गुलियाना का एक खत

टेहनी पत्तों से भर गई थी पर उस पर फूल नहीं लगते थे।

मैं रोज़ पत्तों का मुँहदेखती थी और सोचती थी कि चम्पा कब खिलेगा।

गमला कितना भी बड़ा हो परगमले में चम्पा नहीं फूलती-मुझे एक माली ने बताया था और कहा था कि इसपौधे की जड़ों को धरती की ज़रूरत होती है। और मैं उस पौधे को गमले में सेनिकालकर धरती में रोप रही थी कि एक औरत मुझसे मिलने के लिए आई।

“तुम्हें कहाँ-कहाँ से पूछती और कहाँ-कहाँ से खोजती आई हूँ।”

“तुम ? नीली आँखों वाली सुन्दरी ?”

“मेरा नाम गुलियाना है।”

“फूल-सी औरत ।”

“पर लोहे के पैरों चलकर पहुँची हूँ। मुझे दो साल होने को आए हैं चलतेहुए।

“किस देश से चली हो ?”

“यूगोस्लाविया से ।”

“भारत में आए कितना समय हुआ ?”

“एक महीना। बहुत लोगों से मिली हूँ। कुछ औरतों से बड़ी चाह से मिलतीहूँ। तुमसे मिले बगैर मुझे जाना नहीं था इसलिए कल से तुम्हारा पता पूछ रही थी।”

मैंने गुलियाना के लिए चाय बनाई और चाय का प्याला उसे देते हुए भूरेबालों की एक लट उसके माथे से हटाई और उसकी नीली आँखों में देखा औरकहा-“अच्छा अब बताओ गुलियाना! तुम्हारे पाँव में लोहे के ही सही पर ये क्‍याअभी तुम्हारे हुस्न और तुम्हारी जवानी का भार उठाकर थके नहीं ? ये देश-देशान्तरमें भटकते क्‍या खोज रहे हैं ?”

गुलियाना ने लम्बी साँस लेकर मुसकरा दिया। जब किसी की हैँसी में एकविश्वास घुला हुआ हो उस समय उसकी आँखों में जो चमक उतर आती है मैंनेवह चमक गुलियाना की आँखों में देखी।

“मैंने अभी तक लिखा कुछ नहीं पर लिखना बहुत चाहती हूँ। मगर कुछभी लिखने से पहले मैं यह दुनिया देखना चाहती हूँ। अभी बहुत दुनिया बाकी पड़ीहै जो मैंने देखी नहीं है इसलिए मैं अभी थकने की कहीं। पहले इटली गई थींफिर फ्रांस फिर ईशान और जापान… ।

“पीछे कोई तुम्हारी बाट देखता होगा ?”

“मेरी माँ मेरी बाट देख रही है।”

“उसे जब तुम्हारा खत मिलता होगा तब कितनी चहक उठती होगी वह ।

“वह मेरे हर एक खत को मेरा आखिरी खत समझ लेती है। उसे यह यकीननहीं आता कि फिर कभी मेरा और खत भी आएगा।”

क्यों ?

“वह सोचती है कि मैं इसी तरह चलती-चलती रास्ते में कहीं मर जाऊँगी।मैं उसे खूब लम्बे-लम्बे खत लिखती हूँ। आँखें तो वह खो बैठी है पर मेरे खत किसीसे पढ़वा लेती है। इस तरह वह मेरी आँखों से दुनिया को देखती रहती है ।”

“अच्छा गुलियाना तुमने जितनी भी दुनिया देखी है वह तुम्हें कैसी लगी ?किसी जगह ने हाथ बढ़ाकर तुम्हें रोका नहीं कि बस और कहीं मत जाओ ?”

“चाहती थी कि कोई जगह मुझे रोक ले मुझे थाम ले बाँध ले। पर…”

“जिन्दगी के किसी हाथ में इतनी ताकत नहीं आई?”

