ब्रह्मराक्षस का नाई

एक हज्जाम था ।

काम का न काज कादुश्मन अनाज का

उस पर उधार थापैसा बजाज का

हजामत का हुनर नन हुनर मसाज का

उसकी बूढ़ी मां थी एक जो दिन रात कलपती रहती थी

डाँटती फटकारती फिर भी इस निकम्मे के वास्ते दिन भर खटतीरहती थी ।

जूं तक न रेंगती थी कभी उसके कान पेआफत न आने देता था कभी अपनी जान पे

एक दिन उसकी बूढ़ी माँ उससे बहुत तंग होकर हाथ में झाड़ू लिए तेज आवाज में कहानिकम्मे निखट्टू निकल यहां से … आज से तुझे न रोटीमिलेगी न पानी। निकल घर से। काम करता है न काज… चारधेले का सहारा नहीं… मैं कब तक खट-खटकर तुझे रोटीखिलाती रहूंगी ? जा और बाहर जाकर काम कर …

आज के बाद जब तक काम न करे मुंह मत दिखाना…।और झाड़ू से मारती है ।

देख … बहुत हो गया … अब रूक जा वरना…।

वरना वरना क्‍या करेगा ?

एक झाड़ू और मारती है ।

अब मारेगी तो सचमुच चला जाऊंगा …।

जा न… निकल यहां से …।

मैं सचमुच चला जाऊंगा … फिर वापस नहीं आऊंगा…।

मत आना…समझ लूंगी कि मैं निपूती ही थी… ऐसे निखट्टू केहोने से तो बेऔलाद होना ही अच्छा…।नाई बड़बड़ाता है.. इतना अपमान… अब इस घर में नहीं रहूंगा…जब तक धन नहीं कमाऊंगा इस घर में लौटकर नहीं आऊंगा… रोटी खाऊंगा न पानी पिऊंगा … इस घर की देहरी भी नहींछुऊंगा। (जोर से चिल्लाकर) जा रहा हूं…

जब तक धन नहीं कमाऊंगा इस घर में लौटकर नहीं आऊंगा… रोटी खाऊंगा न पानी पिऊंगा … इस घर की देहरी भी नहींछुऊंगा। (जोर से चिल्लाकर) जा रहा हूं… अब लौटकर नहींआऊंगा…।

और इस तरह वह बरबराते हुए जगल की तरफ निकल गया ।

चांदनी रात का समय। रंग-बिरंगे वृक्षों के कटआउट लेकर बच्चेआते हैं। कुछ बच्चे हिरनों के मुखौटे लगाए जंगल के बीच कुलांचे भरते हैं। कुछपक्षियों के मुखौटे लगाए उड़ने का अभिनय करते हैं। नाई इस दृश्य को थोड़ाघबराकर और बीच-बीच में मुग्ध भाव से देखता है ।

तभी एक ब्रह्मराक्षस को अपने ओर आते हुए देखा ।नाई डरता है। पर डर को छिपाने कौ कोशिश करता है। ब्रह्मराक्षम नाई को देखकरखुश होता है और जोर-जोर से नाचने लगता है । नाई अपने डर को छिपाने के लिएराक्षस की ही तरह खुद भी नाचता है। दोनों एक दूसरे को आश्चर्य से देखते हैं

नाई : तुम कौन हो ?

राक्षस : मैं ब्रह्मराक्षस हूं …ब्रह्मराक्षस ।

नाई : डरता है पर डर को छिपाकर ।ब्रह्मराक्षस! कमाल हे ! तो ब्रह्मराक्षस ऐसे होते हैं ?

राक्षस : ऐसे होते हैं से क्या मतलब है तुम्हारा ?

नाई : मतलब ऐसे जैसे तुम हो ।

राक्षस : (डांटकर) मैं कैसा हूं ?

नाई: ठीक हो… पर तुम पूरे कपड़े क्‍यों नहीं पहनते ? तुम्हारे पास हेंनहीं या तुम ऐसे ही रहते हो ?

राक्षस : (गुस्से में ) मैं ऐसे ही रहता हूं ।

नाई: ओह तो तुम्हारे यहां यही फैशन है… चलो छोड़ों … तुम तो यहबताओ कि तुम ब्रह्मराक्ष कैसे बन गए ?

