जमुनिया धार

एक दिन मैं अपने दालान पर बैठा हुआ लिख रहा था ।

सामने वाले रास्तेसे कुछ स्त्रियाँ पीछे की तरफ जा रही थीं ।

उनके हाथों में टोकरी थी औरसूखे पत्ते बुहारने के लिए झाड़ू थे। जब तक मैं उन्हें आवाज देता तबतक आम के पेड़ के नीचे खेल रहे बच्चे जोर से चिल्लाए। ये बच्चे हमेंआगाह करने के लिए शोर मचा रहे थे कि सूखे पत्ते बुहारने वाली स्त्रियाँआ रही हैं।

ये बच्चे प्रायः इसी तरह शोर मचाकर आवाज देकर हमेंउनके बारे में सूचित करते थे। कभी-कभी यही बच्चे झूठ-मूठ का शोरमचाकर हमें ठगते भी हैं।

जब हम इन बच्चों द्वारा ठगे जाते हैं औरउनकी बातों में आकर उन बुहारने वाली औरतों को ढूँढ़ते हैं तो झूठीसूचना देने वाले उन बच्चों को बहुत मजा आता है। पर अभी उन खबरचीबच्चों ने झूठ नहीं बोला था ।

उन औरतों को खुद मैंने भी देखा था परउस समय उन बच्चों का शोर मचाना अच्छा नहीं लग रहा था। लिखनेके काम में बाधा आ रही थी । मैंने तो पहले ही काफी ऊँचे स्वर में उनस्त्रियों को पत्ते बुहारने से मना कर दिया था और उन्हें वापस लौटने केलिए कहा था । मैंने यह देखने की कोशिश नहीं की कि वे सब वापसलौटीं या नहीं । मैं लिखने में ही तललीन रहा ।

थोड़ी देर बाद मुझे ऐसा लगा जैसे सामने थोड़ा हटकर अर्थात्‌खलिहान में खड़ी कोई स्त्री कुछ पूछ रही है। मैंने सिर उठाकर उधरदेखा। वहाँ एक युवती खड़ी थी। यदि आश्विन के महीने में खेत की मेड़

मेरी तरफ टुकुर-टुकुर ताक रही थी । मैंने उसकी बात नहीं सुनी थी तो क्या कहता ? मेरी आँखेंउसकी देह का मुआयना करती हुई उसकी आँखों पर टिक गई थीं । मेरापूरा बदन रोमांचित हो उठा था । मुझे यह लगा जैसे मैं अचानक उफनतीजमुनिया धार के किनारे पहुँच गया होऊँ ।

उसे देखकर केवल मेरी देह मेंही झनझनाहट हुई हो ऐसा नहीं था । उसके चेहरे का रंग भी आरतः केपत्ते की तरह लाल हो गया था। उसने फिर पूछा था-“सूखे पत्ते बुहारनेआई थी। बुहारूँ या नहीं ?”

उसका रूप-रंग और तौर-तरीका साफ किये गए सुगंधित चावल कीतरह लग रहा था । अगर उसके सवाल का जवाब मेरे दिल से पूछें तो दिल्ने कहा जितना चाहो बुहार लो” पर मैंने ऐसा नहीं कहा । मैं खिड़कीऔर किवाड़ की तरफ नजर घुमा-घुमाकर चारों ओर देखने लगा कि कहींपत्नी तो नहीं देख रही । वैसे मैंने ऐसी कोई हरकत नहीं की थी जिसकीवजह से मैं उनसे डरता पर ऐसा तो नहीं कि मेरी भंगिमा का भावसमझकर वे मेरे मन की बात समझ गई हों ।

इसीलिए मैं मन-ही-मन डरगया और उसे बुहारने से मना कर दिया। वह चल पड़ी। एक पल के लिएउसकी नजर उदास-सी लगी । ऐसी उदास जैसे शरठ ऋतु में नदी के तटउदास लगते हैं। उसके साथ आई अन्य स्त्रियाँ जो उधर दूर खड़ी थीवे भी चल पड़ीं । वह उधर चलीं और इधर मेरी पत्नी दालान के कमरे सेहोते हुए बाहर निकलीं ।

उसने पूछा “कौन ? सलमा थी क्‍या ?”

“सलमा!” उसे अचानक देखकर मैं हड़बड़ा गया ।

जी हाँ वह फातिमा आती है न उसी की बेटी है ।

अप्रतिम सुंदरी है ।

है न ?

