मिट्टी

“मन भटकता रहता है। मैं यूँ ही अकेले घूम रहा था।”

“तो मुझे देखकर खड़े क्‍यों हो गए ?”

मैंने कमलनाथ से पूछा।

“तुम मेरे दोस्त हो न! तुम्हारी आँख का क्‍या हाल है?” उसने पूछा

“मतलब?” मैं चौंका ।

“ऐ भाई तुम्हारे सिर पर कभी बेल गिरा था ?”

“नहीं। क्यों ?” मुझे आश्चर्य हो रहा था कि कमलनाथ क्‍या कहनाचाहता है ।

“तो सुनो। एक बार मेरे सिर पर छोटा बेल गिर पड़ा था। अगरवही बड़ा बेल गिरता तो समझो जय गणेश हो गया होता।

चक्कर-साआया। मैं गिरने को हुआ। वहीं पड़ी चौकी पर बैड गया। लोग हँसनेलगे। मुझे उस हँसी पर क्रोध आते-आते हँसी आ गई पर राजनाथ

काका एकदम चुप थे। वह एकटक मेरी ओर देखने लगे। कुछ नहींबोले। राम झा ने पूछा-

“काका कया देख रहे हैं ?”देख रहा हूँ कि भोगी भाई का बेटा कितना अभागा है। इतना बड़ा

हो गया और इसे यह नहीं मालूम कि बेल के पेड़ के नीचे नहीं टहलनाचाहिए।” काका बोले ।

“इसमें उसका क्‍या दोष है ?”“अरे भाई सबकी अपनी ही गलती होती है। “होनी” या संयोग जैसी

कोई बात नहीं होती।” मैंने काका की आँखों में उस समय जो डर देखातो ऐसा लगा मानो कह रहे हों-“अच्छा हुआ मरा नहीं।

गनीमत है ।और वे उठकर ठंडा तेल ले आए और मेरे सिर पर लगा दिया। बोले-

“क्या करोगे? बेवकूफ हो। बेल के पेड़ के नीचे क्या करने आए थे?”कहकर वे मेरा सिर सहलाने लगे थे। उनके हाथ फेरने से दर्द और बढ़गया। मैंने कहा भी “काका छोड़ दीजिए ।

दर्द बढ़ रहा है।” पर वे बोले“ठीक हो जाएगा। यह तेल इतना असरदार होता है कि सभी दर्दों कानाश कर देता है। अभी दुकान से लाया हूँ। तुम्हारी काकी के पैर में दर्दहोता रहता है इसीलिए रखता हूँ ।”

मुझे ऐसा लगा जैसे काका की बातें ईरष्याजन्य कुभाव पर सहानुभूतिका लेप लगा रही हो क्योंकि मैंने उनकी पहले और बाद की बातें सुनीथीं। मैंने उनकी आँखों की ओर देखा ।

मैं डर गया।

ऐसा लगा जैसे कोईज्वाला अपनी तपिश से पूस की ठंड में मुझे भीतर-ही-भीतर गरमाते हुएमेरी देह सेंक रही हो । मेरे सिर पर उनका हाथ फेरना मुझे असहज-लगा ।मैंने कहा-“छोड़ दीजिए। दर्द होता है ।”

“अच्छा जब यह तेल दर्द वाली जगह को भिगोएगा तो दर्द ठीक होजाएगा।” काका अपनी समझ से मुझे तसल्ली देते हुए चलें गए।

काका की उस नजर ने मेरे मस्तक को ऐसे ढक लिया कि क्‍याबताऊँ। वैसे जब तक पत्नी जीवित रहीं तब तक उस अवरोध को रोकेरखा था पर जब उसकी मृत्यु हो गई तो काका की आँखों का वह भावफिर जी उठा ।

कमल ने अपनी बात कहकर मेरी तरफ देखा और बोला-“मोहन भाई तुम मेरी बात नहीं समझे तो सुनो-मेरी पत्नी छह महीनेपहले अगहन माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी के दिन मर गई ।

