लाल मिर्च

“डाकररों के इंजेक्शनों को छोड़ो यार जिस घर के कुत्ते ने काटा है उस घरकी लाल मिर्चें अपने ज़ख्म पर लगा लो।” एक दोस्त ने कहा।

“जिस घर के कुत्ते ने काटा है अगर उस घर की कोई सुन्दर लड़की तुम्हारेज़ख्म पर पट्टी बाँध दे…। लड़कियाँ भी तो लाल मिर्च होती हैं ।” दूसरा दोस्त बोला।

कॉलेज के सभी दोस्त लड़के हँस पड़े । और वह जिसे कुत्ते ने काटा था हँसकरकहने लगा “यार नुस्खा तो अच्छा है पर तुमने आज़माया हुआ है न ?”

गोपाल ने उम्र की सीढ़ी के अठारहवें डन्डे पर पाँव रखा हुआ था और गोपालको लगा कि इस डन्डे पर जवानी के अहसास का एक कुत्ता दुबककर बैठा हुआथा और आज उसने अचानक पागलों की तरह उसकी टाँग में से माँस नोच लियाथा-उस दिन से गोपाल का मन अपने ज़स्म पर लगाने के लिए लाल मिर्च जैसीलड़की ढूँढ़ने लग गया था।

लड़कियाँ तो गोपाल के कालेज में भी थीं पड़ोस के घरों में भी उस शहरकी गलियों में भी और अन्य सब शहरों में भी। ‘पर जिस लड़की को मैं ढूँढ़ रहाहूँ” गोपाल सोचता “वह कहाँ है ?

और फिर गोपाल लड़कियों को ऐसे देखता जैसे थाली में दाल को बीना जाताहै। छोटे कद की मोटी बैठे हुए नाक वाली लम्बी गोल…और जब ऐसी लड़कियोंको वह दाल में से पत्थरों की तरह बीन लेता उसे सभी पुरानी उपमाएँ याद आजातीं-लचकती हुई टहनी जैसी लड़की चन्दन जैसी लड़की देवदार के वृक्ष जैसीलड़की चाँद की फाॉँक जैसी लड़की…और फिर गोपाल सोचता-कोई नहीं इनमें सेकोई भी नहीं उसे तो केवल लाल मिर्च जैसी लड़की चाहिए ।”

वैसे तो कालेज के सभी लड़कों में पुस्तकों और कोर्सों की बजाय लड़कियोंकी बातें लम्बी हो गई थीं पर गोपाल की हर बात को अपने घर जाने के लिएजैसे ‘लड़की” शब्द के दरवाज़े में से ज़रूर गुज़रना पड़ता था।

कभी रेडियो पर नूरजहाँ की आवाज़ आती “तुम्हारे मुख पर काले रंग का

नूरजहाँ ने तो गोपाल कीबात कभी न सुनी पर कालेज के लड़कों ने ज़रूर गाना शुरू कर दिया ‘ऐ लायलपुरके लड़के… ।” पर इससे तो गोपाल की ज़बान और भी सूख जाती थी। उसे औरप्यास लगती थी-कभी नूरजहाँ कभी एक लड़की यह बात कहे! जो

भूने हुए चने बेचने वाला कहता “बम्बई का बाबू मेरा चना ले गया” तो गोषाल.हँसता “चना ले गया तो ऐसे कहता है जैसे इसकी लड़कीं निकालकर ले गया है!

ऐनकों वाली लड़कियाँ गोपाल को लड़कियाँ नहीं लगती थीं। “जब भी आँखोंको देखना हो पहले काँच की दीवार पार करनी पड़ती है।” गोपाल कहता औरउन लड़कियों को लड़कियों की सूची में से निकाल देता।

किसी लड़की ने ऊँची धोती बाँधी हुई होती पाँव में जुराबें पहनी होतीं हाथमें छतरी पकड़ी होती तो गोपाल हँसकर मुँह फिरा लेता “यह लड़की थोड़ी है यहतो मास्टरनी है मास्टरनी। जो विद्यार्थी गणित में कमज़ोर हो वह मास्टरनी से शादीकर ले…”