वह बोलती हुई मुस्करा दी ।

उस समय मुझे पत्नी की मुस्कराहटखुरदरी लगी पर चूँकि उसने और कुछ नहीं बोला था अतः मैं भी कुछ नहींबोला ।

मैंने कहा-“सारा काम तो तिलाठी वाली करती है और तुम इनसबको सूखे पत्ते बुहारने के लिए कहती हो!”

बोलते हुए मेरे स्वर में थोड़ारोष जरूर आ गया था पर उसने उस पर ध्यान न देते हुए कहा

“तिलाठी वाली आजकल कहाँ है ?”

क्यों ? कहाँ गई वह ?”

“वह तो एक महीने से बेटी के घर है। मैं खुद ही दिन-रात खटतीरहती हूँ। आप नहीं देखते क्या ?”

मैं उसकी बातों से मन-ही-मन लज्जित हुआ कि वह कहेगी कि मैंअपनी पत्नी का जरा भी खयाल नहीं रखता पर उस समय वह ऐसा नहींबोली । उसने पप्पू को बुलाकर कहा “सलमा से कह दो पत्ते बुहार दो ।”

उस समय सलमा को वापस बुलाना मुझे मीठा और तीता दोनों लगा ।मीठा क्‍यों लगा यह तो लोग अच्छी तरह समझ सकते हैं पर तीताइसलिए कि तब सलमा साफ-साफ समझ जाती कि उसे मैंने नहीं मेरीपत्नी ने वापस बुलाया है । यह कहना मुश्किल है कि मुझे खराब क्‍यों लगापर लगा जरूर ।

जब तक सलमा फिर मेरी बैठक तक आती मैं अपनेकागज-पत्तर समेटकर कमरे में आ गया । मैं कागजों को समेटकर टेबुलपर रख रहा था मेरे पीछे तभी पत्नी भी टेबुल तक आ गई थी। उसनेटेबुल पर से एक किताब उठाकर पन्ने पलटते हुए कहा-“कल सलमाबहुत-सी सींकें चीरकर दे गई थी । दादी ने कहा था न कि वह सींक सेमछली बनाना सिखा देगी। वही सीखना है ।”

सलमा आजकल गाँव की वृद्धाओं से बहुत पुराने समय से चली आरही हस्तकलाएँ सीख रही हैं। मुझे यह अच्छा लगता है और वह यह बातसमझती है । यही समझते हुए शर्म से उसका चेहरा थोड़ा लाल हो गयाथा। होंठों पर एक मुस्कराहट फैल गई । उस समय मुस्कराता हुआ पत्नीका लज्जावनत मुख-मंडल मुझे अच्छा लगा था । मैंने उसके गाल छूकरप्यार किया । वह छिटककर मुझसे दूर हट जाने की भंगिमा बनाते हुएहँसने लगी ।

इस प्रसंग के तीन दिन बाद की बात है । मैं घर पर ही था । दफ्तरमें कोई छुट्टी थी ।

उस दिन मैं खाना खाकर अपने कमरे में किताब पढ़ते-पढ़ते सो गयाथा । मेरी पत्नी ने कब अपना सारा काम निपटा लिया कब खुद खापीकर निश्चित हुई मैं नहीं जान पाया । अचानक दो स्त्रियों के मिले-जुलेस्वर में आ रही हँसी की आवाज से मेरी नींद खुल गई । मैं अनुमान लगानेलगा कि कौन हँस रही है । एक तो मेरी पत्नी थी ।

दूसरी ?

“आप भी…” कहकर वह दूसरी स्त्री हँसी । मैंने वह दूसरा स्वरपहचान लिया। वह स्वर सलमा का था। दोनों आँगन में मंडप पर बैठीबातें कर रही थीं ।

सच कह रही हो। तुम्हारी आँखें देखकर तो कोई भी पुरुष डरजाएगा ।” यह कहकर पत्नी फिर हँसने लगी । जैसे कम पानी में तैरतीमछली टॉप में फँसकर हड़बड़ा जाती है वैसे ही मैं भी मन-ही-मनहड़बड़ा गया ।

ऐसा तो नहीं कि उस दिन मेरी पत्नी ने मेरी आँखों कोदेखकर कुछ अनुमान लगा लिया हो या कोई स्त्री किसी दूसरी स्त्री कीआँखों को देखकर उसे पुरुष की तरह ही जानने लगी है या मेरी पत्नीमन-ही-मन कहीं सलमा से कोई ईर्ष्या तो नहीं करती ?

