में सब जानता हूँ

देखो न इस बेलदार को-पँखे की तरह झूलता चला आता है-

” ठेकेदार जैलसिंहने तारालिंह मिस्त्री की ओर मुँह घुमाकर कहा और फिर अपनी आवाज़ को आधीगीठ ऊपर उठाकर बेलदार को कहने लगा “ठीक से पकड़ तसले को और पाँवउठा…तसले के सिर को कहीं पीड़ तो नहीं होती…” और फिर ठेकेदार जैलसिंह अपनीआवाज़ को आधी गीठ और ऊपर उठाकर एक बेलदार को नहीं सब बेलदारों कोकहने लगा “ढाई रुपये रोज़ के लिए मुँह उठाए बैठे हैं…पाँच बजने नहीं देते…मैंसब जानता हूँ… ”

“वो कुली कहाँ मर गई। मैंने उन्हें ईंटें लाने के लिए कहा था…” तारासिंहमिस्त्री मुंडेर से नीचे झाँकते हुए बोला और देखा कि दोनों मज़दूर औरतें सिर परतसलों में से मलबे को फेंककर अभी मलबे के पास ही खड़ी हुई थीं।

“ओ छोकरी!” तारासिंह ने धमकाया।

दोनों मज़दूर औरतें हाथों में खाली तसलों को पकड़े जब सीढ़ियाँ चढ़कर ऊपरआई तो आते ही तारासिंह मिस्त्री के पीछे पड़ गईं “हमें छोकरी बुलाए है?…देखजो ज़रा अपनी शक्ल को….

“क्या हो गया मेरी शक्ल को…तुझसे तो अच्छी है…नहीं तो शीशां लाकरदेख ले…”

“देखा बड़ा सकल वाला…हमको छोकरी क्यों बुलाए है ?”

“छोकरी कोई गाली तो नहीं होती ।”

“इत्ती-सी लड़की को छोकरी कहते हैं…तू हमको छोकरी बुलाए है ?”

मिस्त्री ने समझा था कि मज़दूर औरतों को छोकरी शब्द का पता नहीं थाउन्होंने इसे गाली समझ लिया था इसीलिए लड़ रही थीं पर जब उसने सुना किउन्हें छोकरी शब्द का पता था और वे इसलिए नहीं लड़ रही थीं कि यह कोई गालीथी बल्कि इसलिए चिढ़ी हुई थीं कि मिस्त्री ने उन्हें छोटी बच्चियाँ समझ रखा थाजवान औरतें क्‍यों नहीं समझा था-इसलिए मिस्त्री हँसने लगा।

“फूलमती है मेरा नाम और इसका सोनमती…” एक ने दूसरी की ओर देखाऔर फिर दोनों हँसने लगीं।

“फूलमती क्‍या तुम कहो तो मैं फूला रानी बुला लिया करूँ तुम्हें…मगर ईटेंतो ला दे…

“क्यों लाऊँ जी ईटें ? पहले मलबा उठाने को क्‍यों कहा था? सुबह से हममलबा उठा रही हैं। अब तो मलबा ही उठाएँगी। ईटें मंगवानी थीं तो सुबह ही ईटोंपर लगा देते…

“मेरी मर्ज़ी है मैं मलबा उठवाऊँ-मेरी मर्जी है मैं ईटें मँगवाऊँ…’

“हाय-हाय मर्ज़ी तो देख इसकी…”

“हॉ-हाँ देख मेरी मर्ज़ी मैं अभी ठेकेदार से कहता हूँ…”

“देखो मिस्त्रीजी-शिकायतों से काम नहीं होगा-मैं बताए देती हूँ…”

“तू काम नहीं करेगी तो मैं शिकायत करूँगा…”

“काम से थोड़े ही भागती हूँ…तुम बात ही ऐसी करत हो…”

“क्या बात की है मैंने?”

“काम लेना हो तो सुबह आते ही अपने-अपने बेलदार बाँट लिया करो…आजतूने कलुया को कहा था। ईंटें लाने के लिए…अब कलुया से मँगा लो

“कलुया रोड़ी बनाने के लिए गया है।”

“रोड़ी तो सिरमिट वाला बनाएगा-रोड़ी बनाना तो उसी का काम है…”

इतनी देर में ठेकेदार सीमेन्ट की बोरियाँ निकलवाकर फिर छत पर आ गयाथा। आते ही तारासिंह को दबाकर बोला “तू इनमें कहाँ उलझ बैठा…निरी काँय-कॉँय…मैं सब जानता हूँ.