किसी लड़की ने गहरे रंगों के कपड़े पहने होते या बाँह में चूड़ियाँ ही बहुतज़्यादा पहनी होतीं तो गोपाल कहता “यह तो रंगों का विज्ञापन है। लड़की तो बीचमें से मिलती ही नहीं बस पूरी की पूरी चूड़ियों की दुकान है।”

का दिवाला निकल गया…” और गोपाल कहता “जब मनुष्य प्रेमी बनने से पहलेपति बन जाता है तो समझो अब बेचारों के पास पूँजी बिल्कुल नहीं रही और उसनेघबराकर दीवालिया होने की अर्जी दे दी है।”

“शायद वह किसी प्रेमिका से ही शादी करने जा रहा हो ।” गोपाल का कोईदोस्त कहता।

“नहीं यार जुल्फ को सर करने में उम्र लगती है। गालिब की डोमनी औरलोर्का की जिप्सी इनके दरवाज़े पर कभी बरात नहीं जाती ।” और गोपाल कई वर्षतक इस जुल्फ़ की बातें करता रहा जिसके सर करने में उसने उम्र लगानी थी ।

और गोपाल ने टटोल-टटोलकर देखा-काली रात जैसे बाल पर उसे किसीरात ने नींद न दी। सघन जंगल जैसे बाल पर वह किसी जंगल में खो न सका।समुद्र की लहरों जैसे बाल पर वह किसी लहर में गोता न लगा सका और गोपालने उम्र के जो साल एक जुल्फ़ को सर करने में लगाने थे वे जुल्फ़ को ढूंढ़ने मेंही खोते रहे। और फिर गोपाल अपने सालों के खो जाने से घबरा गया।

“तुम भी अब हमारी तरह दीवालियापन की अर्जी दे दो यार ।” कालेज केपुराने साथियों में से कोई जब गोपाल को मिलता मज़ाक करता।

उम्र के अठारहवें वर्ष में जवानी के पागल कूत्ते ने गोपाल की टाँग को काटाथा और उस जख्म पर लगाने के लिए गोपाल एक लाल मिर्च जैसी लड़की ढूँढ़ रहाथा पर अब उम्र के बत्तीसवें वर्ष में उस ज़ख्म का ज़हर उसके सारे शरीर में फैलनेलग गया था।

अब गोपाल सोचने लग गया था वह न गालिब है न लोका। वह गोपालहै या एक ईश्वरदास या एक शेरसिंह या एक अल्लारक्खा ।…और उसने सिर झुकाकरदीवालिया होने की अर्जी दे दी।

“क्यों यार आज डोमनी के घर में बारात आएगी या जिप्सी के घर में ?”

“सुनाओ भाभी कैसी है ?”

“और कुछ नहीं तो हम तुम्हारी लाल मिर्च के देवर तो बन ही जाएँगे ।”

“बेशक सोने की अँगूठी की जगह हीरे की अँगूठी ही देनी पड़े भाभी काघूँघट ज़रूर उठाएँगे ।”

गोपाल अपने दोस्तों के मज़ाक को अपने हाथ पर विवाह के लाल धागे कीतरह बाँधे जा रहा था और हँसता हुआ कह देता था “मास्टरनी है मास्टरनी ऐनकभी लगाती है तुम्हारी भाभी ।”

माँ ने जब रिश्ता किया था गोपाल से कहा था कि अगर वह चाहे तो किसीबहाने वह लड़की दिखा देगी। पर गोपाल ने स्वयं ही इन्कार कर दिया था-“’जबदीवालिया होने की अर्जी ही देनी है तो…”

डोली दरवाज़े पर आ गई।

“सुन्दर है बहू घर का सिंगार है” उसे रुपए देते समय गोपाल की ताईकह रही थी। और गोपाल सोच रहा था-‘जब लोग दरवाज़े के सामने कोई भैंसलाकर बाँधते हैं तब भी यही बात कहते हैं – मैंस तो घर का सिंगार होती है।’

औरजब लोग डोली लेकर आते हैं तब भी यही बात कहते हैं- “बहू तो घर सिंगार होतीहै और फिर भैंस में और बहू में जो फर्फ होता वह कहाँ गया ? -और फिर गोपालखुद ही हँस देता-“यह भी वही फर्क है जो एक प्रेमी और दूल्हे में होता है।”