मेरे लिए यहसब समझना कठिन था क्योंकि उसके मन की गाँठों को खोलनाआसान नहीं था ।

उसके बाद सलमा कह रही थी-“मेरी शादी हुई न तभी से मेरेमाँ-भाई का सुख-चैन छिन गया। यूँ कहिए कि मेरी माँ को दुःखों नेघेर लिया ।”

चूँकि मैंने उसकी पिछली बातें नहीं सुनी थीं इसलिए मैं उसकी इस बातका कोई अर्थ नहीं लगा सका पर इतना जरूर समझ गया था कि सलमामेरी पत्नी के परिहास की उपेक्षा कर आगे की अपनी बात कह रही थी ।

“तुम्हारा भाई?” पत्नी ने पूछा

“वह अजमेर में ड्राइवरी करता हैं।” सलमा बोली ।

“क्या उसकी शादी नहीं हुई है ?”

“वह शादी कर ही नहीं रहा है। वह कहता हैं कि जब बहन के बारेमें (मेरे बारे में) कुछ फैसला हो जाएगा उसके बाद ही वह सोचेगा ।”

“तुम्हारी ससुराल से कोई नहीं आता ?”

“वहाँ के लोग पत्थर की मूर्ति हैं । किसी को कोई चिंता नहीं है ।

जिसने शादी की वह जाने ।” यह बोलकर वह चुप हो गई । वह कुछसोचने लगी थी । उस समय मैं लेटे-लेटे उसके शब्दों और मौन से उसकेदुःख का अनुमान लगा रहा था । उसके दुःख का कारण समझ आने लगाथा ।

“तुम अपने पति का पता लगाकर उसके पास क्‍यों नहीं चली जाती ?”

“वह आदमी एक जगह रहे तब तो। कभी कोई उसे यहाँ देखता हैतो कभी वहाँ । कभी दिल्‍ली तो कभी कलककत्ता। पतंगा है पतंगा । किसीपतंगे को देखिए-बहुत सुंदर लाल-पीला। देखिएगा तो वह शौकीनलगेगा मगर उसकी आदतें कोयले जैसी काली हैं । वह पत्नी कोसँभालकर रखने वाला मर्द नहीं है।”

सलमा बोली । अब मैं उसके दुःखका कारण समझ गया था ।

अगर ऐसी बात है तो दूसरा क्‍यों नहीं कर लेती ? तुम लोगों में तोखुल्ला कराकर दूसरी शादी होती है। मेरे पीहर में मेरी ही हमउम्र एक स्त्रीथी। उसका नाम रेक्सोना था। उसका पति लापता हो गया था। खुल्लाकर रेक्सोना की भी दूसरी शादी करा दी गई थी ।

मेरी पत्नी की बात पर वह थोड़ी देर चुप रही। ऐसा लग रहा था मानोचुप रहकर वह अपना गुस्सा हजम कर रही हो। मगर वह ऐसा नहीं करपाई। वह गुस्से में बोली-

“मैं तो अल्लाह से यही दुआ करती हूँ कि वह दिन जल्दी ही आएजब मैं उसके जनाजे का नमाज अदा करूँ। मैं समझूँगी कि अल्लाह ने मुझेजन्नत दे दिया ।”

सलमा की बातों से मेरी देह सिहर उठी। गुस्से में बोलकर भी वहशांत नहीं रह सकी। वह हिचक-हिचककर रोने लगी ।

जेकराने लगी। मैं भी थोड़ा भावुक हो गया। मैं उठा और आकर दलान पर बैठ गया। आज मुझे रह-रहकर पत्नी पर गुस्सा आ रहा था कि वह इतनाक्रेद-कुरेदककर किसी की निजी बातें क्‍यों पूछती है ?