“मेरे पास ईटें कम थीं-मैंने इन्हें कहा कि दो-एक फेरे लगा दो-इतने मेंकलुया आ जाएगा-काम चालू रहे-इसलिए मैंने कहा था…”

“देखो ठेकेदार जी! यह मिस्त्री हमको छोकरी बुलाता है…” फूलमती ने बीचमें कहा।

“ये कैंचियाँ कहाँ से पकड़ लाए तारासिंह। बागड़िनियों का कोई मुकाबलानहीं। काम भी दुगना करती हैं और ज़बान नहीं हिलातीं…

ठेकेदार ने मिस्त्री से ध्यान हटाकर दोनों कुली औरतों की तरफ घूरकर देखा।और उसने अभी पिछले आठ दिनों से जो बात नहीं देखी थी वह भी देखी कि उनदोनों में से जो फूलमती थी उसके पेट में कोई छः महीनों का बच्चा था। वह शायदघड़ी-पल साँस लेने के लिए ही लड़ाई छेड़ बैठी थी। और ठेकेदार की आँखें औरकड़वी हो गई। “मैं सब जानता हूँ…” ठेकेदार ने कहा।

“क्या जानत हो ठेकेदार जी?” फूलमती ने चमककर पूछा।

चल-चल काम कर तु…काम तमसे होता नहीं.. बातें करती हो ।” ठेकेदारने फिर फूलमती के पेट की ओर देखा।

“क्या देखते हो ठेकेदारजी ?” फूलमती ने सिर के पल्लूं को मुँह की ओर खींचा और हँसने लगी।

“तुम्हारा मर्द कहाँ है! कमाता कुछ नहीं मर्दुआ?” ठेकेदार ने कुछ रहम से

“मेरा मर्द? वह तो मर गया। अब काम नहीं करूँगी तो खाऊँगी क्या ?”

“तुमसे यह काम नहीं होने का न ईंट ढोने का न मलबा उठाने का…?”

“जानती हूँ ठेकेदार जी। पर का करूँ…खेत में काम करती थी मैं गोभी काअब तो मौसम न रहिवो…बस तम्बाखू का खेत है। मालिक एक रुपया देता है रोजका… फिर भी करती। पर तम्बाखू की बू बहुत चढ़े है। सिर को चक्कर आ जाएखड़ी-खड़ी को…” फूलमती की आवाज़ हलीमी में आ गई। वह झगड़ा करती-करतीतसले में मलबा डालती रही थी अब उसने कपड़ा मरोड़कर सिर पर रखा और मलबेके भरे हुए तसले को सोनमती से उठवाती तारासिंह मिस्त्री की ओर मुँह करके कहनेलगी “तुम गुस्सा न होवो मिस्त्रीजी…मैं ईंटें लाए देती हूँ-बस यह तसला उड़ेलदूँगी ईंटें ले आऊँगी…””

“बस ऐसे काम किया कर ना-बीच में काँय-काँय क्या करती है.

“और नहीं तो क्या? अब बोलेगी तो मैं तुम्हारा नाम काँय काँय-रख दूँगा…”

“घर में औरत तो होगी मिस्त्रीजी?” सीढ़ियाँ उतरते हुए फूलमती ने पूछा।

“हाँ है ।” मिस्त्री तारासिंह ने चौखट के बैरे की कील ठोंकते हुए जवाब दिया।

“तो उसका नाम काँय-काँय रख दो न” सीढ़ियाँ उतरती हुई फूलमती ने कहाऔर फिर हँसने लगी।

“तुमने भाई उसे क्‍यों मुँह लगा लिया?” ठेकेदार ने पास से कहा।

“मुँह तो मैंने नहीं लगाया ठेकेदार जी…ऐसे ही मुँह का स्वाद खराब करनाथा ?” मिस्त्री हँसने लगा।

“मैं सब जानता हूँ। अभी तू ध्यान लगाकर काम कर। आज मैंने बड़ी शिल्फडलवानी है ।” ठेकेदार ने अभी इतना ही कहा था कि उसे याद आया पिछले कईमहीनों से तारासिंह की औरत बीमार थी। इसलिए हमदर्दी से पूछने लगाः

क्यों भाई तारे! तुम्हारी औरत बीमार थी…अब तो ठीक है न ?”

“ठीक तो नहीं सरदार जी। सुस्त पड़ी रहती है…जाने क्या बीमारी है उसे ?”