“मैं शायद जिन्दगी से कुछ अधिक माँगती हूँ–जरूरत से ज़्यादा। मेरा देशजब गुलाम था मैं आज़ादी की जंग में शामिल हो गई थी।”

“कब?”

“1941 में हमने लोकराज्य के लिए बगावत की। मैंने इस बगावत में बढ़-चढ़कर भाग लिया था चाहे मैं तब छोटी-सी ही रही हूँगी।”

“वे दिन बड़ी मुश्किल के रहे होंगे ?”

“चार साल बड़ी मुसीबतों भरे थे। कई-कई महीने छिपकर काटने होते थे।

“कई बार दुश्मन हमारा पता पा गए। हमें एक पहाड़ी से चलकर दूसरी पहाड़ीपर पहुँचना होता था। एक रात हम साठ मील चले थे।”

“साठ मील! तुम्हारे इस नाजुक-से बदन में इतनी जान है गुलियाना ?”

“यह तो एक रात की बात है। तब हम करीब तीन सौ साथी रहे होंगे। परसारी उमर चलने के लिए कितनी जान चाहिए और वह भी अकेले!”

“गुलियाना”

“चलो कोई खुशी की बात करें। मुझे कोई गीत सुनाओ ।

“तुमने कभी गीत लिखे हैं गुलियाना ?”

“पहले लिखा करती थी। फिर इस तरह महसूस होने लगा कि मैं गीत नहींलिख सकती। शायद अब लिख सकूँगी”

“कैसे गीत लिखोगी गुलियाना ? प्यार के गीत ?”

“प्यार के गीत लिखना चाहती थी पर अब शायद नहीं लिखूँगी। हालाँकिएक तरह से वे प्यार के गीत ही होंगे पर उस प्यार के नहीं जो एक फूल की तरहगमले में रोपा जाता है। मैं उस प्यार के गीत लिखूँगी जो गमले में नहीं उगताजो सिर्फ धरती में उग सकता है।”

गुलियाना की बात सुनकर मैं चौंक उठी। मुझे वह चम्पा का पेड़ याद होआया जिसे अभी-अभी मैंने गमले से निकालकर धरती में लगाया था। मैं गुलियानाके चेहरे की ओर देखने लगी। ऐसा लग रहा था जैसे इस धरती को गुलियाना केदिल का और गुलियाना के हुस्न का बहुत सा कर्ज़ा देना हो । गुलियाना मुझे लेनदारप्रतीत हो रही थी। पर मुझे उसकी ओर देखते लगा कि यह धरती कभी भी उसकाऋण नहीं चक्रा पाई थी।

“गुलियाना !”

“मैं इसलिए कहती थी कि मैं शायद ज़िन्दगी से कुछ अधिक चाहती हूँ-ज़रूरतसे ज़्यादा।”

“यह ज़रूरत से ज्यादा नहीं गुलियाना। सिर्फ उतना जितना तुम्हारे दिल केबराबर आ सके।”

“पर दिल के बराबर कुछ नहीं आता। हमारे देश का एक लोकगीत है-

“तेरी डोली को कहारों ने उठाया

खाट को कौन कन्धा दे

मेरी खाट को कौन कन्धा देगा ?”

“गुलियाना तुमने क्या किसी को प्यार किया था?”

“कुछ किया ज़रूर था पर वह प्यार नहीं था। अगर प्यार होता तो जिन्दगीसे लम्बा होता। साथ ही मेरे महबूब को भी मेरी उतनी ही ज़रूरत होती जितनीमुझे उसकी ज़रूरत थी। मैंने विवाह भी किया था पर यह विवाह उस गमले कीतरह था जिसमें मेरे मन का फूल कभी न उगा।”

“पर यह धरती…”

“तुम्हें इस धरती से डर लगता है ?”

