अजनबी

ने जाने क्‍यों लोकनाथ को अपने जीवन की हर बात किसी न किसी जानवर कीसूरत में याद आती थी।

बचपन के कितने ही पल एक अधाई हुई बिल्ली की तरहम्याऊँ-मयारऊँ करते हुए उसके पास से गुज़र जाते थे।

इन पलों को जैसे उसकी माँने अभी-अभी दूध से भरी कटोरी पिलाई हो और उसके भूरे झबरैले बालों को उसकेबाप ने जैसे अभी-अभी अपने हाथों से सहलाया हो।

लोकनाथ का छोटा भाई प्रेमनाथ अब नेवी में था।

इकहरे बदन का खूबसूरत-सानौजवान। पर छुटपन में वह पढ़ाई में भी उतना ही कमज़ोर था जितना कि वहशरीर से दुबला था।

लोकनाथ जब उसे पढ़ाने के लिए अपने पास बिठाता था तो

और फिर जब लोकनाथ उसे दिलासा देताथा तो जैसे मिन्‍नत सी करती हुई उसकी आँखें पिघलने लग जाती थीं।

और अबनेवी का अफसर बनकर वह नई-नई बन्दरगाहों पर जाता था और वहाँ से तस्वीरेंखींचकर लोकनाथ को भेजता था तो लोकनाथ को उसके साथ बिताए हुए पलों कीयाद ऐसे आती थी जैसे एक छोटा – सा पिल्ला पूँछ हिलाते हुए अपनी गीली जीभसे उसकी तली को चाटने लगा हो।

उसने किसी राजनीतिक पार्टी में कभी दखल देना नहीं चाहा था।

पर अनुभवकी भूख कई बार उसे मीटिंगों में ले जाती थी।

वह नहीं जानता कब खुफिया पुलिसने अपने कागज़ों में उसका नाम दर्ज कर लिया था और उसके बारे में अपनी लम्बी-चौड़ीराय बना रखी थी।

उसकी डिग्रियों से घचराकर जब भी कभी कोई सरकारी दफ्तरउसे नौकरी का वचन दे देता तो पुलिस की यही लम्बी-चौड़ी राय उस वचन कोएक ही झटके में तोड़कर रख देती।

अब जब कि लोकनाथ एक कालेज प्रोफेसरथा और अपने लिए उसने एक निश्चित स्थान बना लिया था तो कई परेशान लमहोंकी याद उसे उन चीलों और बन्दरों की सूरत में याद आती थी जो न जाने कहाँसे आते थे और उसके हाथों को खरोंचकर रोटी का डुकड़ा छीनकर ले जाते थे।

सरकारी दफ्तरों की ढीली रफ्तार उसे केंचुओं – सी लगती किसी भी काबलियतके रास्ते में पेश आने वाली ईर्ष्या उसे साँप की तरह फुँकारती सुनाई देती।

कईयोंकी ईर्ष्या और जलन को उसने अपने शरीर पर झेला था-मैंसे के सींगों की तरह ।

अपने सगे-सम्बन्धियों के फ़िजूल उलाहनों और रूठने के पल उसे अलमारी में घुसेचूहे मालूम होते थे जो कीमती कागज़ों को कुतरते चले जाते हैं।

लोकनाथ को अपनी बीवी बहुत पसन्द थी।

इसी बीवी को लोकनाथ कादिल कहता था कि उसने किस्सा-कथाओं के इश्क से भी ज़्यादा इश्क किया था।

उसके साथ बिताई और बीत रही घड़ियाँ लोकनाथ की नज़र में ऐसे थीं जैसेनन्ही -नन्ही चिड़ियाँ उसके आसपास चहकती हों जैसे कुंजों की एक कतार बादलोंको काटकर गुजरी हो जैसे घुग्गियों के कुछ जोड़े उसकी खिड़की में आकर बैठगए हों जैसे सुग्गों का एक झुण्ड उसके आँगन के पेड़ पर आ बैठा हो।

अपनीबीवी के खत और बीवी के नाम लिखे हुए अपने खत लोकनाथ को हमेशा उनकबूतरों-से लगते थे जो किसी दीवार की ओट में घोंसला बनाने के लिए तिनके जोड़तेरहते हैं।

विवाह से पहले लोकनाथ अपनी बीवी को उसके जन्मदिन पर एक किताबभेंट किया करता था।

विवाह के बाद हर साल उसके जन्मदिन पर उसके होंठ चूमताथा और कहता था “मेरी उमर का यह साल एक किताब की तरह तुम्हारी नज़र ।”