राक्षस : वो हुआ यूं कि पहले मैं एक ब्राह्मण था…। बहुत ज्ञानी था। मेरेपिता ने मुझे दूर-दूर तक अध्ययन करने भेजा। मैंने हर केन्द्र मेंजाकर मन लगाकर अध्ययन किया । और ज्ञानी हो गया । लेकिनलोग कहते हें मैंने विद्या का असली मर्म नहीं सीखा ।

(नाई बीच-बीच में ‘अच्छा’ कहकर हुंकारा भरता है)।

नाई: असली मर्म! वह क्‍या होता है ?

राक्षस : विद्या का असली मर्म है विनय… वह मैंने नहीं सीखा ।

नाई :हूं वह तो तुममें अभी भी नहीं है…।

राक्षस :(गुस्से में) चुप रहो तुम बहुत बीच-बीच में बोलते हो । अबबोलोगे तो मैं कुछ नहीं बताऊंगा…समझे…।

नाई:ठीक है… ठीक है…बोलो… तुम बहुत जल्दी भड़क जाते हो ।

राक्षस : तो ज्ञान का दम्भ मुझमें आ गया और मैं बाकी सबको मूर्ख समझने लगा। किसी को भी ज्ञान का पात्र नहीं मानता था। मैं एक योग्य शिष्य ढूंढ़ता रहा। पर मेरी अक्ल पर तो दम्भ का पर्दा पड़ा था मुझे भला योग्य शिष्य कैसे मिलता …? मैंने अपना ज्ञान किसी को नहीं दिया और एक दिन में वैसे ही मर गया… इसलिए मैं पिंशाच बना…(हंसता है) पर अब मैं एक राक्षस हूं… ब्रह्मराक्षस ।

नाई: पर तुम इतने खुश क्‍यों हो रहे हो और नाच क्‍यों रहे हो ?

राक्षस : तुम तो लगता है निरे काठ के उल्लू हो… तुम इतना भी नहींसमझ सकते… एक राक्षस के लिए इस चांदनी रात में इससेज्यादा खुशी की बात क्‍या हो सकती है कि उसे नरम-नरममांस खाने को मिले… अब मैं तुम्हारा मांस खाऊंगा … मैं सोचभी नहीं सकता था कि इस जंगल में … इतनी रात गए किसीमनुष्य का मांस खाने को मिलेगा मैंने कई दिन से किसीमनुष्य का मांस नहीं खाया…(हंसता है और फिर झूमकर नाचताहै)

नाई: (हंसी उड़ाते हुए) तुम सचमुच बुद्धू हो… तुम्हारा ज्ञान न पिछलेजन्म में तुम्हेरे काम आया और न इस जन्म में … तुममें तोरत्ती भर भी कॉमनसेन्स नहीं है…।

राक्षस : यह कॉमनसेन्स क्‍या होता है ?

नाई : (स्वगत) अब इसे छकाना चाहिए। (प्रकट) कामनसेन्स ! अरेकॉमनसेन्स कॉमनसेन्स होता है ।

राक्षस : लेकिन होता क्या है ?

नाई: (मुस्कुराता है) ओह! तुम्हें ज्ञान के इस सबसे सुन्दर फल केबारे में ही नहीं पता है तो तुम्हें फिर पता क्‍या है !…यह ज्ञानका सबसे खास फल हे। तुम्हारे गुरूओं ने तुम्हें इस फल केबारे में ही नहीं बताया… कमाल है! लगता है तुम किसी केप्यारे शिष्य नहीं रहे। वरना ऐसा कैसे हो सकता है कि ज्ञान केइस फल के बारे में तुम्हें मालूम तक न होता। होता है ऐसाभी होता है हर गुरू एक न एक गुर अपने चेले से जरूर छिपालेता है। बिल्ली ने जैसे शेर को पेड पर चढ़ना नहीं सिखाया…तुम्हारे गुरू ने तुमसे इस मुख्य ज्ञान को छिपा लिया। खैर… अबक्या हो सकता है…!

राक्षस : लेकिन तुम इतने खुश क्‍यों हो रहे हो ?

नाई: अब यही तो बात है तुममें कॉमनसेन्स होता तो तुम जान लेते।

राक्षस : फिर कॉमनसेन्स !