गोपाल की पत्नी न ही इतनी सुन्दर थी न ही इतनी कुरूप । आम लड़कियोंजैसी लड़की देखने में बस ठीक ही लगती। और गोपाल को न कोई चाव था नकोई शिकायत। वह भाँति-भाँति के कपड़े पहनती पर गोपाल उसे कभी “रंगों काविज्ञापन” न कहता । और वह सोहाग की चूड़ियाँ और दहेज़ के कड़े सब कुछ एकसाथपहन लेती गोपाल उसे कभी ‘ज़ेवरों की दुकान’ न कहता।

आजकल गोपाल को जवानी के शुरू के दिनों में पढ़ा हुआ एक अंग्रेजी उपन्यास

याद आया करता था जिसमें अपने सपनों की लड़की ढूँढ़ने के लिए कोई उम्र लगादेता है पर उसे ढूँढ़ नहीं पाता और फिर मरते समय अपने बेटे को अपनी सारीरूपरेखा और सारी लगन देकर कहा जाता है कि वह इस किस्म की आँखों वालीइस किस्म के नक्शों वाली और इस किस्म के बालों वाली लड़की को ज़रूर ढूँढेऔर फिर सारी उम्र की खोज के बाद उसका बेटा मरते समय यही बात अपने बेटेको लिखकर दे जाता है।

जुल्फ को सर करने में गालिब ने सिर्फ एक ही उम्र का अन्दाज़ा लगायाथा पर गोपाल सोचता ‘जीवन की हार गालिब के अन्दाज़े से बहुत बड़ी है।’ औरआजकल गोपाल सोच रहा था उसके घर एक पुत्र जन्म लेगा हूबहू उसकी मुखाकृतिहबहूं उसका दिल हूबहू उसके सपने और फिर जब उसका पुत्र जवान होगा वहएक लाल मिर्च जैसी लड़की ज़रूर ढूँढ़ेगा।… और फिर वह सारा संसार अपने पुत्रकी आँखों में देखेगा।

“आज मैं बर्फ वाला पानी नहीं पिऊँगी” एक दिन गोपाल की पत्नी ने शिकंजवीका गिलास अपनी सास को लौटाते हुए कहा। और माँ जब उसके लिए चाय बनानेके लिए रसोई में गई तो गोपाल ने अपनी पत्नी को हल्का-सा मज़ाक किया “मैंसारा महीना सपने इकटूठे करता हूँ और तुम महीने के बाद मेरे सारे सपने तोड़देती हो…”

शायद वह इन्हीं शब्दों का असर था कि अगले महीने गोपाल की पत्नी केदिन लग गए और गोपाल की बाँहों में जैसे अभी उसका बेटा खेलने लग गया।

खटूटी या नमकीन चीज़ तो इसने कभी माँगी ही नहीं हमेशा इसका मन मीठीचीज़ों के पीछे भटकता है ज़रूर बेटा होगा। तुम्हारे जन्म के समय मुझे भी गुड़की खीर अच्छी लगती थी।” माँ जब कहती गोपाल को लगता अब तो उसकाबेटा तोतली बातें भी करने लग गया है।

यह नौ महीने गोपाल को पिछले नौ वर्षों के समान प्रतीत हुए। और फिरघर में घी गुड़ और अजवायन इकटूठी होने लगी।

कमरे का दरवाज़ा बन्द किया हुआ था। गोपाल ने बाहर बरामदे में बैठकरकागज़ कलम और पुस्तक अपने सामने इस तरह रखी हुई थी जैसे देखने वाले कोलगे उसे सिर उठाने की फुर्सत नहीं थी। पर गोपाल पुस्तक का कभी कोई पृष्ठउलटता कभी कोई । और फिर जो पंक्तियाँ सामने आ जातीं उनको कागज़ परलिखने लग जाता। दरवाज़े के पास वह जमा बैठा था और उसके कान अन्दर कीआवाज़ सुनने के लिए सतर्क थे।

“जरा हिम्मत कर बेटी। बेटों का इसी तरह जन्म होता है।…बस मिनट भर

और गोपालप्रतीक्षा कर रहा था ‘अभी…अभी वह कहेगी…लाख-लाख बधाइयाँ गोपाल की माँ।यह लो बेटा… ।

