फर्क

जोखन कामत का मन व्यग्र हो रहा था ।

रत्ती भर भी चैन नहीं था ।

कलबड़े बेटे कामेश्वर ने कह दिया था-“क्या…?

क्या आप हमलोगों कानाक-कान कटाना नहीं छोड़ेंगे ?

आपका बाजार जाना रस्सी बेचना…आश्चर्य लगता है…।”

उस समय जोखन गरदामी’ में फूल लगा रहा था ।

बेटे की बात ने मन की फुनगी पर बैठ मानो पूरी शाख को झकझोर दियाहो । ऐसा लगा जैसे मन के उद्देलन ने उन्हें असंतुलित कर दिया हो । माथेसे जैसे भादो की नदी इतराने लगी हो ।

जिस कला के कारण जोखनआस-पास के इलाके में पहचाने जाते थे जिस कला के बल पर उन्होंनेअपना व अपने परिवार का पालन-पोषण किया प्रगति के पथ काअनुसरण किया आज उसी कला के कारण बेटे ने उनसे ऐसी बात कही ।

एक दिन जोखन कामत की पत्नी ने डरते-डरते कहा था या कहें किआगाह किया था-“एक बात कहूँ…?”

“क्या है? कहो न…?”

“अब बाजार जाना छोड़ दीजिए ।…और हाट ही क्‍यों रस्सी बाँटना भीछोड़ दीजिए ।”

अँय तुम भी यही कहती तो? तुमने तो दुनिया देखी है । साथजिंदगी जिया है…ऊँच…नीच…सब कुछ जानती हो ।”

“मैं नहीं कह रही हूँ। बच्चे बोलते हैं कि लोगों ने उनका बाहर

निकलना दुर्लभ कर दिया है । लोग उनसे कहते हैं-इतना कमाए-धमाएधन-सम्पत्ति जोड़े । चारों तरफ लोग पहचानते हैं और पिता रस्सी बॉँटकरबाजार में बेचते हैं ।” कहते-कहते बुढ़िया का मन रुआँसा हो गया था ।

जोखन पत्नी की बात सुन व्यथित तो हुआ था पर उसने अपना अपनाकाम नहीं छोड़ा था ।

जोखन के मन में अपने काम के प्रति काफी सम्मान था । केवल वहीनहीं आस-पास के लोग भी आदर देते थे । उसे इसका गर्व भी था ।

आस-पास के इस इलाके में कुछ चीजें मशहूर थीं जो आज भी हैं।कई वस्तुएँ भूमि के आधार पर गाँव के आधार पर तो कुछ व्यक्ति सेजुड़कर मशहूर थीं ।

उन वस्तुओं में मशहूर थे-चानी-मानी का पान बंगहात का मखानविट्ठो का ताशा सरिसब का लड़डू सिजील का चिड़बा लोहफा का सूपएकम्बा का नौटंकी और वैसे ही मशहूर था सिनेहिया का सरौता दरबारीदास का गीत उमाकांत का नाटक और जोखन कामत की रस्सी ।

कोई सरहदिया बछड़ा खरीदकर लाता तो उसकी इच्छा होती कि इसकेगले में जोखन कामत के हाथ की कंठपाश वाली घुँघरू बाँध देता । कमालकी शोभा होती । कोई किसी के खलिहान में सुंदर कराम देखकर पूछता-“क्या फलाँ बाबू क्या यह जोखन वाला कराम है ?”

“हाँ जोखन वाला!” लोग खुशी से उत्तर देते । जोखन वाला मतलबजोखन कामत के हाथ का बँटा हुआ ।

“कुछ धूर्त व्यापारी नकली सामान बेचते हैं और कहते हैं-यह जोखनवाला माल है इस तरह की बातें होतीं । फिर भी पारखी लोग कहते किजोखन के माल का नकल करना आसान नहीं है ।

उसकी बँटाई ही अलगतरह की होती हे । कितने ही लोग यह दावा करते-“चाहे कितना ही बड़ागट्ठर क्‍यों न हो अगर उसमें एक भी जोखन वाली रस्सी मिला दी जायफिर भी वह अलग से पहचानी जाएगी ।”

खेती-बाड़ी से जुड़े लोगों के बीच यह कहानी मशहूर थी कि जोखन

खैर जो भी हो पर जोखन कामत कीकला में विलक्षणता थी। उसका यशोगान था ।

वास्तव में जोखन कामत अपनी कला के प्रति समर्पित व्यक्ति था ।वह अपनी कला को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा ध्येय मानता था ।जब वह छोटा था तभी उसके माता-पिता की मृत्यु हो गई थी ।

