मनुष्य नदी है

ट्रेन मुंबई स्टेशन पर खड़ी हुई ।

गाड़ी से उतरने के लिए यात्रियों कीहलचल बढ़ गई ।

श्याम जी भी उतरने के उपक्रम में डिब्बे से बाहर झाँके ।उन्हें बेटा हरिकिशोर दिखाई पड़ा। वह डिब्बे के भीतर आ रहा था ।

बेटेको देखकर उनका मन खुश हो गया ।

जब तक वे बैग उठाकर चलते तबतक बेटा सीट तक पहुँच गया और उनके हाथ से बैग लेकर उन्हेंसहारा-सा देते हुए उतारना चाहा पर श्याम जी को किसी सहारे कीआवश्यकता नहीं थी ।

वे बोले-“चलो चलो मैं उतर जाऊँगा ।”

पिता-पुत्र गाड़ी से उतरे। हरिकिशोर ने बैग रखकर पिता को प्रणामकिया। उसकी आँखों में आँसू आ गए।

“बाबू आप कैसे हैं ?”

हाँ बौआ अब ठीक हूँ । क्या कहूँ आज तीन-चार महीने से मन मेंआ रहा था जैसे तुम्हारी माँ कह रही हो कि वह चली गई है तो मैं तुम्हेंभूल गया हूँ । वह जीवित थी तो तुम्हारी याद आते ही पागलों जैसाव्यवहार करने लगती ।

मुझ पर बिना बात गुस्सा हो जाती कि मैं तुम्हेचिट्ठी-पत्री क्यों नहीं लिखता ।

मैं तुम्हें भूल गया। बताओ भला संतानको भी कोई भूल सकता है ?

श्याम जी करुणा व प्रसन्नता मिश्रित हँसी हँसते हुए आँखें पोंछने लगे ।

हरिकिशोर डॉक्टर थे। उन्होंने अपनी चिकित्सकीय नजर से पिता कीओर देखा। वे पूर्णतः स्वस्थ और निरोगी दिखाई दे रहे थे ।

वे मन-ही-मन प्रफुल्लित हुए। बोले-“बाबूजी चलिए।” और वे पिता का बैग उठाकरचल पड़े ।

भीड़ ज्यादा होने के कारण स्टेशन से बाहर आने में देर हो रही थीपर पिता का थैर्य और शक्ति देख व अनुभव कर मन-ही-मन खुश हुए।उन्होंने देखा कि उनके पिता ने पचासी वर्ष की आयु में भी बड़ी सहजतासे ओवर-ब्रिज पार कर लिया ।

न तो उनका दम फूला और न ही उनकेचेहरे पर कोई थकान थी जबकि हरिकिशोर हाथ में बैग लिये सीढ़ी चढ़तेहुए हॉफने लगे थे ।

अब वे खुद भी साठ वर्ष पूरे करने जा रहे थे ।

स्टेशन से निकलकर दोनों कार-पड़ाव पर आए। वहीं ड्राइवर अपनीगाड़ी में उनका इंतजार कर रहा था ।

गाड़ी के पास आते ही ड्राइवर नेउनके हाथ से बैग ले लिया और गाड़ी में रख दिया ।

हरिकिशन पिता से बोले-

“बाबूजी आप गाडी में बैठिए । मैं अस्पताल से आधा घंटे में लौटताहूँ। कुछ मरीजों को देखना जरूरी है ।”

“और तुम कैसे जाओगे ?”

अस्पताल की गाड़ी है। आप चलिए मैं आता हूँ ।

जल्दी ही लौटआऊँगा । आपकी बहू को आज देर हो जाएगी ।

उन्हें एक ही ऑपरेशनकरना है फिर भी उन्हें देर हो जाएगी । पिता से यह बात कहते हुएउन्होंने ड्राइवर से गाड़ी बढ़ाने के लिए कहा ।

गाड़ी चल पड़ी। श्याम जी के मन में खयाल आया कि उन्होंने उसकेबाल-बच्चों पत्ती का कुशल-मंगल पूछा ही नहीं ।

पोता कृष्ण पुणे में हीहै या कहीं और चला गया । नहीं वह पुणे में ही होगा । कहीं गया होतातो बेटा जरूर बतलाता ।

छोटी बहू (पौत्र-वधू) को कृष्ण के विवाह केअवसर पर ही देखा था । उसके बाद कहाँ देख सका ।

बौआ इन सबकोगाँव ले ही नहीं आते । खुद ही कहाँ आते हैं जो उन लोगों को लेकरआएँगे ?