नाई : मेरा मतलब हे तुम्हें खुश होने से पहले सोचना चाहिए था किएक मनुष्य इतनी रात गए इस घने जंगल में… अकेला औरनिहत्था क्‍यों घम रहा हे…इसके बाद तम्हें यह सोचना चाहिए था ।

नाई : मेरा मतलब हे तुम्हें खुश होने से पहले सोचना चाहिए था किएक मनुष्य इतनी रात गए इस घने जंगल में… अकेला औरनिहत्था क्‍यों घूम रहा है…इसके बाद तुम्हें यह सोचना चाहिए थाकि एक मनुष्य राक्षस को सामने देखकर भी डर क्‍यों नहीं रहाहै? पर तुम सचमुच अकल से पैदल हो। तुमने एक मनुष्य देखाऔर सोच लिया कि तुम्हारे खाने का इंतजाम हो गया। ब्राह्मणहो न इसलिए खाने के अलावा कुछ सोच भी नहीं सकते। पेटूआदमी ज्ञानी हो या ज्ञानी आदमी पेटू दोनों ही बेकार…।(बीच-बीच में राक्षस हुंकारा भरता है और मुंडी हिलाता है)।

राक्षस : पहेलियां मत बुझाओ… देखो अब मुझे गुस्सा आ रहा है।सीधे-सीधे बताओ वरना…।

नाई: वरना क्या? वरना तुम मुझे खा जाओगे… ?

राक्षस : हां…।

नाई: चलों बता ही देता हूं तुम भी क्‍या याद रखोगे कि एक मनुष्यसे पाला पड़ा था तो तुम यह जानना चाहते हो कि मैं क्‍योंखुश हो रहा था ?

राक्षस : (गुस्से में चीखकर) हां मैं जानना चाहता हूं ।

नाई : तो सुनों मैं भी नहीं चाहता कि आगे भी तुम प्रेतयोनी में हीभटकते रहो। सच बात यह है कि हमारे देश का राजकुमारसख्त बीमार है। तरह-तरह के इलाज किए. पर कोई फायदानहीं। दूर-दूर से हकीम आए वैद्य आए। लेकिन महीनों गुजरगए रोग किसी की पकड़ में ही नहीं आता था…।

राक्षस : (गुस्से में) ओह ! बकवास बंद करो इसमें और तुम्हारे नाचनेमें क्या संबंध है ?

नाई: तुम भी यार कितने बेसब्र किस्म के राक्षस हो पूरी बात सुनतेनहीं और चीखने लगते हो। दूर-दूर से आए चिकित्सकों नेराजकुमार को देखा और एक ही नतीजे पर पहुंचे …।

राक्षस : किस नतीजे पर ?

नाई: इस नतीजे पर कि अगर राजकुमार को एक सौ एक ब्रह्मराक्षसोंके हृदय का रक्त पिलाया जाए तो वह ठीक हो सकता है…।(नाई किस्से सुना रहा है। राक्षस सुन रहा है और सोच भी रहाहै। तभी मुख्य गायक और बच्चों की टोली का प्रवेश होता है।)

किस्से गढ़ने में नाई बहुत उस्ताद था

बचपन में सुना हर किस्सा उसे जबानी याद थाअक्ल घूमती थी उसकी फिरकनी की तरहऔर जबान चलती थी कतरनी की तरहऔर राक्षस उसकी बातों में कैद हुआ जाता थामन-ही-मन मगर उसको गुस्सा भी बहुत आता था।रात तारों के बिछोने पे अभी सोती थी

बात नाई की मगर खत्म नहीं होती थी ।

टोली :फिर-फिर क्‍या हुआ ?राक्षस : (गुस्से में) तो ?नाई:राजा ने सारे राज्य में मुनादी पिटवाई है कि…।

मुख्य गायक : हर खासो आम को। सुबह को और शाम को। यह इत्तिला दीजाती है कि जो भी शख्स एक सौ एक ब्रह्मराक्षमों के हृदय कारक्त लाकर राजकुमार की दवा के लिए देगा उसे राजा आधाराज्य दे देगा और अपनी सुन्दर राजकुमारी से उसका विवाह करदेगा…।

नाई: (राक्षस से) यकीन करो मैंने सौ ब्रह्मराक्षगों को पकड़ लिया हैबस एक की कमी है… तुम्हें मिलाकर एक सौ एक की गिनतीपूरी हो जाएगी…।

राक्षस : (जोर-जोर से हंसता है) तुम्हें क्या लगता है कि तुम मुझे पकड़लोगे ?

नाई: (स्वगत) अरे मेरा वह छोटा-सा आईना कहां है ?