उसकेचाचा ने उसे मवेशी चराने के काम में लगा दिया था । जोखन उस मालिकके घर पर सारे दिन कई तरह के काम करता था । उसका मुख्य काम भैंसचराना था । उसके बाद भैंस की ही विभिन्‍न सेवा। इन सबसे समय बचतातो फूदन झा के दालान पर बैठता था वह भी दोपहर में जब काम सेथोड़ा समय बच जाता ।

फूदन झा बहुत गुणवान था । वह खेती-बाड़ी के कई तौर-तरीकेजानता था । वह दोपहर के समय अकसर रस्सी बॉटता था । अपने लिएभी और दूसरों के लिए भी । जोखन फूदन के पास बैठकर तरह-तरह केरस्सों को बॉटने की कला सीखता ।

एक दिन फूदन झा बहुत प्रसन्‍नता से बोल पड़े-“रे जोखना तू तोकमाल की रस्सी बाँटेगा । अगर तेरे हाथ में यह कला बनी रहेगी तब तोतुम अँगूठा कटाओगे । आ…आ…सीख रस्सी बाँटने के और भी तरीकेसीख ले ।” और फूदन झा से ही जोखन कामत ने रस्सी बाँटना सीखा ।इस कला में जोखन निष्णात हो गया ।

कुछ दिनों के बाद फूदन ने उसे सलाह दी-“रे जोखना तेरे जैसा दक्षव्यक्ति व्यर्थ ही चरवाही का काम करता है । तू तो रस्सी बाँट और बाजारमें बेच । तेरी सारी गरीबी समाप्त ।”

“ऐसा हो सकता है मालिक ?” उसने सकुचाते-सकुचाते पूछा था ।“हाँ रे होगा नहीं ? तेरा हाथ तो ईश्वर का वरदान है। तू इतने अच्छेकलात्मक ढंग से मजबूती से रस्सी बाँटता है कि तू इसी से ढेरोंकमाएगा।” और जोखन ने अपने गुरु की बात मान मवेशी चराना छोड़दिया। अब वह सन की रस्सी बनाने में पूरी तरह रम गया ।

जोखन को आज भी याद है-जब वह पहले दिन बाजार गया था ।दक्षिणबारी टोले के वैद्य जी ने उसकी बँटी हुई रस्सी देखकर सारी रस्सियाँएक साथ खरीद ली थीं और पूछा था-

“किस गाँव के रहने वाले हो…?”

“रूपौली”

“किसके बेटे हो ?”

“मलहू कामत का ।”

“मलहू कामत ?”

“रामलगन उसके बड़े भाई थे ।”

“ओह अच्छा…अच्छा…। बौआ कहीं बाहर रहते हो ?”

“नहीं ।”

“यह रस्सी हाथ से ही बाँटे हो ?”

“जी ।

मैंने समझा कि तुम कहीं बाहर रहते हो। मैंने सुना है कि अब रस्सीबाँटने की तरह-तरह की मशीनें आ गई हैं । मैंने समझा कि ये रस्सियाँ भीउन्हीं मशीनों की बँटी हैं । हाथ से इतनी सधी हुई कुशलता से…वाह…वाह…! जुग…जुग…जियो बेटा!” बोलते हुए बूढ़े वैद्य जी चल दिए ।

वैद्य जी की इस बात से जोखन अदूभुत उत्साह से भर गया ।

उत्साह और आनंद की इसी मनःस्थिति में धीरे-धीरे उसकी कला काविकास होता गया । अब उसकी कलात्मक मजबूत रस्सियों की लोकप्रियतालोगों में इतनी बढ़ गई कि वह लोगों की माँग के अनुसार रस्सियाँ बनानहीं पाता था । फिर भी जितनी उसकी क्षमता थी उतना सूत सुतलीटकुए पर कातता और फिर उसकी रस्सी बाँटता ।

एक बार उसके पास नारायणपुर के बड़े जमींदार का बुलावा आया-“सरकार ने बुलाया है।” कारिंदे ने कहा

जोखन कामत चल पड़ा नारायणपुर । रास्ते भर वह यही सोचता रहाकि-‘पता नहीं जमींदरवा कया कहेगा… ।

मन में आशंका लिये वह चलाजा रहा था ।

‘सुनते हैं कि जमींदार बड़ा क्रूर है ।’

जोखन डरते-डरते वहाँ पहुँचा ।

उसके वहाँ पहुँचते ही जमींदार ने कहा-“आओ कामत देखों यहीदोनों बछड़े सीतामढ़ी से लाये गए हैं । तुम्हें इन्हें सजाना है । तुम तो इनकेनस्ल की भी पहचान रखते हो। देखो पसंद करो…।”

अच्छी तरह जाँच-परखकर जोखन ने कहा था-“जी सरकार अच्छीनस्ल का है । पानीदार बछड़े हैं ।”

“तुम्हें पसंद आया ?”