“कहीं मायके जाने की तो बीमारी नहीं भाई! मैं जानता हूँ इन औरतों को…”“मैंने कोई बाँधकर तो नहीं रखी हुई

‘फिर एक-दो लगा देनी थी।’

“नहीं सरदार जी! मुझसे मारा नहीं जाता औरत को ।

“न भाई मारना भी नहीं चाहिए…यूँ ही कहीं रस्सी तुड़ा ले-आदमी मगरऔरत को मारे तो बाँधकर मारे…नहीं तो उसे कभी न मारे…

“बाँधकर कैसे ठेकेदार जी ?”

“तू समझा कर बात को भाई…”

“मैं तो कुछ नहीं समझा…!

ठेकेदार की हँसी उसकी घनी मूँछों में फैंस गई और वह कहने लगा “घरमें कोई बच्चा-मुन्ना हो तो भले ही औरत को पीट डालो वह नहीं जाती कहीं। मैंसब जानता हूँ …

“आपके तो अब बच्चा हो गया है ठेकेदार जी। कभी यह नुस्खा इस्तेमालकिया है?” मिस्त्री की हँसी उसकी पतली मूँछों से छनने लगी।

ठेकेदार ने अभी जबाव नहीं दिया था कि फूलमती मलबे वाला खाली तसलाहाथ में पकड़े छत के ऊपर आ गई। नीचे ईंटों का ट्रक आया था। ठेकेदार पर्चीपर दस्तखत करने के लिए नीचे चला गया।

“ओ कॉय-काँय तू ईटें नहीं लाई?” मिस्त्री ने फूलमती से रोष से पूछा।

“जो कॉय-कॉँय होगी वह ईंटें लाएगी। मैं तो फूलमती हूँ” फूलमती ने एकनखरे से कहा और खाली तसले में मलबा भरने लगी।

“अब मैं तेरे से बात ही नहीं करूँगा…वह आ गया कलुया…जा रे कलुया।जल्दी से ईटें ले आ देखना सूखी ईंटें मत लाना…तराई कर लेना।”

“अब मैं तेरे से बात नहीं करूँगा…” फूलमती ने मुँह चिढ़ाया और कहनेलगी “तो कौन बात करता है तेरे से मिस्त्री जी!”

“मलबा तो आज ही उठ जाएगा-तू फिर कल क्‍या करेगी?.. .कल मत आनाकाम पर…”

“हाय-हाय! मत आना काम पर |” फूलमती ने मिस्त्री की नकल उतारी और

“जा-जा जहन्नुम में जा…”

“जहन्नुम क्या होता है मिस्त्री जी?”

“मैं कहता हूँ तू चली जा यहाँ से नहीं तो में तुम्हें अभी जहन्नुमदूँगा… !”

“बड़े आए जहन्नुम दिखाने वाले…लो बैठी हूँ. तुम्हारे सामने…”“आता है ठेकेदार अभी तेरे को सीधा करेगा !

“तू तो कहती थी तेरा मर्द मर गया है ?”

“जब छोड़ दिया तो फिर क्‍या है? वह जीता भी है तो मुझे क्या ?”

“तूने अपने मर्द को क्‍यों छोड़ दिया ?”

“बहुत सराब पीता था। मेरे को मारता था…एक दिन उसने बहुत मारा”

“कुछ तेरा भी कसूर होगा ?”

“उसने मेरे सारे गहने बेच दिएं। मैंने उजर किया तो मारने लगा…”

फूलमती मलबे के भरे तसले को उठाती कुछ और भी कहने लगी थी किठेकेदार छत पर आ गया और कहने लगाः

“तुम्हें बिगाड़ दिया बातों ने-भाईतारे। कौला नौ इंची का लगाना था।”

“नौ इंच का ही तो लगाया है ठेकेदार जी

“सरिया चार इंची पर लगाना है या तीन इंची पर ?”

“चार इंची पर भाई चार इंची पर। लोहे को तो आग लगी हुई है। तीनइंची का भला यहाँ क्या काम है

“आप रोड़ी मँगवाएँ मेरी दो रहें रह गई हैं और दूसरे मिस्त्रियों को भी इधरबुला लो।”

“नीचे एक-एक इंची की रोड़ी डलवा देना-फिर सरिया बिछाकर एक-एकइंची और डाल देना-बस इससे अधिक की जरूरत नहीं ।”

“अच्छा जी।”

“हाँ भई तुम खुद संमझदार हो। लोग काम तो कहते हैं कि अव्वल दर्जे काहो और पैसे उतारते हुए दाएँ-बाएँ करते हैं। मैं सब जानता हूँ.