“धरती तो बड़ी ज़रखेज़ है गुलियाना। मैं धरती से नहीं डरती पर

“मुझे मालूम है तुम्हें जिस चीज़ से डर लगता है। मुझे भी यह डर लगताहै।

पर इसी डर से रूष्ट होकर तो मैं दुनिया में निकल पड़ी हूँ। आखिर एक फूलको इस धरती में उगने का हक क्‍यों नहीं दिया जाता!”

“जिस फूल का नाम ‘औरत’ हो ?”जल “मैंने उन लोगों से हठ ठाना हुआ है जो किसी फूल को इस धरती में उगनेहै देते खासकर उस फूल को जिसका नाम औरत हो। यह सभ्यता का युग नहीं।सभ्यता का युग तब आएगा जब औरत की मरजी के बिना कोई औरत के जिस्मको हाथ नहीं लगाएगा।”

“सबसे अधिक मुश्किल तुम्हें कब पेश आई थी ?”

“ईरान में। मैं ऐतिहासिक इमारतों को दूर-दूर तक जाकर देखना चाहती थींपर मेरे होटलवालों ने मुझे कहीं भी अकेले जाने से मना कर दिया । मैं वहाँ दिनमें भी अकेले नहीं घूम सकती थी।”

“फिर?”

“बीच-बीच में कुछ अच्छे लोग भी होते हैं। उसी होटल में एक आदमी ठहराहुआ था जिसके पास अपनी गाड़ी थी। उसने मुझसे कहा कि जब तक वह होटलमें है मैं उसकी गाड़ी ले जाया करूँ। वह मेरे साथ कभी नहीं गया पर उसने अपनीगाड़ी मुझे दे दी। ड्राइवर भी दे दिया। मुझे वह सहारा ओढ़ना पड़ा। पर ऐसा कोईभी सहारा हमें क्‍यों ओढ़ना पड़े?”

“जापान में भी मुश्किल आई ?”

“वहाँ मुझे सबसे बड़ी मुश्किल पड़ी। सिर्फ एक रात एक शराबी ने मेरे कमरेंका दरवाज़ा खटखटाया था। मैंने उसी समय कमरे में से टेलीफोन करके होटल वालोंको बुला लिया था। एक बार फ्रांस में जाने क्या हो जाता अगर कहीं ज़ोरों कीबरसात न शुरू हो गई होती। मैं एक बगीचे में बैठी हुई थी। सामने कुछ दूरी परएक पहाड़ था। मैं वहाँ जाना चाहती थी।

दो आदमी काफी देर से मेरा पीछा कररहे थे। मैं जानती थी कि अगर मैं पहाड़ की किसी निर्जन जगह पर चली गई तोये आदमी वहाँ जाकर जाने क्या करें। पर मेरे दिल में गुस्सा खौल रहा था कि मैंइन गुण्डों से डरकर पहाड़ पर क्‍यों न जाऊँ। इसलिए मैं बगीचे में से उठकर उसतरफ चल पड़ी।

कुछ दूर गई कि ज़ोरों से बरसात होने लगी। मुझे अपने होटलमें लौटना पड़ा । पर यह सब गलत है। मैं यही सोचती हुई चलती जाती हूँ कि आखिरयह सब अभी तक इतना गलत क्यों बना हुआ है जब मनुष्य अपने को इतना सभ्यऔर इतना उन्नत मानने लगा है!”

“तुम अपने गुज़ारे के लिए क्‍या करती हो गुल ?”

“छोटे-छोटे सफरनामे लिखती हूँ। छपने के लिए अपने देश में भेज देती हूँ।कुछ पैसे मिल जाते हैं। कुछ अनुवाद करके भी कमा लेती हूँ। मुझे फ्रेंच अच्छी आतीहै। मैं फ्रेंच की पुस्तकों का अपनी भाषा में अनुवाद करती हूँ। वापस जाकर मैंएक बड़ा सफरनामा लिखूँगी। शायद गीत भी लिखूँ। आजकल जब मैं सोती हूँ तो