इस तरह लोकनाथ अपनी बीवी को अब तक अपनी उमर के पच्चीस साल पच्चीसकिताबों की तरह सौगात में दे चुका था।

उसे यकीन था कि उसके जीते जी उसकीबीवी का कोई ऐसा जन्मदिन नहीं जाएगा जब कि वह अपनी ज़िन्दगी का कोईसाल एक खुली किताब की तरह उसे भेंट नहीं करेगा।

सिर्फ एक बार ऐसा हुआ था-बाईस साल पहले की बात है-एक सुबहलोकनाथ चारपाई से उठा तो उसका बदन तप रहा था। रात को वह अच्छा-भत्नासोया था।

गरीवाला एक केक लाकर उसने अपनी अलमारी में रखा था।

इस बारन जाने कैसे उसकी बीवी को अपना जन्मदिन याद नहीं रहा था।

शायद इसलिएकि उसकी एक बहुत पुरानी सहेली कई सालों बाद उस दिन विदेश से लौट रहीथी और उसने उसे मिलने के लिए जाना था।

लोकनाथ ने सुबह अपनी बीवी कोचौंकाने के लिए केक लाकर आलमारी में छुपा दिया था।

पर सुबह जब वह उठातो उसके माथे में ज़ोरों का दर्द हो रहा था।

बीवी के साथ उसने चाय भी पी औरकेक भी खाया उसे चौंकाया भी उसके होंठ चूमकर उसे अपनी उमर का एक सालकिताब की तरह सौगात में भी दिया। पर उसके बाद वह सारा दिन चारपाई सेनहीं उठ सका।

उस दिन वह सोच रहा था कि जो किताब इस बार उसने अपनीबीवी को दी थी उस किताब का एक पन्‍ना उसमें से फटा हुआ था ।

उस रात वहफटा हुआ पन्ना किसी जानवर के टूटे हुए पंख की तरह उसकी छाती में हिलतारहा।

लोकनाथ की ज़िन्दगी के कुछ पल मासूम उड़ते परिन्दों की तरह थे कुछपालतू परिन्दों की तरह और कुछ जंगल के जानवरों की तरह।

पर किसी पल सेवह कभी डरा नहीं था चौंका भी नहीं था।

पर एक-लोकनाथ की ज़िन्दगी में एकवह घड़ी भी आई थी – मुश्किल से पन्द्रह मिनटों के लिए-जो एक बार एक चमगादड़की तरह उसके मन में चली आई थी और बेशक होश-हवास की सारी खिड़कियाँखुली थीं पर वह घड़ी एक अन्धे चमगादड़ की तरह बार – बार दीवारों से टकरातीरही थी और बार-बार लोकनाथ के कानों पर झपटती रही थी।

लोकनाथ ने घबराकरकानों पर हाथ रख लिए थे और कुछ मिनटों के लिए उसे आवाज़ें सुनाई नहीं दीथीं उसकी जमीर की आवाज भी नहीं पर एक आवाज थी जो उस समय भी कनपटियोंमें उसे सुनाई देती रही थी और खून की इस आवाज़ से छुटकारा पाने के लिएउसने… ।

बाईस साल बीत गए थे। पर वह घड़ी मुश्किल से पन्द्रह मिनटों की वहघड़ी लोकनाथ को जब कभी याद आ जाती-याद नहीं आती थी बल्कि चमगादड़की तरह उसके सिर पर उड़ती थी – तो लोकनाथ घबराकर उसे जल्दी बाहर निकालदेने के लिए उसके पीछे दौड़ने लगता था।

इस चमगादड़ जैसी घड़ी के आने का कोई समय नहीं था।

कभी ‘फ्रायड’के पन्‍ने उलटते हुए वह अचानक आ जाती थी तो कभी किसी खूबसूरत कविताको पढ़ते हए वह अचानक आ जाती थी।

एक बार अपने नए जन्मे बेटे की गर्दनमें से दूध की महक सूँघते हुए भी लोकनाथ को वह चमगादड़ दिखाई दिया था।

और आज जब लोकनाथ की बड़ी बेटी सुचेता मायके के प्रसूत-काल काटकर ससुरालजाने लगी थी और नन्‍हें से बालक को झोली में लेकर जब उसने अपने बाप सेमिन्‍नत की थी कि उसकी छोटी बहन रीता को वह कुछ दिनों के लिए उसके साथससुराल भेज दे क्‍योंकि छोटा-सा बालक शायद उससे अकेले न सँभले तो लोकनाथके चेहरे का रंग पीला पड़ गया था।

