रेखाएँ : वृत्तचक्र (एक)

ऊँहूँ। नहीं यह सबकुछ भी नहीं सोचूँगा।

मुझे ऐसा कुछ भी नहीं सोचना चाहिएजिससे कि मेरा दिल कमजोर पड़ जाए।

मेरा घाव जल्दी ही भर जाएगा मैं चंगा होंजाऊंँगा। मैं भी कैसा हूँ!

मरने से डरता हूँ!

मरने की बात सोचते ही जी कैंसा-कैसाकरने लगता है।

बहुत कमजोर हो गया हूँ न इसलिए फौजी होने का मतलब यहनहीं है कि वह मरने की बात सोचकर नाच उठे। उस दिन डॉक्टर ने खूब कहा“कैप्टेन कुछ फिकर मत करो। फर्ज करो कि तुम एक भेड़िए के मुँह में पड़े हुएहिरण के बच्चे को बचाने के सिलसिले में जरा घायल हो गए हो। बस…भेड़िए के मुँहसे हिरण के बच्चे को छुड़ाने के सिलसिले में!

हिरण के बव्चे की कल्पना करते ही मेरी आँखों के आगे ‘शकुन्तला” फिल्म दौड़जाती है। शकुन्दगा-जयश्री हिरण का बच्चा। जयश्री शान्ताराम! डॉ. कोटनीस कीअमर कहानी बड़ी अच्छी तस्वीर है…अच्छा यदि मैं इस अस्पताल में मर गया तो…तोक्या मेरी कहानी भी हर लब पर होगी! फिल्म बनेगी? फिल्म का नाम होगा-“कैप्टेनसिन्हा !

न यह तो कॉपी हो जाएगी। अच्छा होगा-‘कश्मीर की घाटी में” सुनने मेंजरा रोमांटिक भी मालूम होगा। बड़े-बड़े पोस्टरों पर लिखा जाएगा-“कश्मीर की घाटीमें’-एक ऐसे कैप्टेन की कहानी जिसने राष्ट्रीय सरकार की इज्जत बचाने के लिएअपनी जान दे दी…कहानी शुद्ध करने में जरा दिक्कत होगी डायरेक्टरों को।

दिखाएगा मेरी जिन्दगी का प्रथम अध्याय-मेरा गाँव। एक गाँव जो वास्तव में होगाबम्बई के आसंपास के किसी गाँव का हिस्सा अथवा स्टूडियो का कोई कोना।

दूर-बिहार के पूर्वी अंचल पूर्णिया जिले में क्‍यों जाएँगे…इसके बाद आवारागर्दीपढ़ा-लिखा बेकार और एक जानकार गरीब। गरीबों की दुनिया में मुहब्बत। ज्योत्स्नाके प्रति मेरी तुकबन्दियों को कलापूर्ण कविताओं की संज्ञा दी जाएगी-शायद। मेरीकोई कविता तो मिल नहीं सकेगी उन्हें। बना लेंगे लोग…ठंडी साँसें बुलबुल मीठी: नींद सपने और चाँदनी रातें आदि शब्दों से भरे हुए कुछ गीत। तर्ज तो होगा-यही…आजकल का पंजाबी…नायक कौन होगा? पी. जयराम ठीक है। नहीं वह मोटा है।तो फिर?…एक बार आईने में अपना चेहरा देखने को जी करता है…कोई भी होनायक । दृश्य होगा-बेकारी से ऊबकर बाल बिखराए हुए अजीब सूरत में रिक्रूटिंगऑफिस में!

फिर लड़ाई के मोर्चे तमगे तरक्की-कैप्टेन! नायिका-ज्योत्स्ना कौनबनेगी? कहीं बेगम पारा हई तो सब गुड़गोबर। ज्योत्स्ना ही शायद उतरे।

नहीं वह नहीं उतरेगी । शायद अपने ‘नाम’ की आज्ञा भी न देगी। मनगढ़न्त प्रेम कहानी कोमेरे दिल के किस्से कहकर लोग मुझे एक महान प्रेमी बना देंगे…लेकिन यह 10 गुरखा रेजिमेंट का सूबंदार दिलबहादुर गुरुग जो अभी अस्पताल में घायल होकर पड़ा हैइसके काबिल है वी.एच. देसाई ही। बेड पर पड़े-पड़े हर डॉक्टर और नर्स को वह’जयसिंह’ कहेगा बुखार में जब-‘कांछा ले कांछी लाय लग्यो बन को बाँटो लालटनीबालेर’ गाएगा और हर तेजी से गुजरते हुए डॉक्टर को-नानसेंस के लहजे में-‘मोरो’तथा नर्स को मोरी’ कहेगा तो ठहाकों से गूँज उठेगा सारा हॉल।