एक गीत मेरे दिल में मंडराने लगता है। पर जब मैं जागती हूँ तो मैं उसे खोजनहीं पाती ”।

अच्छा गुलियाना और बातें छोड़ो मुझे उस गीत की बात सुनाओ। मैंनेगीत नहीं कहा गीत की बात कही है।”

“बात ही तो मुझे अभी तक मालूम नहीं है। मैं वह बात खोज रही हूँ जिसमेंसे गीत उगते हैं। बिना बात के ही दो पंक्तियाँ जोड़ी हैं। इससे आगे नहीं जुड़तीं ।बात के बिना भला गीत कैसे जुड़ेगा?” गुलियाना ने कहा और एक टूटे हुए गीतकी तरह मेरी ओर देखा। फिर गुलियाना ने गीत की दो पंक्तियाँ सुनाई-

“आज किसने आसमान का जादू तोड़ा ?

आज किसने तारो का गुच्छा उतारा ?

और चाबियों के गुच्छे की तरह बाँधा

मेरी कमरे से चाबियों को बाँधा ?”

और गुलियाना ने अपनी कमर की ओर संकेत कर मुझसे कहा- “यहाँ चाबियोंके गुच्छे की तरह मुझे कई बार तारे बँघे हुए महसूस होते हैं।

मैं गुलियाना के चेहरे की ओर देखने लगी। तिजोरियों की चाबियों को चाँदीके छल्लों में पिरोकर बना गुच्छा उसने अपनी कमर में बाँधने से इन्कार कर दियाथा। और उसकी जगह वह तारों के गुच्छे अपनी कमर में बाँधना चाहती थी। गुलियानाके चेहरे की ओर देखती हुई मैं सोचने लगी कि इस धरती पर वे घर कब बनेंगेजिनके दरवाज़े तारों की चाबियों से खुलते हों।

“तुम क्‍या सोच रही हो।”

“सोचती थी कि तुम्हारे देश में भी औरतें अपनी कमर में चाबियों का गुच्छाबाँधती है ?”

“हमारी माँ-दादियाँ अपनी कमर में चाबियाँ बाँधा करती थीं”

“चाबियों से घर का ख्याल आता है और घर से औरत के आदिम सपनेका।

“देखो इस सपने को खोजती-खोजती मैं कहाँ पहुँच गई हूँ। अब मैं अपनेगीतों को यह सपना अमानत दे जाऊँगी।”

“धरती के सिर तुम्हारा कर्ज़ और बढ़ जाएगा।”

कर्ज़ की बात सुनकर गुलियाना हँसने लगी। उसकी हँसी उस लेनदार की तरहथी जिसके कागज़ों पर लिखी हुई कर्ज़ की सारी गवाहियाँ झूठी निकल आई हों।

गुलियाना के चेहरे की ओर देखते मुझे ऐसा लगा कि थाने के किसी सिपाहीको अगर गुलियाना का हुलिया अपने कांगज़ों में दर्ज करना पड़े तो वह इस तरहलिखेगा :

नाम : गुलियाना सायेनोबिया।

बाप का नाम : निकोलियन सायेनोबियां।

जन्म शहर : मैसेडोनिया।

कद : पाँच फुट तीन इंच।

बालों का रंग : भूरा।

आँखों का रंग : सलेटी।

पहचान का निशान : उसके निचले होंठ पर एक तिल है और बाईं ओर कीभौंह पर छोटे-से ज़ख्म का निशान है।

और गुलियाना की बातें सुनते हुए मुझे इस तरह लगा कि किसी दिलवालेइन्सान को अगर अपनी ज़िन्दगी के कागज़ों में गुलियाना का हुलिया दर्ज करनाहो तो इस तरह लिखेगा :