एक बार दाई बाहर आई थी। कहने लगी “बेटा गोपाल ज़रा जाकर थोड़ा-साशहद तो ला दे। देखकर लाना नया शहद हो।’

गोपाल वहाँ से जाना नहीं चाहता था। ‘क्या पता बाद में…जल्दी ही कुछ होजाए…मैं उसकी पहली आवाज़ सुनूँगा और वह दाई से कहने लगा “शहद कीयाद अब तुम्हें आई है।…यह सारा काम पड़ा हुआ है मेरे सामने। कल मुझे यहसारा काम दफ्तर में देना है।”

“तुम मर्दों को तो अपने काम की ही पड़ी रहती है। आखिर बूढ़ी उम्र हैकई बातें भूल जाती हूँ?” दाई यह कह रही थी कि गोपाल की माँ ने सारी मुश्किलदूर कर दी। कहने लगी ‘हमारे यहाँ कभी किसी ने शहद-वहद नहीं दिया। हम तोअँगुली पर थोड़ा-सा गुड़ लगाकर मुँह में डाल देते हैं।”

“अच्छा गुड़ ही सही।” और दाई अन्दर चली गई थी।

गोपाल के कान फिर दरवाज़े की ओर लगे हुए थे पर दाई का “मिनट भर!पता नहीं कितना लम्बा था। वह अभी तक कह रही थी “मिनट भर के लिए दाँतोंतले ज़ुबान दबा…ज़रा अपनी तरफ से ज़ोर लगा न नीचे को।”

और फिर अचानक बच्चे के रोने की आवाज आई। गोपाल का सॉँस जैसेकिसी ने हाथ में पकड़ लिया हो। वह न नीचे को आ रहा था न ऊपर जा रहाथा। और अभी तक दाई की आवाज़ नहीं आई थी। उसे बच्चे की आवाज़ की अपेक्षादाई की आवाज़ की अधिक प्रतीक्षा थी।

और फिर दाई की आवाज़ आई “लड़की”

गोपाल की कुर्सी काँप गई। उसकी माँ शायद पानी या तौलिया लेने बाहरआई हुई थी। गोपाल के होंठ काँपे माँ लड़की !

“नहीं बेटा नहीं तू भी पागल है। जब तक ‘औल’ नहीं गिरती दाइयाँ यहीकहती हैं। अगर वह कह दें कि बेटा हुआ है तो माँ की खुशी के कारण औल ऊपरचढ़ जाए ।” और माँ जल्दी-जल्दी अन्दर चली गई।

यह “औल’” पता नहीं क्‍या बला है। न जल्दी गिरती है न दाई आगे कुछबोलती है ।” गोपाल की कुर्सी अब यद्यपि पहले की तरह उतनी काँप नहीं रही थीपर फिर भी गोपाल ने उसे दीवार के साथ लगा लिया था।

“बेटी हो या बेटा जो भी जीव हो भाग्यवान्‌ हो” दाई की आवाज़ आई।

“बेटी तो लक्ष्मी होती है। इस बार बेटी तो अगले साल बेटा।” माँ दाई सेकह रही थी।

“लड़की है कि रेशम का धागा है…” माँ कह रही थी या दाई कह रही थी

इस बार गोपाल से आवाज़ पहचानी नहीं गई। उसकी कुर्सी काँपी और कुर्सी केकारण जैसे सारी दीवार डगमगा गई उसे लगा वह बूढ़ा हो गया धा लाला गोपालदास ।

और उसकी पत्ली अपने घुटनों को दबाती हुई कह रही थी ‘लड़की इतनी बड़ी होगई है कोई लड़का देखो न।

कहाँ छुपाऊँ इस आँचल की आग को ?

ऐसा रूप…ऊपर से ज़माना बुरा है… और फिर उसके दरवाज़े पर बरात आ गई…उसके दामादने उसके पाँव छुए…उसकी बेटी लाल सुर्ख कपड़ों में लिपटी हुई थी…वह डोली केपास जाकर उसे प्यार देने लगा…उसकी बेटी…बिलकुल लाल मिर्च…।

लाल मिर्च…लड़की…लाल मिर्च…और गोपाल को लगा आज…आज किसी नेमिर्चे उठकर उसकी आँखों में डाल दी थीं ।

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