नानसेंस कास्त्रीलिंग नहीं होता लेकिन ‘मोरो’ का होता है ‘मोरी’ । नर्स ‘मोरी’ का मतलब नहींसमझती।

वह दृश्य कितना मार्मिक होगा जब ज्योत्स्ना अपने पति मिस्टर वर्मा के साथचाय पर बैठकर अखबार पढ़ती रहेगी। मिस्टर वर्मा अपने मालिक हिन्दू-प्राण सररामपत ठनठनियाँ की उदारता का जिक्र करते हुए उनका हिन्दुओं का कर्तव्य!शीर्षक स्टेटमेंट पढ़ने को कहेंगे। पढ़ने के सिलसिले में अखबार के एक कोने मेंज्योत्स्ना पढ़ेगी-कश्मीर अस्पताल में कैप्टेन सिन्हा की मृत्यु…हाथ से चाय की प्यालीगिरकर “झन्न!…वह आँखें फाड़े शून्य में ताकती रहेगी बाल बिखर जाएँगे आँखों मेंआँसू छलछला पड़ेंगे मिस्टर वर्मा घबराकर चिल्ला उठेंगे-जोना! जोना!

तुम्हें क्या होगया ?

ग्राउंड म्युजिक चल पड़ेगा-‘शहीदों के मजारों पर लगेंगे हर बरस मेले….

मेरी आँखों में भी आँसू आ गए। दिल की धड़कन बढ़ रही है हिस्स मैं भी कैसाहूँ!

कैसी-कैसी बेकार की बातें सोचता हूँ। ज्योत्स्ना को तो मेरी मौत की बात भीमालूम नहीं हो पाएगी। अखबारों में हर इंसान की मौत के बारे में छपने लगा तोहुआ ।…लेकिन “शहीदों के मजारों पर” गीत मुझे प्रिय है। शायद मन में शहीदकहलाने की बहुत बड़ी लालसा छिपी हुई है…मणिपुर की बमबारी के दिनों-अच्छीतरह याद है-मुझे बार-बार यही तकलीफ सतांती रही कि मेरी मौत क॒त्ते-बिल्लियों कीमौत से भी गई-गुजरी होगी। अपने मुल्क की मिट्टी भी मुझे अपना कहकर कबूलनहीं कर सकेगी…कितना दुख हुआ था मुझे! 45 की छुट्टी में गाँव लौटा था। मेरीबहन से “भारतमाता ग्रामवासिनी’ गाने को कहा था तो वह ठठाकर हँस पड़ी थी। उसेआश्चर्य हुआ था कि मैं भी इस तरह के गीतों में दिलचस्पी लेता हूँ। मैंने अनुभवकिया था कि मेरे अधिकांश दोस्त मुझे घृणा की दृष्टि से देखते हैं। मनमोहन मुझसे-इसलिए बात नहीं करता था कि मैं उसकी पार्टी के विरुद्ध लड़कर आया था। सुधीरमेरे बचपन का साथी सुधीर!

मेरी कविताओं पर झूमनेवाला सुधीर!-मेरे साथसाहित्यिक बातें करना फिजूल समझता था क्योंकि उसकी निगाह में मैं कुछ और होचुका धा। और ज्योत्स्ना?

वह तो मेरी छाया से भी घबरा जाती थीं।

उसने मिस्टरवर्मा एडवोकेट साहब से शादी कर लीं। जमींदार का वकील है वर्मा सुना है बिहारके दंगे के समय उसने कमाल कर दिखाया है। जमींदार साहब की जीप गाड़ी परदिन-भर में पचासों गाँवों में जाकर पर्चेबाजी और उत्तेजना फैलाता फिरा। कहा जाताहै कि जिस गाँव से उसकी गाड़ी विदा होती उसके बाद ही’ वहाँ लंकाकांड औरदानवी-लीला शुरू हो जाती है…गर्भ चीरकर बच्चे को निकालकर भाले की नोकपर…!