एक चमगादड़ उसके सिर पर मँडराने लगाथा।

आँगन में बैठी उसकी बीवी उसकी बेटी उसे लेने आया उसका खाविन्द झोलीमें पड़ा बच्चा कुछ दूर पर बैठी उसकी दूसरी बेटी आँगन में कैरम खेल रहा उसकाबेटा-सारे के सारे जैसे ओझल हो गए।

होश-हवास की सारी खिड़कियाँ खुली थींपर एक अन्धा चमगादड़ दीवारों से सर पटक रहा था लोकनाथ के कानों पर झपटरहा था और लोकनाथ उसे जल्दी से बाहर निकाल देने के लिए अपने मन की चारोंनुक्कड़ों में दौड़ने लगा।

यह चमगादड़ एक स्मृति थी। बात बाईस साल पहले की थी-लोकनाथ केघर जब पहला बच्चा हुआ था यही सुचेता। लोकनाथ की बीवी बेहद कमज़ोर होआई थी।

अपनी बीवी को मायके से अपने घर लाने की जगह वह उसे पहाड़ परले गया था।

छोटा-सा बच्चा न उससे सम्भल पा रहा था न उसकी बीवी से इसलिएवह अपनी बीवी की छोटी बहन को भी अपने साथ पहाड़ पर ले गया था।

पन्द्रहसालों की वह उर्मी उसे बिलकुल अपनी बहन-सी दिखाई देती थी या अपनी बेटीकी तरह जो कुछ सालों बाद उसी की उमर की हो जानी थी।

कई बार बच्ची जबसो रही होती थी तो उर्मी को घुमाने के लिए वह अपने साथ ले जाता था। उसकीबीवी अभी चल नहीं सकती थी।

कहीं-कहीं चीड़ के पेड़ों के नीचे झरे हुए तिनकोंकी तहें बैठ जाती थीं।

उर्मी दौड़ पड़ती थी तो लोकनाथ उसे फिसलने से बचानेके लिए हाथ पकड़ लेता था।

उसने यह कभी नहीं सोचा था कि इस उर्मी को उसकेहाथों कभी ठेस भी लग सकती थी।

एक बार सैर के लिए जाते वक्‍त उसने अपनीबच्ची की गर्दन को चूमा।

सो रही बच्ची में से सौँफिया दूध और पाउडर की अजीब-सीगन्ध आ रही थी।

बच्ची की माँ भी बच्ची के पास लेटी हुई थी।

लोकनाथ ने उसकेकान के पास होकर धीरे से अपने होंठ छुलाए तो बच्ची वाली गन्ध उसे अपनीबीवी के बालों में से भी आई।

और फिर उसी दिन की बात है सैर करते हुए जबउसने उर्मी का हाथ पकड़कर उसे फिसलई चढ़ाई पर चढ़ने के लिए सहारा दियातो उसके कन्धे को छूती हुई उसकी साँस में से भी उसे वही गन्ध आई।

लोकनाथअपनी बीवी को मज़ाक करता आया था और उर्मी से भी बोला “बेबी का सौंफियादूध लगता है तुम दोनों को भी अच्छा लगने लगा है।”

इसके आगे लोकनाथ को नहीं मालूम कि क्‍या कैसे हुआ।

एक गन्ध थीजो उसके गले सिमट आई थी-सौंफिया दूध की पाउडर की गुदाज़ चमड़ी कीऔरत के अंगों की और चीड़ के पेड़ों की।

और लोकनाथ को लगा कि जंगल कीखुली हवा में भी उसका दम घुट रहा था। और फिर यह गन्ध कुहासे की तरह उठीऔर उसके गले से होकर माथे में छा गई।

और फिर सारे चेहरे उस कुहासे कीओट में छुप गए-उर्मी का चेहरा उसकी बीवी का चेहरा उसकी बच्ची का चेहरा।

चेहरों का अहसास होता था-पर पहचाने नहीं जाते थे।

फिर लोकनाथ को लगाकि दूर-पास कहीं कोई बस्ती नहीं थी।

जहाँ तक नज़र जाती थी-वहाँ तक सिर्फखंडहर ही थे।

फिर किसी खंडहर में से चमगादड़ों की एक तेज गंध उठी औरउसके सिर में छा गई।

फिर उसे लगा कि किसी दीवार की ओट से निकलकर एकचमगादड़ उसके कानों पर झपटने लगा था।

उसने घबराकर दोनों हाथ कानों पररख लिए थे।

कुछ मिनटों के लिए उसे कोई आवाज़ सुनाई नहीं दी थी – ज़मीर कीआवाज़ भी नहीं पर एक आवाज़ उसे अब भी सुनाई दे रही थी – सुनाई कानों सेनहीं दे रही थी बल्कि खून की हर एक बूँद से उठ रही दिखती थी।