वह सलमा से बड़ीथी। उसे इस बात का खयाल करते हुए भी बात करनी चाहिए। फिरमुझे स्त्रियों की मूल प्रवृत्ति ध्यान आई ।

मुझे ध्यान आया कि स्त्रियाँ स्त्रियों के सामने ज्यादा खुलती हैं। आयुया संबंध की वर्जना कम ही होती है। वे उम्र व संबँध में पहले स्त्री होतीहैं। पुरुष की प्रवृत्ति प्रायः इसके विपरीत होती है ।

वे अपने हमउम्र याअन्य पुरुषों के सामने इतनी जल्दी नहीं खुलते । कारण होता है उनकाअहमू । यह अहम्‌ उन्हें खुलने नहीं देता । उस समय स्त्री की यह प्रकृतिमुझे अच्छी लगी । मैं काफी देर तक यही सब सोचता रहा ।

उसके बाद से पत्नी कई दिन सलमा के बारे में बातें करती रहीं । पहलेतो मैंने उसमें कोई रुचि नहीं दिखाई फिर बाद में मैं भी खुलने लगा ।

सलमा मेरे घर अकसर आती थी। मैं उसे देखता वह मुझे देखतीबस । बात करने का तो प्रश्न ही नहीं पर हम पति-पत्नी की बातों में अबउसकी बातें भी शामिल हो गई थीं ।

एक दिन पत्नी ने मुझसे पूछा-

मेरे मुँह से निकला-“जहाँ जाती है जाने दो ।”

मैंने कहने को तो कह दिया पर अंदर-ही-अंदर उत्सुकता जगी ।“आखिर वह गई कहाँ ?” पर मैं भी चुप रहा वह भी चुप रही ।

एक दिन की बात है। मैं कहीं से घर लौट रहा था। तब शाम नहींहुई थी । हाँ दिन ढल गया था । रास्ते में थोड़ा हटकर पाकड़ का पेड़ है।उसकी जड़ में मिट्‌टी का सुंदर चबूतरा है। उस चबूतरे पर एक युवकबैठा था । नीचे एक युवती खड़ी थी । युवक को तो नहीं पहचान पाया परयुवती को दूर से ही पहचान गया । वह सलमा ही थी । मैंने उसे बहुत दिनबाद देखा था । स्वाभाविक था कि उत्सुकता बढ़ती। मैं आगे बढ़ा ।

देखा

मैं उसके इतना नजदीक पहुँच गया था फिर भी उसे कोई फर्क नहींपड़ा। वह उन्मुक्त झरने की तरह झहर रही थी ।

“हो शहजादी अपने मर्द की पिटाई के बारे में सुनने के बाद भी हँसरही है । शर्म नहीं आती ?” वह कुछ और बोला जो मैं सुन नहीं पाया ।उसकी मुखमुद्रा देखकर मुझे लगा जैसे वह मजाक कर रहा हो ।

“वह मेरा कोई नहीं है। अब मैं खुल्ला कराकर दूसरी शादी करलूँगी ।” इस बार वह गंभीर होकर बोली थी ।

“पक्का?” युवक बोला था ।

“हाँ पक्का!” सलमा बोली। इस पर वह युवक कुछ भुनभुनाकर बोलाजो मैं समझ नहीं पाया। फिर तो दोनों ठहाके लगाकर हँसने लगे । मुझेउन दोनों का ठहाका अच्छा नहीं लगा । मैं समझ गया कि इस लड़की नेअपना यार खोज लिया है ।

यह दृश्य मेरी आँखों के सामने कई दिनों तक नाचता रहा। मैंने पत्नीको यह बात बताई । वह कुछ नहीं बोली पर उसके चेहरे से लगा जैसेकहीं खो गई है ।

काफी दिन हो गए थे । उस युवक से हँसी-ठट्ठा प्रकरण के बाद सेसलमा दिखाई नहीं दे रही थी । मैंने समझा कि कहीं चली गई होगी । मेरीपत्नी की अब उसमें कोई रुचि नहीं रह गई थी। अब मुझे भी सलमा केबारे में पत्नी से कुछ पूछना उचित नहीं लगा ।

एक दिन की बात है । मैं उसके घर के पास से गुजर रहा था । सहसामेरी नजर घर के बाहर चबूतरे पर बैठी सलमा पर गई । शुरू में मैं उसेपहचान नहीं पाया । उसकी देह-दशा अजीब हो गई थी । उसे देखकर ऐसालगा जैसे किसी आँधी-तृफान ने किसी फसल को तहस-नहस कर दियाहो । उसकी शक्ल ऐसी ही लग रही थी । उसकी आँखें इतनी अंदर धँसगई थीं जैसे जमुनिया धार मर जाने पर होता है । मुझे विचित्र-सा अनुभवहुआ । वहाँ उसकी चाची भी बैठी थी। वे सब गुमसुम बैठी थीं ।