नाम : फूल की महक-सी एक औरत।

बाप का नाम : इन्सान का एक सपना।

जन्म शहर : धरती की बड़ी ज़रखेज़ मिट्टी ।

कद : उसका माथा तारों से छूता है।

बालों का रंग : धरती के रंग जैसा।

आँखों का रंग : आसमान के रंग जैसा।

पहचान का निशान : उसके होंठों पर ज़िन्दगी की प्यास है और उसके रोम-रोमपर सपनों का बौर पड़ा हुआ है।

हैरानों की बात यह थी कि ज़िन्दगी ने गुलियाना को जन्म दिया था पर जन्मदेकर उसकी खबर पूछना भूल गई थी। पर मैं हैरान नहीं थी क्योंकि मुझे मालूमथा कि ज़िन्दगी को बिसार देने वाली बड़ी पुरानी आदत है। मैंने हँसकर गुलियानासे कहा-“हमारे देश में एक बूटी होती है जिसे हम ब्राह्मी बूटी कहते हैं। हमारीपुरानी किताबों में लिखा हुआ है कि ब्राह्मी बूटी पीसकर जो कुछ दिन पी ले उसकीस्मरणशक्ति लौट आती है। मेरा ख्याल है कि ज़िन्दगी को ब्राह्मी बूटी पीसकर पीनीचाहिए ।”

गुलियाना हँस पड़ी और कहने लगी-“तुम जब कोई प्यारा गीत लिखती होया कोई भी जब कोई बड़ा प्यारा लिखता है तो वह जंगल में से ब्राह्मी बूटी कीपत्तियाँ ही तोड़ रहा होता है। शायद कभी वह दिन आएगा जब ज़िन्दगी को हंमअपनी बूटी पिला देंगे उसे भूल जाने की यह आदत नहीं रहेगी।”

गुलियाना उस दिन चली गई पर ब्राह्मी बूटी की बात पीछे छोड़ गई। मैं जबभी कहीं कोई प्यारा गीत पढ़ती मुझे उसकी बात याद आ जाती कि हम सब मन

के जंगल में से ब्राह्मी बूटी की पत्तियाँ बीन रहे हैं। हम किसी दिन ज़िन्दगी को शायदइतनी बूटी पिला देंगे कि उसे हम याद आ जाएँगे।

पाँच महीने होने को हैं। मुझे गुलियाना का एक भी खत नहीं मिला। औरअब महीने पर महीने बीतते जाएँगे गुलियाना का खत कभी नहीं आएगा। क्‍योंकिआज के अखबार में यह खबर छपी हुई है कि दो देशों की सीमा पर कुछ फीौजियोंने एक परदेसी औरत को खेतों में घेर लिया। औरत को बड़ी चिन्ताजनक हालतमें अस्पताल पहुँचाया गया।

अस्पताल में पहुँचते ही उसकी मौत हो गई। उसकापासपोर्ट और उसके कागज़ आग से जली हुई हालत में मिले। औरत का कद पाँचफुट तीन इंच है। उसके बालों का रंग भूरा और आँखों का रंग सलेटी है। उसके निचलेहोंठ पर एक तिल है और उसकी बाईं भौंह पर एक छोटे-से ज़ख्म का निशान है।

यह अखबार की खबर नहीं! सोच रही हूँ यह गुलियाना का एक खत है।

ज़िन्दगी के घर से जाते हुए उसने ज़िन्दगी को एक खत लिखा है और उसने खतमें ज़िन्दगी से सबसे पहला सवाल पूछा है कि आखिर इस धरती में उस फूल कोआने का अधिकार क्‍यों नहीं दिया जाता जिसका नाम औरत हो ?

और साथ हीउसने पूछा है कि सभ्यता का वह युग कब आएगा जब औरत की मरजी के बिनाकोई मर्द किसी औरत के जिस्म को हाथ नहीं लगा सकेगा ?

और तीसरा सवालउसने यह पूछा है कि जिस घर का दरवाज़ा खोलने के लिए उसने अपनी कमर में तारोंके गुच्छे को चाबियों के गुच्छे की तरह बाँधा था उस घर का दरवाज़ा कहाँ है ?

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