राशन के लिए ‘क्यू’ में खड़ी-खड़ी उस औरत को जो बच्चा हो गया था ‘कलककत्ते के फुटपाथ पर अमेरिकन सैनिकों ने कितने उत्साह से उसकी तस्वीर ली थी!हमारे भाई लोग भीड़ हटा रहे थे-हट जाओ साहब फोटो लेते हैं…सनमोहन ने एकबार मेरी तस्वीर उतारी थी।

बहुत साफ आई थी मेरी तस्वीर

मैं यह सब क्‍यों सोच रहा हूँ। ‘इनफीरियारिटी कॉप्लेक्स’ के कक पर तो नहींचल रहा हूँ।…करवट नहीं ले सकता हूँ। पेट और जाँघ पर पट्टियाँ बँधी हुई हैं।बहुत दर्द है। कमजोरी और प्यास आज बेहद बढ़ गई है। पेट में सुई गड़ाने कीतरह दर्द…! आह! शायद आज मैं…अब मैं जी नहीं सकूँगा…हाँ डॉक्टर से कहनाभूल गया कहीं अन्त तक भूल ही न जाऊँ अपने रुपए ‘शरणार्थी फंड’ में दे जानाचाहता हूँ।

“कैसा है कैप्टेन?”-नर्स एलिस आकर पूछती है। ऐंग्लो इंडियन एलिस! गुडमार्निंगके बदले आजकल “ज्योहिन” कहती है। मेरे सिर पर हाथ रखा उसने। रेक्टमवसेलाइन” लाने गई ।…नर्सों की तलहथी और उँगलियाँ इतनी ठंडी क्यों होती हैं? मेरातो अब तक का यही अनुभव है। शायद बराबर हाथ धोती रहती हैं। कश्मीर में भीएंग्लो नर्से? यहाँ की खूबसूरत औरतें क्‍यों नहीं “नर्सिंग ज्वाइन’ करती हैं? सिर्फदो-तीन सिस्टर हैं कश्मीरी बाकी सब एंग्लो। सिस्टर उपाध्याय ही आई थी उसदिन…पंडित नेहरू के विजिट के दिन। इन्दिरा गांधी और सिस्टर उपाध्याय में कितनाअन्तर ?

कितने महान्‌ हैं पंडितजी! मुझे यकीन है कि यदि मेरे पेट और जाँघों परपट्टयाँ न बँधी होतीं तो वे मुझे गोद में उठाकर चूम लेते। बातें ही उनकी क्या कमथीं?-“आजाद हिन्दुस्तान की इज्जत तुमने बचाई है जवाहर ने नहीं। तुम्हारे जैसा“भाई” पाकर मुझे आज पहली बार अपने प्रधानमन्त्रीत्व का गुमान हो रहा है।…औरतुम्हारी जॉनिसारी के किस्से सुनकर तो मैं जवान हुआ जा रहा हूँ मैं दामन पसारकरतुम्हारी बड़ी उम्र के लिए दुआ माँग रहा हूँ ।

मेरी आँखों में आँसू आ गए थे। उनकी भर्राई हुई आवाज…दूसरे थे पटवर्धनसाहब नाम सुना था देखा नहीं था…कोहिमा कैम्प में चर्चा होती थी बराबर…चुपचाप…जयप्रकाशजी की अरुणाजी की पटवर्धन और लोहियाजी की…बहुत सुन्दरहैं पटवर्धनजी…पंडितजी को जब कहा गया मैं बिहार का हूँ तो दोनों ही उछल पढ़ेथे। पंडितजी भी और पटवर्धनजी भी। “बिहार” सुनते ही पटवर्धनजी के मन में तुरन्तजयप्रकाशजी की तस्वीर आई होगी और पंडितजी की आँखों के सामने 1934 केभूकम्प-पीड़ित इलाके…हाल के दंगे के नजारे नांच गए होंगे शायद…

उफ नेहरू सरकार को फेल करने के लिए कितनी नापाक कोशिशें हों रही हैं।क्या उन्हें रात में नींद आती होगी? यदि इस बार बच गया मैं…तो…नहीं मंसूबे नहींबॉधना चाहिए। लेकिन मैं कहता हूँ कि सारी प्रतिक्रियावादी ताकतों को कुचल डालनेसे ही सोने का हिन्दुस्तान बनाकर तैयार हो सकेगा। मुट्ठी-भर कुचक्रियों को प्रश्नयदेना ‘फासिज्म’ के लिए रास्ता सहल कर देना है। कुछ नहीं…कोर्ट मार्शल…फायर…फायर…फायर…