यह जैसे एक बहुत बड़ी साज़िश थी।

ज़मीर की आवाज़ के खिलाफ खूनकी आवाज़ की साज़िश थी-चेहरे की हर पहचान के खिलाफ एक बूँद की साज़िशथी-जंगल की खुली हवा के खिलाफ एक गन्ध की साज़िश थी-हर आबादी केखिलाफ हर खंडहर की साजिश थी।

लोकनाथ किसी की कोई साज़िश न समझ सका पन्द्रह मिनटों का वह समयजब उसकी उमर से टूटकर एक अंग की तरह दूर जा पड़ा तो लोकनाथ को लगाकि उसकी सारी ज़िन्दगी अपाहिज बनकर रह गई थी।

उस शाम जब वह घर लौटा उसकी बीवी के कमरे में जो मोमबत्ती जल रहीथी लोकनाथ को लगा उस मोमबत्ती की लपट उसके चेहरे की तरफ देखकर थरथरातीहुई जैसे जल्दी से बुझ जाना चाहती थी।

जब रात घिर आई तो अँधेरा लोकनाथ को अच्छा लगा।

पर फिर उसे लगाकि एक अँधेरा उसकी छाती में घिर आया था।

अँधेरे का एक टुकड़ा रात के अँधेरेसे टूटकर अलग जा पड़ा था। रात का अँधेरा तालाब के पानी की तरह ठहरा हुआथा जिसमें से एक गन्ध उठ रही थी।

उस रात लोकनाथ को कितने ही ख्याल आए।उसे लगा कि वे सारे ख्याल इस तालाब में तैरते हुए मच्छरों जैसे थे।

दूसरे दिन वह पहाड़ से लौट आया था । उर्मी को उसके माँ-बाप के पास छोड़आया था। और फिर उर्मी को उसके विवाह के दिन एक बार भरे आँगन में मिलनेके सिवा वह कभी नहीं मिला था।

यह एक माफी थी जिसे वह सारी उमर अपनेको गैरहाज़िर रखकर उर्मी से माँगता रहा था।

“पापाजी !” सुचेता ने एक मिन्‍नत से लोकनाथ की खामोशी तोड़नी चाही।और धीरे से बोली “आप क्या सोच रहे हैं पापा ? वैसे मैं जानती हूँ आप न नहींकरेंगे ।”

“क्या ?” लोकनाथ ने हैरान होकर अपनी बेटी की तरफ देखा। यह बेटी उसेबहुत प्यारी थी। उसकी बात उसने कभी नहीं टाली थी।

पर वह हैरान था कि अगरकोई होनी वक्‍त के साथ मिलकर एक साज़िश करने लगी थी तो उसकी बेटी कोइस साज़िश की समझ क्‍यों नहीं लग रही थी।

“रीता को कुछ दिन मैं अपने साथ ले जाऊँ? यह सोनी मुझसे सम्भलती नहीं…”सुचेता फिर कह रही थी।

साथ में माँ ने भी हामी भरी “एक महीने तक रीता काकालेज खुल जाएगा यही छुट्टियों का एक महीना ही है…एक महीना ही सही…राजेन्द्रभी ज़ोर डाल रहे हैं।”

“राजेन्द्र बड़ा होनहार है” लोकनाथ को ख्याल आया और फिर अपने जंवाईके चेहरे की तरफ देखते हुए उसे लगा कि कोई होनी एक पागल कुत्ते की तरह – इस

अच्छे लड़के को काटने के लिए तिलमिला रही थी।

वह तनकर खड़ा हो गया ऐसेजैसे वह उसे पागल कुत्ते से बचा सकता था।

“मैं अगले महीने खुद आकर रीताको छोड़ जाऊँगा” राजेन्द्र ने धीरे से कहा।

“नहीं बिल्कुल नहीं ।” लोकनाथ ने ज़रा सख्ती से कहा सबने घबराकर पहलेलोकनाथ की ओर देखा फिर एक-दूसरे की ओर ऐसे जैसे उन्होंने लोकनाथ कीआवाज़ नहीं सुनी थी किसी बड़े अजनबी की आवाज़ सुनी थी।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Solverwp- WordPress Theme and Plugin