परिवार में सब कुछ

एक सभागार में अखंड रामायण का पाठ किया जा रहा था. शाम का समय था – श्रद्धालुओंकी भीड़ लगी थी और सभागार में तिल रखने को जगह नहीं थी।

फ़िल्मी धुनों पर रामायण की पाठों के बीच अचानक एक घनघोर गर्जना हुई और एकचमत्कार हो गया ।

एक राक्षस प्रकट हो गया था वहाँ. लपलपाती आग उगलती जिव्हा और खून से सने उसकेलंबे नुकीले दाँत उसे भयानक बना रहे थे ।

सभागार में भगदड़ मच गई ।

जिसे जैसी जगह दिखी भाग निकला. सेकेण्डों में सभागार खाली हो गया. पुजारी जिसकेनिर्देशन में पाठ किया जा रहा था भागने वालों में प्रथम था ।

परंतु एक व्यक्ति निर्विकार बैठा हुआ था ।

राक्षत गरजते हुए उसके पास पहुँचा और पूछा – तुम जानते नहीं मैं कौन हूँ ?

उस व्यक्ति ने कहा – हाँ मैं जानता हूँ – तुम कुम्भीपाक नर्क के राक्षस हो.

राक्षस ने गरजते हुए आग उगलते हुए फिर पूछा – तुम्हें मुझसे डर नहीं लगता ?

उस व्यक्ति का जवाब था – नहीं बिलकुल नहीं।

राक्षस का गुस्सा आसमान पर था – देवता भी तुम्हारी रक्षा नहीं कर पाएंगे मूर्ख! ये बतातुझे मेरा भय क्‍यों नहीं है ?

उस व्यक्ति ने उसी शांति से जवाब दिया – मैं पिछले पच्चीस वर्षों से शादीशुदा हूँ।

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