दरअसलवह छह-सात साल से बेटे-बहू के साथ दिल्ली में रहती थी ।

पोता-पोतीहै। उन सबके साथ वह खेलती रहती थी। मुझे तो गाँव पर काम सेफुर्सत ही नहीं मिलती थी । सात बीघा जमीन मेरे हिस्से में थी । पहले दोजोड़ी बैल थे । बाद में जोतने के लिए हलवाहा मिलने में दिक्कत होनेलगी। हलवाहे मिलते नहीं थे ।

तब गाँव में किसी का ट्रैक्टर पकड़ लेताथा ।

गाँव में बहुत-से ट्रैक्टर थे। काम लेने वालों की कमी थी । भाड़ादीजिए काम कराइए। दो भैंस रखी थी । कोई चरवाहा नहीं था ।

अबचरवाहे मिलते कहाँ हैं ? मैं खुद ही ये सारे काम करता। खूब खटता था ।खूब खाता था। खूब सोता था ।

मुझे फुर्सत कहाँ थी जो उनसे बातकरता । अब औरतें बेटे या पति के साथ बाहर ही रहती हैं । इसलिए वहगाँव में अकेलापन महसूस कर रही थी ।

“दरअसल मेरे ससुर आसनसोल में नौकरी कर रहे थे ।

पूरा परिवारवहीं रहता था ।

मेरी पत्नी सेकंड डिवीजन से मैट्रिक पास थी ।

मैं भाइयोंमें अकेला सात बीघा जमीन का मालिक और अर्थशास्त्र विषय से ऑनर्सके साथ बी.ए. पास था। मेरे ससुर ने अपनी बेटी की शादी यह सोचकरकी थी कि मैं भी नौकरी पर बाहर जाऊँगा ।

पर ऐसा नहीं हो पाया। मेरेपिता की मृत्यु हो गई। मैं गाँव में ही रह गया ।

“समय बीतता रहा ।

मेरा बेटा बड़ा होकर दिल्ली में नौकरी करनेलगा । वह भी अपनी पत्नी और बच्चों को लेकर दिल्‍ली आ गया।

उसकेबच्चों को पालने-पोसने में मदद करने के बहाने मेरी पत्नी भी दिल्ली चलीगई। वह इन्हीं बच्चों में मगन थी। मैं गाँव में अपने काम में मस्त रहताथा।

खाना पकाने में भी मुझे ज्यादा समय नहीं लगता था ।

मैं वहाँ मस्तीका जीवन जी रहा था ।

उन छह-सात सालों के दौरान कब मेरी पत्नी कालिवर खराब हो गया उन्हें पता ही नहीं चला ।

बेटे ने वहाँ उनका इलाजएम्स में कराया। मैंने गाँव से दस लाख रुपये भेजे। मैंने बेटे से कहा था –

“मैं अपनी सारी जमीन-जायदाद बेच दूँगा। करोड़ों रुपये खर्च करूँगा।सुनते हैं कि आजकल लिवर बदला जाता है । बदलवा देना पर कुछ भीकामयाब नहीं हुआ। इतना वक्‍त नहीं मिला ।

मेरी पत्नी बीच में ही चलबसी ।

बेटा उनकी लाश लेकर गाँव आया।

मेरी छाती फट गई पर सभीआपस में कानाफूसी करने लगे कि मैं निर्दयी हूँ ।

मैं पत्ती को देखने दिल्लीनहीं गया। लोगों में मुझे दीन-अनाथ समझकर सहानुभूति दिखाने कीप्रवृत्ति बढ़ गई । क्या कहूँ भाई वह सहानुभूति मुझे असहज कर देती है ।

मुझे ऐसी सहानुभूति दिखाने वालों की आँखें काका की आँखों जैसीलगतीं और मैं ऐसी बातों से विकल हो जाता हूँ ।

इसलिए लोगों से दूरभागता रहता हूँ। यूँ ही घूमता रहता हूँ। देखें उस इमली के पेड़ में कितनेही विवर-जैसे हो गए हैं । एक भी पत्ता नहीं है । पेड़ सूखा-सा है । ऐसेपेड़ मुझे अच्छे लगते हैं ।