कृष्ण ऐसे पब्लिक स्कूल में पढ़ा कि हमेशा परिवार में रूई कीतरह उड़ता रहा ।

कभी किसी से कोई संबँध नहीं । बेटे ने सब कुछ ख़ुदही किया । खैर उसे अच्छा लगता है तो मुझे क्या ?

यही सब सोचते हुए श्याम जी बेटे के घर पहुँचे और चाय पी । नहा-धोकर कमरे से बाहर आए ।

सामने एक निगाह डाली ।

देखा कि आगे बगीचे में एक आया एक अत्यंत सलोने बच्चे को लेकर टहल रहीथी ।

वह आया बूढ़ी थी ।

उनके मन में यह सवाल उठा कि वह बच्चाकिसका है ।

उन्होंने महादेव को आवाज दी । महादेव बचपन से ही उनकेबेटे के घर काम करता है । उसकी तो अब अस्पताल में नौकरी भी लग ।गई फिर भी उन्हीं के घर रहता है । श्याम जी ने हमेशा उसे अपने घरका बच्चा ही समझा । वह भी उन्हें बाबा ही कहता रहा ।

वह आया-“कोई हुकुम बाबा ?”

“वह बच्चा कौन है ?”

“वह तो अपना ही बच्चा है। कृष्ण जी का बेटा ।” महादेव खुशी मेबोला ।

श्याम जी चौंके-“मेरे कृष्ण का बेटा?”

“जी आपका पड़पोता हुआ न!”

“हाँ वह इतना बड़ा हो गया ?”

“जी साल पूरा होने में चार महीने बाकी हैं। सात महीने कुछ दिनही हुए हैं ।”

श्याम जी को घोर पीड़ा व आश्चर्य हुआ ।

इतनी बड़ी खुशी की बातऔर उन्हें पता ही नहीं! लेकिन उस समय वे अपने मन में उठी पीड़ा वविस्मय की कैद में न रहकर लगभग दौड़ते हुए फुलवारी पहुँचे ।

बच्चे कोलेकर कलेजे से लगा लेने की आतुरता ने उन्हें सहज बनाए रखा । उन्होंनेउसे गोद में लेने के लिए दोनों हाथ बढ़ा दिए । बच्चा उनकी ओरटुकुर-टुकुर ताक रहा था । श्याम जी भी बच्चे को देखते हुए विभोर होरहे थे। उनकी आँखें भर आई थीं ।

बच्चा उन्हें टुकुर-टुकुर ताकते हुए मुस्कराया पर मुस्कराते हुए रोनेलगा ।

आया ने अपनी भाषा में हिंदी मिलाते हुए कहा-“बाबा बच्चाअभी सोएगा इसलिए रो रहा है।” श्याम जी समझ गए ।

उन्हें भी लगाकि बच्चा अब सोना चाहता है ।

इसलिए उन्होंने अपने भावों पर नियंत्रण

आया बच्चे को लेकर कमरे में चली गई और वे वापस उस करेरे मेंआए जिसमें ठहरे थे। मन में पैदा हुआ घाव फिर से टीस देने लगा ।

उन्हें बार-बार यह आश्चर्य होता था कि इतनी बड़ी खुशी कासमाचार और बेटे ने उन्हें बताया भी नहीं। उन्होंने महादेव की तरफदेखा और पूछा-“महादेव कृष्ण मोहन यहाँ आया है यह बात बेटे नेबताया नहीं। क्‍यों ?”

“भूल गए होंगे। वे लोग मुंबई में एक सप्ताह से हैं पर यहाँ नहीं।होटल में ठहरे हैं।”

“होटल में!”

“हाँ बाबा बड़े लोगों के लिए क्‍या घर क्‍या होटल। सुनते हैं किपति-पत्नी की कुल तनख्वाह दो लाख रुपये प्रति माह है।”

“यह आया ?”