“आपको करनल वाली कोठी के पैसे अभी उतरे हैं या नहीं ?”

“कहाँ भाई ?…वंहाँ तो और ही…मामला बन गया…”

“क्या हो गया वहाँ ?”

“वहाँ पड़ोस में भी एक कोठी बन रही थी न

“हाँ

“बंस भाई उनकी आपस में लग गईं।’

“लड़ाई हो गई उनकी ?”

“लड़ाई काहे को…उनका आना-जाना हो गया।”

“फिर ?”

“करनल को मन में शक हो गया…उसने भाई कोठी अपने नाम करवा ली…”

“पहले उसकी औरत के नाम थी ?”

“ज़मीन का बियाना उसी के नाम पर दिया था भाई…”

फिर ?

“औरत को जब पता चला उसने मुकदमा कर दिया वह जो ऐँंकल था नउसने-शह दी थी।

“ऐंकल कौन-सा ठेकेदार जी?

“अरे तू बात समझा कर वह औरत का ऐंकल नहीं था…उसके लड़के-लड़कियाँउसे ऐंकल बुलाते थे

“अंकल…अच्छा अंकल ”

“भई हम पढ़े हुए नहीं। पर इतना हम तभी जान गए थे कि यह जो नया

ऐंकल बना है…कोई गुल ही खिलाएगा ”

“फिर ?”

“फिर जी वह औरत कचहरी पहुँची…यह कचहरी के मामले बड़े टेढ़े होतेफिर क्‍या बना ठेकेदार जी ?

“उनका तो जाने क्या बनेगा…पर मैं तो मारा गया भाई। न वह औरत मेराबिल उतारती है और न वह करनल…

“तुमने घड़ी बाँधी हुई है हाथ पर? पाँच कहाँ बज गए अभी ?”

मैं तो ठेकेदार जी बिगर घड़ी के बता दूँ तुम देख लो घड़ी में ?

“तू तो सवेरे भी मटककर आती है। तुमसे मैं छः बजे तक काम करवाऊँगा।मैं सब जानता हूँ।”

शैल्फ पड़ गया। छः बजने वाले हो गए ।। ठेकेदार ने मिस्त्रियों को और बेलदारोंको ताकीद की कि वे सवेरे आठ बजे से दस मिनट पहले ही पहुँच जाएँ दस मिनट

सबेरे आठ बज गए नौ बज गए दस बज गए। काम चालू हो गया थापर सारे मिस्त्री और बेलदार हैरान थे कि ठेकेदार अभी तक नहीं आया था।

कल चाहे फूलमती ने कहा था कि वह तारासिंह मिस्त्री को ईटें नहीं पकड़ाएगीपर आज जब सब बेलदारों ने अपने-अपने मिस्त्री चुने तो फूलमती ने तारासिंह कोअपना मिस्त्री चुन लिया।

“आज तो मिस्त्री जी मुझे डर लागे…” फूलमती ने सिर पर उठाई ईंटों कोनीचे मिट्टी के एक ढेर पर फेंकते हुए कहा।

“काहे का डर लागे फूलमती ?”

“आज ठेकेदार को जाने कोई मुसीबत पड़ गई ”

“किसी काम को गया होगा…अभी आता होगा…”

“आज तो मेरा दिल कहता है कि कोई बुरी बात होगी ।”

काम चालू था। एक ठेकेदार नहीं आया था। पूरी चहल-पहल बुझी हुई थी।आज फूलमती भी मिस्त्री से नहीं लड़ रही थी।

खाने के समय तक सबको ठेकेदार के आने की उम्मीद थी। पर उसके बादतारासिंह मिस्त्री के मुँह से भी रह-रहकर निकलने लगा “आज न जाने ठेकेदार काक्या बना…वह रहनेवाला तो नहीं था।”

शाम तक छजलियाँ पड़ गईं कल दीवारें ऊँची हो जानी थीं। छत बाँधने केसमय ठेकेदार का पास होना जरूरी था। इसलिए तारासिंह मिस्त्री ने सबको कहाकि वह रात को ठेकेदार के घर जाएगा और पता करेगा कि क्‍या बात हुई।

अगले दिन सवेरे जब सब मिस्त्री और बेलदार काम पर पहुँचे तो ठेकेदारअब भी कहीं दिखाई नहीं देता था। सब तारासिंह मिस्त्री के मुँह की ओर देखनेलगे।

“ठेकेदार आएगा अभी। थोड़ी देर के बाद आएगा…हम काम चालू करेंगे…वहकुछ बीमार है…” तारासिंह मिस्त्री ने सबको यह बात कही पर उसके मुँह से लगताथा कि बात कुछ और थी।

फूलमती कुछ देर तारासिंह मिस्त्री को चुपचाप ईटें पकड़ाती रही फिर धीरेसे पूछने लगी “क्या बात हो गई मिस्त्री जी ?”