(बार-बार अपनी अलग-अलग जेबों में हाथ डालकर तलाशकरता है । फिर एक जेब से एक छोटा-सा आईना निकालकरउसे अपनी मुट्ठी में ले लेता है।) हां… पकड़ लूंगा नहीं मैंने तो तुम्हें पहले ही पकड़लिया हेै। तुम्हारी आत्मा को मैंने कैद कर लिया है। अब तुम्हारीआत्मा मेरी मुट्ठी में है । विश्वास नहीं हो रहा है तो बताऊं…?

राक्षस : (डरकर) बताओ?

नाई मुट्ठी में बंद आईने में राक्षस को दिखाता है। राक्षस उसमेंअपना प्रतिबिम्ब देखकर घबरा जाता है ।

राक्षस : (घबराकर) यह तो मैं हूं। यह तुमने कैसे किया ? तुम बहुत धूर्तहो… मुझे बातों में लगाकर तुमने मेरी आत्मा को चुरा लिया है ।यह गलत बात है मेरी आत्मा मुझे वापस करो ।

नाई : अच्छा! जिससे तुम मुझे खा जाओ। अब तुम कुछ नहीं करसकते। अब मैं तुम्हें ले जाकर राजा को सौंप दूंगा और ईनामपाऊंगा …।

राक्षस : (डरता है। गिड़गिड़ाता है।) देखो मुझे माफ कर दो । मैं कसमखाता हूं मैं तुम्हें कोई नुकसान नहीं पहुंचाऊंगा… मैं तो यूं हीतुम्हें डरा रहा था…मेरा पेट तो पहले से ही भरा हुआ है । मैं तोपहले ही तय कर चुका हूं कि मैं कभी मनुष्य का मांस नहींखाऊंगा…

नाई: यह नहीं हो सकता… तुम्हे छोड़ दूंगा तो मेरा तो बहुत नुकसानहो जायेगा । मैं एक गरीब आदमी हूं… इतना अच्छा मौकाभला मैं कैसे छोड़ दूं तुम्हीं सोचो ?

राक्षस : तुम्हारा कोई नुकसान नहीं होगा। राजा तुम्हें क्या देगा सिर्फआधा राज्य न ?… मैं तुम्हें सात रियासतों के बराबर धन देसकता हूं। मुझे छोड़ दो… मैं वादा करता हूं कि मैं इस जंगलको छोड़कर चला जाऊंगा ।

नाई: तुम क्या मुझे बुद्धू समझते हो ? इस जंगल में धन कहां सेआएगा और आ भी गया तो इतने सारे धन को मैं अपने घरतक ले कैसे जाऊंगा ।

राक्षस : इसकी फिक्र मत करो। खजाना तो यहीं तुम्हारे पीछे जो पेड़ हैउसी के नीचे दबा हुआ है। आओ मैं तुम्हें दिखाता हूं ….?पीछे खड़े पेड़ को धक्का देकर हटाता है। उसके नीचे से धनसे भरा कलश निकलता है। नाई धन देखकर खुश होता है ।

नाई: इसे मेरे घर कैसे पहुंचाओगे ?

राक्षस : मेरी शक्ति में विश्वास करो मैं पलक झपकते ही इसे तुम्हारेघर पहुंचा दूंगा…।

धन सारा राक्षस ने उसके घर पहुंचाया

धन सारा राक्षस ने उसके घर पहुंचाया

नाई ने उससे एक नया घर बनवाया

फिर एक दिन उसने ब्याह रचाया

सुन्दर सी एक बहू वह घर में लाया।

सुविधा का हर सामान जुटाया

राक्षत था लेकिन अब भी घबराया

बोला मुझको अब मुक्ति दे दो

अब नहीं कोई भी कर्ज बकाया।

नाई ने सोचा लेकिनइतनी जल्दी इसको मुक्ति देना ठीक नहीं हेऔर बकाया कामों को भी निपटा लेना अच्छा होगा ।

राक्षस नाई के आगे हाथ जोड़कर मुक्ति के लिए विनती करताहै ।

नाई: देखो मेरे खेतों में फसल तैयार खड़ी है और मुझे अभी कईकाम हैं। तुम उस फसल को काटकर खलिहान में रख दो इसकेबाद ही मैं तुम्हें मुक्त करूंगा…।

राक्षस : लेकिन …?

नाई: लेकिन वेकिन कुछ नहीं… शुक्र मनाओं कि मैं तुम्हें राजा केहवाले नहीं कर रहा हूं।(राक्षस सिर झुकाए जाता है। नाई मुस्कुराता है।)

मरता क्‍या न करता राक्षस ने सिर झुकाया और खेत पर कामकरने चल दिया। इसी बीच एक दिन क्‍या हुआ…?