“ऐ देखो यह सूखी लखनदेई नदी मुझे अच्छी लगती है । सूखे सूनेपड़े खेत और दोपहर की चैती धूप अच्छी लगती है । ये सब मेरे अपनेहैं । सबसे नजदीकी हैं ।

इसलिए मैं इन सबके बीच भटकता रहता हूँ ।तुम कह सकते हो कि मैं पगला गया हूँ । पर ऐसा है नहीं। मेरा दिमागमेरे नियंत्रण में है ।”

मैंने कमल की दास्तान सुनी । मुझे ऐसा लगा जैसे मुझे उसकीहॉ-में-हा मिलाना चाहिए। मैंने कहा-“मुझे भी कभी-कभी ये सब अच्छेलगते हैं ।”

क्यों ? तुम्हारे अंदर भी कोई घाव है ? तुम तो भरे-पूरे दिखाई देतेहो ।” कमल ने मुझ पर नजर टिकाकर देखा ।

“हाँ सबके जीवन में कोई-न-कोई घाव जरूर होता है जो सिर मेंअपनी जगह बनाए रखता है । वह कभी मृतप्राय हो जाता है तो कभी हराहो जाता है ।”

मेरी बात पर वह खुलकर हँसा और बोला-“हा…हा…हा…मोहनभाई । एक बात बताओ तुम दार्शनिक कबसे हो गए ? वैसे साहित्यकारथोड़ा-बहुत दार्शनिक तो होता ही है ।”

“हाँ अब सब कुछ छोड़ दिया है। खेत बटाई पर दे दिया है ।

लोगबटाई पर भी नहीं लेना चाहते । सबके बेटी-बेटा परदेश चले गए हैं ।

आज जो खेती कर रहे हैं वे सब जब बूढ़े होंगे और मर जाएँगे तो यहाँके खेत ऐसे ही परती पड़े रहेंगे और कठहँसी हँसते रहेंगे। हाँ मैं वहीकह रहा था और भैंस को बेच दिया ।

किसके लिए करता ?”

“और पहले किसके लिए करते थे ?” मैंने पूछा

“अरे भाई पहले वह जीवित थी ।” कमलनाथ बोला।

“वह ?”

अरे भाई पत्नी ।”

“पर तुम खुद कहते हो कि वह बेटे-बहू के पास दिल्ली रहती थीं ”मैंने कहा-“हाँ भाई रहती तो थी मगर यह उम्मीद तो बनी रहती थीन कि गाँव आएँगी तो यहाँ की देखभाल करेंगी ।

अब कौन देखेगा ? भूखलगती है तो खाना पकाता हूँ नहीं लगती है तो घूमता रहता हूँ । खैर अभी छोड़ो ये सब बातें। यह बताओ कि अभी तुम कहाँ जा रहे थे ?”

कमलनाथ ने पूछा ।“तुम पहले यह बताओ कि तुम्हें मेरी आँख कैसी लगी ?” मैंने सवातकिया ।

मेरी इस बात पर कमल हँसा और बोला-“देखकर असहज नहींहुआ । चलो बताओ कहाँ जा रहे हो ?”

“मैं गोरीशंकर स्थान के लिए निकला हूँ ।” मैंने कहा ।

मेरी बात सुनकर वह थोड़ा उदास हो गया।

बोला-“वह तो फूल-बगीचेसे भरी-पूरी जगह है ।

वैसी जगह मुझे अच्छी नहीं लगती ।

तब तुम हो।खैर वहाँ से महादेव कोठी जाओगे ? वह एकदम सुनसान श्मशान हैटूटा-फूटा मंदिस भोलेनाथ की असली जगह।”

मैंने कमल की ओर देखते हुए खुद को सँभाला और कहा – “जरूरजाऊँगा । चलो पहले गौरीशंकर मंदिर ।” और वह मेरे साथ चुपचाप चलदिया । मुझे लगा कि वह मन-ही-मन कुछ बड़बड़ा रहा था ।