“बात…बात तो कुछ नहीं।” मिस्त्री ने बात टाल दी।

दोपहर के समय जब रोटी खाने की छुट्टी हुई तो नीम के पेड़ के नीचे बैठकररोटी खा रहे तारासिंह मिस्त्री से फूलमती फिर पूछने लगी “हमको नहीं बताओगेमिस्त्री जी ?”

“बता तो दिया ठेकेदार बीमार है।”

“झूठ बोलते हो मिस्त्री जी।

“मैं झूठ बोलता हूँ तो ठेकेदार के घर चली जा उससे पूछ ले…”

“तुम्हारी मर्ज़ी मिस्त्री जी! हमने क्या करना है पूछकर…यह तो ऐसे हीं…किसीके दुःख से दुःख लागै…”

मिस्त्री कुछ देर फूलमती के मुँह की ओर देखता रहा । फिर बोला “बात बड़ीखराब है फूलमती किसी से बताना नहीं…”

फूलमती बोली कुछ नहीं उसने केवल इन्कार में सिर हिला दिया।

“ठेकेदार की औरत…” मिस्त्री कुछ कहते-कहते फिर रुक गया।

“भाग गई ?”

“यह तो मुझे पता नहीं कहाँ गई। घर में नहीं है। शायद ठेकेदार से रूककरअपने माँ-बाप के यहाँ चली गई होगी…”

“उसका बच्चा नहीं है ?”

“बच्चा तो है।”

“वह बच्चे को साथ ले गई ?”

“नहीं बच्चे को छोड़कर गई है।”

“फिर माँ-बाप के यहाँ नहीं गई होगी।”

तारासिंह मिस्त्री अब तक सचमुच यह सोच रहा था कि वह शायद ठेकेदारसे रूठकर अपने माँ-बाप के पास चली गई होगी। पर फूलमती की दलील उसे ठीक

लगी कि अगर वह अपने माँ-बाप के पास गई होती तो बच्चे को अपने साथ लेजाती।

“ठेकेदार ने झगड़ा किया था!.._“झगड़ा तो हुआ ही होगा। शायद ठेकेदार ने उसे मारा होगा…”“ठेकेदार सराब पीता है ?”

“शराब तो नहीं पीता। पर वह सोचता है कि कभी-कभी औरत को मारनाज़रूर चाहिए”

“बेकसूर को मारना चाहिए ?”

“वह सोचता है कि इस तरह औरत बिगड़ती नहीं…दो दिन हुए मुझसे कहरहा था कि औरत को मारना हो तो बाँधकर मारना चाहिए…”

“रस्सी से बाँधकर ?”

“नहीं-नहीं…उसका मतलब था कि जब घर में कोई बच्चा हो जाए तो औरत

घर से बँध जाती है। फिर उसको मारपीट भी करो तो वह घर को छोड़कर भागतीनहीं… ।”

“एक बात कहूँ मिस्त्री जी ?”

“कहो…”

“ठेकेदार तो कहत है कि सब बात जानता हूँ…वह खाक जानता है…”

तारासिंह मिस्त्री ने देखा सामने ठेकेदार आ रहा था। वह आगे आकर ठेकेदारको मिला और दूर सड़क पर खड़ा होकर उससे पूछने लगा “कुछ पता चला ?”

ठेकेदार ने जवाब देने की जगह इन्कार से सिर हिला दिया।

“मायके तो वह नहीं गई…मेरा दिल यही कहता है…वैसे आपने आदमी भेजाही होगा आज आकर ख़बर दे देगा।”

“आदमी लौट आया है। वह वहाँ नहीं गई ।” ठेकेदार की आवाज़ उसकेगले में कई गाँठे नीचे उतरी हुई थी। “आसपास के कुएँ भी खोजवा तिए हैं

“आप क्‍या सोचते हैं कि उसने कहीं कुएँ में…”

“कहा करती थी…मैं किसी दिन कुएँ में छलाँग मारकर मर जाऊऊँगी…भई मुझेक्या मालूम था…”

“ठेकेदार जैलसिंह की ज़िन्दगी में यह शायद पहला दिन था जब उसने यहनहीं कहा था “मैं सब जानता हूँ ।

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