नाई का घर। अचानक घर के अन्दर से बरतन गिरने और एक औरत के चिल्लानेकी आवाजें आती हैं ।

नाई : अरे क्‍या हुआ ? इतना शोर क्‍यों मचा रखा है ? नाई की पत्नी चिल्लाती हुई और हाथ में एक बड़ी-सी कटारलिए आती है ।

नाई : अरी भागवान यह तुम किस दुश्मन का सिर काटने जा रही हो ?

नाई की पत्नी : तुम जो मछली लाए थे बिल्ली उसका सिर लेकर भाग गई। मैं इस बिल्ली को नहीं छोडूंगी… तंग कर डाला इस काली बिल्लीने… आज मैं उसे जरूर मजा चखाऊंगी… आज उसकी गरदननहीं बचेगी…।

ब्रह्मराक्षत काम करने के लिए हंसिया हाथ में लेकर आगे बढ़ता है ।

दूसरा राक्षस : (पहले राक्षस से) यह तुम क्‍या कर रहे हो? राक्षसो ने यहखेती-बाड़ी करना कब से शुरू कर दिया ?

पहला राक्षस : क्या बताऊं यार… मैं एक बहुत लालची और शातिर मनुष्य केचक्कर में फंस गया हूं। उसने पता नहीं कैसे मेरी आत्मा कोबंदी बना लिया और अब मुझे उससे मुक्ति पाने के लिए यहसब करना पड़ रहा हे…।

दूसरा राक्षस : (हंसता है) तुम कंसे ब्रह्मराक्षस हो! उस मनुष्य ने तुम्हें जरूर…बुद्धू बना दिया है। अरे मनुष्य भी कहीं राक्षस से ज्यादाशक्तिशाली हो सकता है। आदमी की औकात ही क्‍या है जोहमें पराजित कर सके…मुझे जरा उस आदमी का घर दिखाओं मैं देखता हूं कैसे वह हम राक्षसों से काम करा सकता है…?

पहला राक्षस : दिखा तो दूंगा लेकिन दूर से। यह खेत काटे बिना उसके पासजाने की हिम्मत मुझमें नहीं है। उसने वादा किया है कि खेतकटते ही वह मेरी आत्मा को मुक्त कर देगा… तुम्हारे चक्करमें अगर उसने फिर कोई काम बता दिया तो मैं व्यर्थ ही माराजाऊंगा ।

पहला और दूसरा राक्षस एक चक्कर काटठते हैं। पहले वालादूसरे राक्षम को नाई का घर दिखाता है। नाई के घर कीखिड़की खुली हुई है। खिड़की के पीछे छिपकर नाई की पत्नीहाथ में कटार लिए खड़ी है। दूसराराक्षस दबे पांव खिड़की के पास आता हे ।

नाई की पत्नी : (हाथ में कटार लिया स्वगत) आज मैं इस बिलइया को नहींछोड़नेवाली… बस एक बार और अन्दर आ जाए तो आज मैंउसका काम तमाम कर डालूं …।(दूसरा राक्षस अपना झबरा सिर धीरे-से खिड़की के अंदरघुसाता है और पत्नी तेजी से कटार से”वार करती है। सिरतो बच जाता है पर राक्षस की नाक कट जाती है। लहूलुहानब्रह्मराक्षस “मार डाला…मार डाला…” चीखते हुआ भागता है ।

राक्षस : मालिक मैंने पूर काम निपटा दिया है। फसल खलिहान मेंपहुंचा दी है अब तुम भी अपना वादा पूरा करो और मुझे मुक्तिदे दो ।

नाई: (मुस्कुराता है। जेब से आईना निकालता है) तुम भी क्‍या यादरखोगे कि एक वादे के पक्के आदमी से तुम्हारा पाला पड़ा है।(आईने को उल्टा करके उसकी लाल वाली तरफ से राक्षस कोदिखाता है।)

देखो अब इसमें तुम्हारी आत्मा नहीं है। मैंने तुम्हें मुक्त किया।(राक्षस खुश हो जाता है। फिर नाई ने एक बात बोली

धीरे से ब्रह्मराक्षस कान मेंअब भाग यहां सेकिसी और गाम में।

अब नजर न आना कभीइस मुकाम में।

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