“यह भी होटल में बच्चे को लेकर रहती थी। एक दिन अपनी मैडमने कृष्ण मोहन जी और छोटी मैडम को डिनर पर बुलाया था। वे लोगआए थे। आज सबेरे कार से इस आया और बच्चे को दे गए हैं। पतानहीं आगे उनका कया कार्यक्रम है?”

महादेव ने उन्हें ऐसी बात बताई जिसे वे पचा नहीं पा रहे थे।आँखें मूँदकर लेट गए। पत्नी की याद आई फिर पिता की फिर माँकी। याद आए जीवन के बीते पल-राग और अनुराग के। याद आयाहरिकिशोर का जन्म।

उनकी ससुराल से हरिकिशोर के जन्म का समाचार लेकर एक नाईआया था । उन्हें अब भी वह दिन अच्छी तरह याद है-वे दालान पर बैठेछोटे मामा को चिट्ठी लिख रहे थे । तभी उन्हें आभास हुआ जैसे कोईआया है । उन्होंने सिर उठाकर देखा-उस व्यक्ति ने उन्हें हाथ जोड़करप्रणाम किया था ।

“अरे ठाकुर क्या समाचार है?” ससुराल के नाई को पहचान करउन्होंने पूछा था ।

सब आपलोगों की दया ओझा जी। आज मैं आपसे ऐसे नहींमानूँगा।” वह नाई खुशी से खिलते हुए बोला था ।

“ऐसी क्‍या बात है ?”

“यही इनाम-बख्शीश लूँगा ।”

वे उसकी बातों से समाचार का मंतव्य तो समझ गए थे फिर भी औरज्यादा स्पष्ट समझने के लिए उन्होंने पूछा “क्या बात है कहो तो।”

“आपको बेटा हुआ है!”

तभी उनके पिता कमरे से बाहर आए । पिता को देखकर उनके चेहरेपर लाज की एक रेखा दौड़ गई । अपने चंचल होते प्रसन्‍न मन को सायासचिट्ठी पर केंद्रित करने लगे पर ऐसा कहाँ हो पाया ? मन पिता बनने कीखुशी से तरंगित हो रहा था ।

“प्रणाम सरकार ।” नाई ने हाथ होड़कर उनके पिता को प्रणाम कियाथा ।

“किस गाँव के हो?” पिता ने गंभीर होकर पूछा ।

“मुझे नहीं पहचाना आपने? मैं तो यहाँ कितनी ही बार आ चुका हूँ।मैं हजाम सरकार। बाजितपुर से आया हूँ। सरकार को पोता हुआ है।मालिक ने आपको देने के लिए यह चिट्ठी दी है।”

श्याम जी को सब कुछ याद है। वैसे-का-वैसा। अब उस बात को बीतेसाठ साल हो गए पर कुछ भी तो नहीं भूले हैं वे। चिट्ठी पढ़ते ही उनकेपिता की आँखों में खुशी के आँसू आ गए। उनका गला भर आया था।वाणी अवरुद्ध हो गई थी। किसी तरह वे नाई से इतना ही कह पाए थे-

“ठाकुर मैं अपने परिवार का पहला व्यक्ति हूँ जो पोते का मुँहदेखूँगा। मेरे पिता नहीं देख पाए थे। सुनता हूँ कि मेरे दादा जी भी यहलालसा लिये ही स्वर्ग सिधार गए। ठाकुर आज तुम मेरे लिए बहुत खुशीकी खबर लाए हो ।”

फिर माता-पिता के मन का प्रसन्नता से तरंगित होना और समय का

उत्सव बनना-श्याम जी को वह सब याद है ।

क्या अपने पोते कृष्ण के जन्म पर स्वयं उन्होंने कम उत्सव मनाया था ? उनकी बहू खुद डॉक्टर है फिर भी बच्चे के जन्म से दो महीने पहलेऔर जन्म के तीन महीने बाद तक हरिकिशोर की माँ कोलकाता में हीरहीं ।

उस समय हरिकिशोर और उनकी पत्नी कोलकाता में ही नौकरीकरते थे और श्याम जी अपने घर पर अकेले थे । वे खुद खाना पकाते थेखेती का काम देखते थे और तब उन्हें मोहन मिश्र जैसे हेडमास्टर केअधीन हाईस्कूल में क्लर्की करनी पड़ती थी जहाँ एक मिनट देरी कामतलब गैर-हाजिर होना माना जाता था ।

ओह! क्‍या समय हो गया है !