“जी अच्छी चीज किसे पसंद नहीं आएगी ?

“ठीक है । मैंने तुम्हें इसलिए बुलाया है कि तुम दोनों जोड़ों के लिएगरदामी बना दो । यहीं रहो…खाओ पीओ और बनाओ ।”

“पर टकुआ तो गाँव पर ही है सरकार !”

“तो क्या हुआ ? ले आना ।” यह कहकर जमींदार साहब चुप हो गए ।

जोखन चुपचाप खड़ा रहा बोला कुछ नहीं ।

जमींदार साहब जोखन से हँसते हुए बोले थे-“ऐसा लगता है कि तुम्हेंगाँव में ज्यादा मन लगता है। ठीक है गाँव से ही बनाकर ले आना ।”यह कहकर वे थोड़ी देर मुस्कराते रहे…और फिर अपने कमरे में चले गए ।

जोखन वहाँ से गाँव आया और पाँच दिन में अव्वल गरदामी बनाकरजमींदार साहब को देने नारायणपुर के लिए चल पड़ा । गरदामी में उसनेऐसे डिजाइनदार रंगीन फूल लगाए थे जो देखने में खिले हुए कमल-सेलगते थे । रास्ते में उस कलात्मक गरदामी को जो भी देखता वह मुग्धहो जाता । जोखन ग्राहकों की निगाह बचाकर वहाँ पहुँचा ।

चारों बछड़ों को गरदामी पहनाये गए । उन बछड़ों के गले में गरदामीपहनाने के बाद जमींदार साहब के मुँह-लगे नौकर ने जाकर उन्हें सूचनादी-“सरकार बछड़ों को गरदामी पहना दिये गए ।”

जमींदार साहब अपने कमरे से बाहर आए । सभी गंभीर थे । जोखनका पैर काँप रहा था मानो अब उसकी कला की परीक्षा है । अगर किसीने उसकी कृति में खोट निकाल दिया तो उसके लिए यह बड़ी चोट होगी ।

जमींदार साहब थोड़ी देर तक गरदामी पहने उन बछड़ों को देखते रहे ।फिर अपने दीवान से बोले-“दीवान जी इसके गाँव में वह भी इसके घरके पास अपने खेत पड़ते हैं ?”

“बहुत हैं सरकार ।” दीवान जी आगे आते हुए बोले ।

“ठीक है। जोखन कामत के नाम एक बीघा खेत का चालान काटदो। मेरी ओर से यह इसका इनाम है और मजदूरी में दस पसेरी चावलउसी हिसाब से दाल और सब्जी अपने कारिंदे के हाथ से भिजवादीजिए ।”

“जी सरकार!” दीवान जी बोले ।

जमींदार साहब ने जोखन से पूछा-“कहो कलाकार खुश हो ?”

“जी सरकार” बोलते हुए वह गद्गद हो गया । पुरस्कार और कलाकारशब्द के संबोधन से उसे आदर-सम्मान के एक ऊँचे आसन पर बैठा दियागया था । उसे इतनी खुशी हुई कि उसकी आँखों में आँसू आ गए ।

इस अवसर के बाद जोखन कामत की कला की प्रसिद्धि चारों तरफफैल गई। जोखन कामत कला संसार के एक नाम हो गए । अब तोबहुत-से लोग उसे “कलाकार” कहने लगे ।

सच तो यह है कि इस कला के बल पर जोखन को बहुत सम्मानमिला। उसने धन-सम्पत्ति कमाया परिवार की जिम्मेदारियों का सुचारुरूप से निर्वाह किया ।

वह खुद तो पढ़-लिख न सका मगर बेटों को पढ़ाया-लिखाया । बड़ेबेटे को बी.ए. पास करने के बाद कोसी प्रोजेक्ट में नौकरी मिल गई ।छोटा बेटा ज्यादा होशियार था वह पढ़-लिखकर इंजीनियर बन गया ।