“इसे क्या हुआ है?” मैंने उसकी चाची से पूछा ।

“चार साल से मेहमान बाहर रहता था। कभी उसने इसकी खोज-खबरनहीं ली। कब कहाँ रहता था कोई नहीं जानता था। एक सप्ताह होगया। अपने भाई के पास रहने लगा था। रात सोने के लिए वहाँ जा रहाथा। तभी साँप ने डस लिया। वह बच नहीं पाया।” उसकी चाची बोली ।

“कैसे पता लगा ?”

“सबेरे सत्तार का बेटा आया ।”

“उसने अपनी आँखों से देखा है ?”

“हाँ ऐसी बातें झूठी होती हैं क्या? वह वहाँ से मिट्टी चढ़ाकर लौटाहै।” चाची बोली ।

मैंने फिर सलमा की ओर देखा। उस समय वह मेरी तरफ ही देख रहीथी। मुझसे नजर मिलते ही उसकी आँखों से गंगा-जमुना बरसने लगी।मैंने उससे कुछ नहीं कहा। मैं सोच ही नहीं पाया कि क्‍या कहूँ ?

मैं घर आया तो पत्नी से बोला “जानती हो सलमा का पति मरगया ।”

“कैसे ?” उसने अकचकाते हुए पूछा ।

“साँप ने काट लिया ।”

“ओह सलमा को उस पति से कोई सुख भी नहीं मिला।” बोलती हुईपत्नी द्रवित हो उठी। उसकी आँखें छलछला उठी थीं ।

“मुझे तो इसमें दुःख की एक ही बात लगती है कि एक आदमी मरगया। पर उसके लिए सलमा को जिस हताशा से रोते हुए देखा वहबेकार। उसे ऐसे पति से मुक्ति मिली। वह खुल्ला करना चाहती थी।अब वह झंझट भी नहीं रहा ।”

मेरी बात सुन पत्नी सिर उठाकर मेरी ओर देखती हुई बोली-

“ऐसे मत बोलिए। पति तो अभी उसी का था। वह नहीं रोएगी तोकौन रोएगी? और दूसरी शादी करना दूसरी बात है।” बोलते-बोलते वहभावुक हो गई।

मैं चुप हो गया। मैं सोचने लगा मेरी पत्ती और सलमा एक-दूसरे से

भिन्‍न रीति-रिवाजों वाली है। मेरी पत्नी उन रीति-रिवाजों वाले समाज कीस्त्री है जो एक शादी करने के बाद दूसरी शादी नहीं कर सकती। परसलमा के समाज में तो इस बात की छूट है। वह दुबारा अपनी जिंदगीबसा सकती है। फिर भी वह पति की मृत्यु से दुःखी है। मेरी पत्नी उसपीड़ा के मर्म को समझ रही थी। इसीलिए वह घटना सुनकर भावुक होगई । मैं सोचने लगा कि दोनों भिन्‍न रीति-रिवाजों की होती हुई भी एकही समाज की हैं।

दोनों की सामाजिक संवेदना एक ही है। सबसे बड़ी बात यह है किदोनों स्त्री हैं ।

मेरे मन में सलमा के प्रति कई विचार आए । कई बातें याद आ रहीथीं । पाकड़ के पेड़ के नीचे चबूतरे पर उस युवक से बात करने वाली बातभी याद आई । पत्नी से इस घटना के बारे में उस दिन भी कहा था ।वह बोली “हाँ सलमा ने बताया था। वह उसकी चचेरी बहन कापति था । जिस समय दोनों बातें कर रहे थे उन्होंने आपको नहीं देखाथा। बाद में देखा तो लजा गई थी । वह कह रही थी कि कहीं उसहँसी-ठट्ठा को आप सच न समझ बैठे हों ।”

“हँसी-ठट्ठा में पति के बारे में ऐसे बोलेगी ?”

“सो उसे गुस्सा था ।”

“गुस्से में लोग ऐसे बोलते हैं? और फिर रोएगी ?”

मेरी इस बात पर मानो पत्नी के चेहरे का रंग बदल गया ।

वह बोली-“आप औरत नहीं हैं न! आप उसका दुःख क्‍या जानेंगे ?”मैं सन्‍न रह गया ।

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