श्याम जी के मन में ये सारी बातें लहरों की तरह चपल हो उठी हैं ।उन लहरों के साथ वे खुद को निरीह भी महसूस कर रहे थे । पर यहस्थिति बहुत देर तक नहीं रही । बेटे पर क्रोध आया बहू पर आया औरपोते कृष्ण मोहन पर भी ।

फिर उनके मन में यह विचार आया कि कृष्ण मोहन पर क्रोध करनेका औचित्य क्या है । बेटे ने यह समाचार क्‍यों नहीं दिया ? बहू ही मुझसेयह बात छिपा गई ।

कृष्ण भी यह बात कह सकता था पर वह क्‍यों कहेगा ?

उस समयतो उसने मा-बाप के कहने पर फोन कर दिया था कि मैं उसके विवाहमें आऊँ ।

हो सकता है कि उसके माँ-बाप को मेरे समक्ष कुछ संकोच रहाहो कि मैं शायद केरल की लड़की से उसकी शादी को स्वीकार न करूँ ।बेकार की बात ।

मैंने कभी भी उस केरलीय कन्या के जाति-धर्म के बारेमें उससे पूछा ही नहीं। मेरे लिए तो बस यही खुशी काफी थी कि वहमेरी पौत्र-वधू होकर मेरे घर आ रही है । श्याम जी यही सब सोचते हुएआँखें बंद किये हुए लेटे थे ।

तभी हरिकिशोर कमरे में आए-

“बाबू!”

“हा!” श्याम जी उठकर बैठ गए ।

“कोई कष्ट? कुछ हो रहा है आपको?” पिता के चेहरे पर दर्द के भाव

देख हरिकिशोर ने उनसे पूछना उचित समझा ।

“हाँ ।”

“क्या ?”

“बहुत कुछ हुआ।” उनकी आँखों में आँसू छलक आए ।

“आप रो क्‍यों रहे हैं?” पिता को रोते देख हरिकिशोर अकचका गए ।

क्यों रो रहा हूँ? अँय कृष्ण के बेटा हुआ और मुझे खबर भी नहीं ?”

“ओह हो! बात यह हुई कि ज्योतिषी ने किसी को कहने से मना कियाथा ।”

“ज्योतिषी! बेटा यह तुम कह रहे हो ?”

“बाबू जब ज्योतिषी ने यह बात कही तो कुछ-न-कुछ बात तो होगीइसीलिए किसी से नहीं कहा गया ।”

बौआ तुम तो डॉक्टर हो। विज्ञान पढ़े हो और तुम्हारी सोच ऐसीहै? लोग ठीक ही कहते हैं-यह व्यापार-युग हो गया है ।”

“बाबू आप इस बात को ऐसे क्‍यों ले रहे हैं ?”

अँय तुम इसे इतनी हलकी बात समझ रहे हो? ज्योतिषी के मनाकरने के बाद भी तुम्हें सूचना दी गई किंतु…तो क्या मुझे बताने के लिएही ज्योतिषी ने मना किया था?”

“बाबू आप सचमुच बहुत ‘सीरियस” हो गए। आप किसी बात कोइस रूप में मत लीजिए।” यह कहते हुए हरिकिशोर उठकर चल दिए ।

श्याम जी ने बेटे को जाते हुए देखा तो आँखें मूँद लीं। दो विपरीतभाव मन को मथ रहे थे-आक्रोश और आनंद । पड़पोते को देखने काआनंद । वे बेटे से उस आनंद का भी जिक्र करते पर वह आनंद आक्रोशसे घिरा था । वैसे वे खुद चाहते थे कि आनंद उनके चित्त में आए मगरन तो हरिकिशोर ही वह सुनने के लिए बैठे और न ही वे आनंद व्यक्तकर पाए ।

थोड़ी देर बाद महादेव ने खाना परोसकर उन्हें टोका-“बाबा खानाखा लीजिए ।”

श्याम जी ने आँखें खोलीं और महादेव की ओर देखा। उन्होंने एक बार

तो सोचा कि खाने के लिए मना कर दें पर ऐसा न कर उन्होंने पूछा-“बौआ खाया ?”