जिन दिनों वह पढ़ रहा था उन दिनों जोखन सोचा करते थे कि यह छोटाप्रढ़-लिखकर कुछ नया ईजाद करेगा पर कुछ नहीं हुआ । वह नौकरी हीपा सका। मन की इच्छा मन में ही रह गई। वह लोगों से कहता-“वहबाप धन्य है जो बेटे के नाम से पहचाना जाता है और वह बेटा जो अंततक पिता के नाम से ही पहचाना जाए तो समझ जाइए कि उस वंश केबड़प्पन का विकास रुक गया ।”

अपने बेटे के बारे में वह ऐसा ही सोचता था।

वह सोचता था कि वह पढ़-लिखकर संसार के सामने कोई नईजानकारी लाएगा । ऐसा करने से ही उसकी पहचान बनेगी। पर ऐसा कुछनहीं हुआ । अधिकांश लोग ऐशो-आराम मौज-मस्ती करने के लिए पढ़तेऔर नौकरी करते हैं। उसने भी वही किया । खूब धन कमाया ।

जोखन भी यह अच्छी तरह समझता था कि पेट पालने के लिए इसरस्सी बाँटने के काम में अब खटना जरूरी था पर अब उसका काम उसकेलिए आमदनी का साधन मात्र न रहकर उसकी जिंदगी का हिस्सा बनगया था। जीवन जिसे छोड़कर जी नहीं सकता था जी नहीं पाता था ।

पहले जब वह कला का मर्म समझने लगा था अपने काम की संरचनामें आनंद लेने लगा तब उसके मन में एक कामना जगी कि वह अपनीयह कला औरों को भी सिखाए । उसने कितनों को सिखाया भी। उसकेकितने ही पटु शिष्य भी हुए । लेकिन वह यह देखकर हैरान रहता था किअब लोगों में हाथ की इस कला के प्रति उत्सुकता कम हो रही थी ।

लोग सभी काम जल्दी चाहते थे। इसीलिए लोग मशीन से सारे कामलेना चाहते थे ।

इस प्रवृत्ति के कारण सहज नैसर्गिक सुंदरता कम होतीजा रही है। जोखन ऐसा ही कुछ अनुभव करता। उसने अपनी यह बातकई लोगों से कही पर कोई उसकी बात ठीक से समझ न सका ।अरिपन-सिक्‍की-मौनी जैसी मिथिला की हस्तकलाएँ सम्मानित होने लगींतब उसे थोड़ी आस बँधी थी पर उसने फिर देखा कि अब इन कामों मेंभी व्यापारिक बुद्धि ज्यादा आ गई है तो वह दुःखी रहने लगा ।

इधर बेटे उसे दूसरों के मार्फत इस काम को करने से मना करते-“आप यह काम मत कीजिए ।”

कूटुंब के लोग भी कहते-“आपको किस बात की कमी है !”. जोखन ऐसी बातें सुनकर मन-ही-मन हँस पड़ता । कभी-कभी उसेआश्चर्य होता कि लोग इस वृद्धावस्था में भी उसकी कला की जीवंतताको क्‍यों नहीं समझते हैं ? सभी कुछ पैसे की नजर से क्‍यों देखते हैं ?

कल बड़े बेटे कामेश्वर ने नाक-कान कटाने की बात कही तबसे उसकेमन को चैन नहीं पड़ रहा है।

“वह क्या करेगा…?”

यह सवाल उसके मन को मथने लगा । बसकेवल खाएगा-पिएगा…टुकुर-टुकुर ताकता रहेगा ।

ऐसा जीवन जीते हुए अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करते हुए वह कैसे चैनसे जिएगा…।

उसका मन अजीब-सा हो उठा। उसके मन में यह विचारआया कि उसके बेटों ने उसके सामने अपनी कमाई से उसकी कला कोठोकर मार दी हो। उसका शरीर सिहर उठा…।

उससे रहा नहीं गया।उसने बड़े बेटे को बुलाया और कहा-

“सुनो मैं रस्सी नहीं बाँटता अपनी जिंदगी जी रहा हूँ । अगर तुम्हारादिमाग यह बात नहीं समझ पाता तो समझो कि तुममें और मुझमें यहीफर्क है । तुम्हारा उद्देश्य केवल धन कमाना है । मेरी यह कला आज भीमेरे लिए मान-सम्मान है विकास है। सभी लोग अकेले हैं। तुम भी। मैंभी ।

तुम्हारा अपना सुख-दुःख है मेरा अपना । जैसे शरीर के रोगअपने-अपने वैसे ही मन का भी अपना-अपना । तुम्हारा जीवन मैं कैसे जीसकता हूँ ? तुम अलग रहो…मुझे भी अलग से जीने दो ।”

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