हम दोनों गौरीशंकर मंदिर गए। उसने बिना इधर-उधर देखे मंदिर केबाहर से ही बैठकर शिव-पार्वती को प्रणाम किया ।

मैं मंदिर में भीतरजाकर भगवान भगवती को प्रणाम कर मंदिर की परिक्रमा की और बाहरआकर उससे बोला-“चलो अब महादेव कोठी ।”

यह सुनकर वह खुशी से भर उठा । वहाँ पहुँचकर वह हाथ-पैर धोकरशिवलिंग के पास साष्टांग लेट गया । मैं महादेव को प्रणाम कर उसकेलौटने की प्रतीक्षा करने लगा ।

थोड़ी देर के बाद वह बोला –

“ठीक है ।” कहकर मैं वहाँ से चल दिया ।

मेरे मन में एक विचार आया । पहले बाढ़ आती थी । उसमें बहुत-सीनई-नई चीजें बहकर आ जाती थीं । एक बार एक छोटा-सा पौधा बहकरआया ।

किसी वजह से वह पौधा मेरे बगीचे में आकर रुक गया । जबपानी कम हुआ तो उस पेड़ की जड़ मिट्टी में दब गई थी ।

मैंने भी उसकीथोड़ी देखभाल की । वह खूब विकसित हुआ । उसमें अद्भुत सुंदरसुगंधित लाल-लाल फूल खिले ।

जो भी इन लताओं और सुंदर लाल फूलोंको देखता खुश हो जाता। मगर उसमें बीज नहीं हुआ जिससे आगेचलकर पौधे की वंश-वृद्धि होती ।

मुझे अब भी उन फूलों की याद आती है ।

मुझे ऐसा महसूस होता हैकि कमल की पत्नी की मृत्यु उसके जीवन में ऐसी ही बाढ़ लेकर आई है ।

आप इस बाढ़ को जो भी नाम दें-करुणा की बाढ़ या और कुछ परअगर कभी इसका जीवन किसी कारण से स्थिर होगा और मिट्टी सेजुड़ेगा तभी इसके जीवन में दोबारा फूलों की बहार आएगी अन्यथा

दो साल के बाद मैं अपने गाँव के पड़ोस में बसे उसके गाँव देवगंजगया था । अलस्सुबह। वहाँ शीशम का पेड़ देखना था । कमल की यादआई । शीशम का पेड़ देखने उसके घर की तरफ निकला । जब मैं वहाँपहुँचा तो वहाँ जो दृश्य देखा-विश्वास नहीं कर पा रहा था ।

उसकी बैठक के आगे रंग-बिरंगे फूल लगे थे । उधर दूसरी तरफ हरीसब्जियों का बागान था । एक खूँटे से एक गाय के साथ उसका बछड़ाबँधा था और कमल-वह बगीचे में पानी दे रहा था । मन में कौतूहलउठा-“यह क्या हुआ ?

जो पत्रहीन नग्न गाछ से अपनापन जोड़ता ‘हा हैवही कमल फिर से पेड़-पौधों में पानी दे रहा है! असुंदर में अपने कोतल्लीन कर देने वाला कमल सुंदरता की पूजा कर रहा है! ऐसा क्‍याहुआ ?

मैं यह सब सोच ही रहा था कि कमल की नजर मुझ पर पड़ी ।

वह मुझे देखते ही चहक उठा और बोला-

“अरे मोहन भाई आओ आओ। स्वागतम्‌…स्वागतम्‌…! बहुत दिनोंके बाद आज सूरज इधर उगा है। तुम्हारे जैसा प्रिय व्यक्ति मेरे गाँव आयाहै।

सच पूछो तो मैं खुद कहीं नहीं जा पा रहा हूँ ।”

“ऐसा क्‍या हुआ?” अपना आश्चर्य छिपाते हुए मैंने पूछा ।

एकदम इतना बदलाव !