“साहब खाना खाकर सो गए।” उनकी ओर टुकुर-टुकुर देखते हुएबोला। महादेव जैसे उनके हृदय के मर्म को समझ गया ।

“ओह!” श्याम जी इससे अधिक नहीं बोले । उन्हें याद आया-जब वेसपत्नीक यहाँ आते थे तो लाख व्यस्तताओं के बावजूद बेटा उनके साथही खाना खाता था ।

पत्नी और बहू बैठी रहती थी और ये दोनों पिता-पुत्रसाथ-साथ खाना खाते रहते थे ।

बातें चलती रहती थीं। उस आनंद कोयाद कर श्याम जी ने सोचा कि यह तो उनकी पत्नी की व्यवहार-कुशलताथी ।

यहाँ की स्त्रियों में परिवार के संबँधों को बाँधकर रखने की अद्भुतकला होती है । उनके मरने के बाद न जाने कितनी बार वे यहाँ आए परअब वह बात कहाँ ?

यही सब सोचते हुए उन्होंने खाना खाकर हाथ धोए और बिस्तर परलेट गए ।

शाम को उनकी नींद टूटी। वे मन-ही-मन हँसे भी ।

कारण थोड़ी देरतो वे नींद में रहे और उस नींद में वे कृष्ण के बेटे के साथ खेलते रहे ।उन्हें खुद पर दुःख हुआ कि क्रोध में रहने के कारण अभी तक कृष्ण केबेटे का नाम भी नहीं पूछ पाए । बच्चे को दुलारने के लिए उनके मन मेंममता की तरंगें उठने लगीं। उन्होंने महादेव को आवाज दी ।

“हाँ बाबा!” महादेव उनके पास आ खड़ा हुआ ।

“सुनो! मेरे पड़पोते को ले आओ। अब उस चुनचुनमा के साथ थोड़ीदेर खेलूँगा ।”

“बाबा वे लोग तो पुणे गए ।”

“कब ?”

“थोड़ी देर पहले ही कृष्णमोहन और छोटी मैडम आई थीं। थोड़ी देररहे फिर चले गए।”

“और बौआ (डॉ. हरिकिशोर-बेटा)?”

“साहब अस्पताल गए और मैडम सोई हैं।”

ओह…।” श्याम जी थोड़ी देर गंभीर मुद्रा में बैठे रहे। उनके मन मेंखयाल आया-

‘पहाड़ से अलग-अलग नदियाँ निकलती हैं। सबकी अपनी-अपनीधारा होती है ।

जैसा रास्ता वैसी नदी की रफ्तार । तो वे क्या कोई पहाड़हैं वे तो नदी की धारा हैं!

मनुष्य पहाड़ हो सकता है भला ?

यह सब सोचते हुए उन्होंने महादेव की तरफ देखा । आज उन्होंनेमहादेव से जुड़ाव और नजदीकी का अनुभव किया। उन्होंने सोचा किकेवल महादेव ही उनकी बात समझ रहा है।

उन्होंने उससे पूछा-

“महादेव तुम्हारे बच्चे कितने बड़े-बड़े हैं ?”

“एक बच्चा तीन साल का और दूसरी एक साल की बच्ची है।”

श्याम जी के मन में स्नेह की तरंगें उठीं। उन्होंने पूछा-

“महादेव तुम्हारा घर यहाँ से कितना दूर है?”

“बीस मिनट का रास्ता है।” महादेव ने जवाब दिया ।

“चलो मुझे अपने यहाँ पहुँचा दो। मेरी इच्छा बच्चों के साथ खेलनेकी हो रही है। उनका भी बाबा हूँ न ।”

“ऐसा नहीं होगा कि कल चलें ?”

“नहीं मैं कल गाँव लौट जाऊँगा ।”

“तो चलिए।” महादेव की खुशी का कोई ठिकाना नहीं था ।

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