मुझे आपके मंत्रियों औरअफसरों की बेवकृफी और गुनाह का विचार हो आया।

“वही तो हम जानना चाहते हैं ऐ दानिशमंद खोजा कि तुम्हें इसमेंहमारे मंत्रियों और अफसरों की बेवकूफी और गुनाह कहां से नजर आगया ?

” बादशाह ने खोजा को जरा ज्यादा ही विस्तार में तान छेड़ते देखबीच में ही फिर टोका।

में चोरियों की वजह जरूर इन्हीं लोगों ने बताई होगी कि चोर दीवारफांद कर राजमहल में घुस आते हैं और चोरी कर ले जाते हैं।

परहकीकत यह नहीं है।

माना कि दीवार ऊंची करने से बाहर के चोरराजमहल में नहीं घुस पाएंगे लेकिन इससे राजमहल में चोरियां घटेंगीइसकी कोई गारंटी नहीं।

थाली में खाकर उसी में छेद करने की आदतजब तक नहीं छोडेंगे तब तक राजमहल में चोरियां होती रहेंगी औरआप जैसे बादशाह आम जनता को चोर समझ कर महल की दीवारेंऊंची उठवाते रहेंगे।”

खोजा की दलील पूरी होते ही वहां मौजूद मंत्रियों और अफसरोंके मुंह फीके पड़ गए। शर्म से उनकी गर्दनें झुक गईं।

मजदूरों के चेहरेखिल उठे और स्वयं बादशाह किसी सोच में डूब गया।

तभी खोजा नेबादशाह से पूछा “जहांपनाह! बाहर के चोर तो यह दीवार फांद कर

अंदर नहीं घुसने पाएंगे मगर यह तो बताइए कि महल के अंदर केचोरों को केसे रोका जाएगा ?”

बादशाह ने अगले ही पल नया फरमान जारी कर दिया कि महलकी दीवार ऊंची न कराई जाए।

बादशाह का फरमान सुनते ही खोजा के चेहरे पर उदासी छा गई।उसे उदास होते देख बादशाह ने पूछा “खोजा तुम अचानक उदास क्‍योंहो गए ?

” खोजा बोला “जहांपनाह! यह तो सही है कि आपके नएफरमान से महल कौ खूबसूरती जाते-जाते रह गई लेकिन मुझे अफसोसहै कि मेरी नेक सलाह के चलते इन मजदूरों को अपनी आज कीदिहाड़ी तो गंवानी ही पड़ी।

हो सकता है कल भी इन्हें काम न नसीबहो। अब इनके घर में चूल्हा कैसे जलेगा।”

बादशाह ने खोजा को भरोसा दिलाते हुए कहा “नहीं खोजा नहीं!तुमने हमारी प्रजा की नजर में हमारी इज्जत घटने से बचाई है। ऐसे मेंहम अपनी प्रजा का बुरा कैसे होने दे सकते हैं।

ये मजदूरी भी हमारीरियाया ही हैं इसलिए इन्हें दीवार न बनाने के बावजूद भी उतने दिन की दिहाड़ी रियासत के खजाने से दी जाएगी जितने दिन में महल की दीवार ऊंची होनी थी।”

बादशाह के इस फैसले ने न केवल खोजा को बल्कि वहां आए और न आए तमाम मजदूरों को जो खुशी और राहत पहुंचाई उन्हें शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता।

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