“क्या बताऊँ मोहन भाई मेरी सबसे छोटी बहन थी। उसका नापपूर्णिमा था ।

वह मुझसे बीस साल छोटी थी । एक दिन उसके सीने पंदर्द उठा और वह इस दुनिया से चल बसी। उसका एक ही बेटा थेऔर कोई दूसरी संतान भी नहीं थी । उसका नाम दीपक है। क्या सुंदरतेजस्वी बालक है! वह अनाथ हो गया। उसके पिता ने दूसरी शादी काली ।

इस बच्चे की उपेक्षा होने लगी ।

एक दिन मैं हिम्मत कर उसे देखनेगया । बच्चे की देह-दशा और निस्तेज-सा चेहरा देखकर मुझे रोना आगया । मैं अपना सारा दुःख भूल गया।

उसे अपने घर ले आया । तबसेवह मेरे ही पास रहता है । अच्छी पढ़ाई करता है । दूसरी कक्षा में नामलिखा दिया है ।

“अब उसी के लालन-पालन में लगा रहता हूँ। यूँ कहो रम गया हूँ।क्या बतारऊँ जब वह खुश होकर हँसता है तो मानो चाँदनी रात कीरंगोली पर धान का लावा बिखर जाता है । मैं आनंद से विभोर हो उठताहूँ ।” बोलते-बोलते कमल भावुक हो उठा। उसकी आँखें डबडबा गईं ।फिर खुद को सँभालते हुए बोला-

“क्या कहूँ! बहन पूर्णिमा याद आ गई । क्या निशछल थी मेरी बहन!”

मेरा मन भी भावुक हो उठा ।

जीवन में कई बार ऐसे क्षण आते हैं जबभाव व्यक्त करने के लिए शब्द कम पड़ जाते हैं ।

कुछ देर के मौन के बादउसने खुद नीरव वातावरण की जड़ता तोड़ी और बोला-

काफी गायको खिलाता-पिलाता हूँ और इन पेड़-पौधों फूल पर सत प्र हँ।मेरे बगीचे और सब्जियों का बाग देखो । इन सबमें खूब मन लगता है।

“दीपक को खुद ही पढ़ाता हूँ और बच्चे भी पढ़ने आते हैं । भाईआजकल सुख से समय आगे बढ़ रहा है ।” बोलते हुए कमल ने मेरीतरफ देखा और बोला-

अरे तुम अभी तक खड़े ही हो ? कुर्सी पर बैठों । अभी गाय का दूधदुहा है । तुम्हें ताजा दूध की चाय पिलाता हूँ । इतने दिन पर मिले हो ।आज मेरी सब्जी की बगिया से कुछ सब्जी भी लेते जाओ । बहुत स्वादिष्टहै ।” बोलते हुए कमल चाय बनाने चला गया ।

मैंने उसके बाग-बगीचे में चारों ओर नजर दौड़ाई । फूल और सब्जियोंकी सुंदर छटा ने मन मोह लिया । पत्नी के मरने के बाद कमल की स्थितिमेरी नजर में है ।

बहन की मृत्यु से उसे बहुत बड़ा आघात लगा पर…इसबीच वह अपनी मिट्टी तलाशने में सफल रहा । आज भौॉँजे के प्रति स्नेहका वात्सल्य तरंग उसके चेहरे पर साफ-साफ छलक रहा था ।

याद आया बाढ़ में बहकर आए उस छोटे-से पौधे की लता जिसकीजड़ ने मिट्टी पकड़ ली थी और उसमें फूला था लाल-लाल फूल ।

मेरा मन कमल के प्रेम की उस मनोदशा में जैसे गहन रूप से गोतेमारने लगा ।

मेरे मुँह से सहसा निकला-“कमल के प्रेम का यह लाल-लालफूल हमेशा खिलता-फूलता रहे ।” परंतु मन में आया कि कमल से पूछूँ-“बोलो अब तुम्हें मेरी आँख कैसी लगती है ?”

तभी उन फूलों से आ रहीसुगंधित हवा का एक झोंका आया और मेरा मन-प्राण भी सुगंधित करगया।

तब आप ही बताइए-मैं उससे क्‍या पूछता ?

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