मैं जोर से तो नहीं बोल उठा? नहीं ठीक है जोरों की प्यास लगी है। बड़ीबेचैनी ! दिलबहादुर के मुँह से मार्चिंग सौंग के तर्ज पर सीटी बजा रहा है…यह क्याज्यादा देर तक किसी चीज को देख नहीं सकता हूँ। आँखें झिलमिलाने लगी हैं।सामने काले नीले…तरह-तरह के धब्बे मालूम पड़ते हैं। कमजोरी है। डॉक्टर कह रहाथा कि मुझे ताजा खून नया लहू दिया जाएगा। मेरी जान बचाने के लिए जो लहूदेगा उसे न तो मैंने देखा है और न उसने मुझे। लहू मेरे लिए तो नहीं एक ऐसेसैनिक के लिए जो राष्ट्रीय सरकार की इज्जत के लिए लड़कर घायल है।

ऐसा लगरहा है कि…मानो स्पष्ट देख रहा हूँ…कुछ कॉलेज के लड़के आए हुए हैं “ब्लड बैंक’में अपना खून देने। स्वस्थ तगड़े नौजवान। दिल से भी स्वस्थ। लड़कियाँ भी हैं।लड़कों के चेहरे अपरिचित नहीं मालूम होते और लड़कियाँ भी सब जानी-पहचानी-सीलगती हैं।

ज्योत्सना भी। हाँ वह बैठी। डॉक्टर ने स्पिरिट लगाकर चमड़े को’स्टरलाइज” किया।

स्पिरिट में भिगोई हुई रुई से सिरिंज की सुई साफ करता.है।मुस्कुराकर ज्योत्स्ना से कुछ पूछता है। सुई गड़ा रहा है। अपने को निडर दिखलानेके लिए वह मुस्कुराती हुई सीधे सुई की ओर देखती रहती है।…अरे! ज्योत्स्ना काचेहरा बदल गया। कोई दूसरी लड़की है। सुई चुभोई गई। चेहरे पर जरा-सीशिकन…फिर मुस्कुराहट…सिरिंज में खून आ रहा है धीरे-धीरे…। लाल-लाल…ताजाखून…लाली क्रमशः काली हो रही है।…मेरी नसों में खून दौड़ रहा है। लाललहू…लाल रक्तकणिका और श्वेतरक्तकणिका में लड़ाई हो रही है…लाल जिन्दगी…सुफेदमौत…कफन-सी सुफेद…सुफेद कणिकाओं पर लाल की विजय…बायोलोजी लैबोरेटरीमें काँच के नलों में लड़ाई…अरे! वह लड़की बेहोश होकर गिर पड़ी!

बेहोश होकर.

याद आती है उस नागा लड़की की। सारे डिगबोई में श्मशान की-सी शान्ति।आसमान में टोह लगानेवाले जहाजों की धीमी भनभनाहट। शहर के आम ‘रोड’ सेहमारी टोली गुजर रही। बूटों की छन्दमय आवाज…लेफ्ट-राइट-लेफ्ट!

एक मोड़ परकुछ नागा लड़कियाँ सैनिकों पर फूल बरसाने के लिए मुस्कुराती हुई खड़ीं। अपनीभाषा में न जाने क्‍या चिल्लोकर संब फूल फेंके ।…मेरा जी किया था कि एक फूलउठा लूं। “ल्यप…ठाँ।’…बाई ओर मुड़ते हुए मैंने देखा कि वह लड़की जो सबसे बड़ीथी और निडर होकर मुस्कुरा रही थी…गिर पड़ी। बेहोश होकर ।

“कैप्टेन कैसा है?”-शएलिस आई। यह क्या? बोल नहीं सकता हूँ। आवाज नहींनिकल रही है। होश में हूँ तो ?…हाँ तो। लेकिन बोल नहीं सकता हूँ क्यों? इशारे सेअपनी लाचारी दिखलाता हूँ। खुट खुट खुट…। एलिस चली गई। चलती जा रहीं है।वह रहती है तो अच्छा लगता है। मुझे डर मांलूम हो रहा है क्या? नहीं डर काहे का?मरने का? हमारा भाई प्रधानमन्त्री जिसे न दिन में चैन है न रात में नींद!…उनकागम्भीर चेहरा।…नाक की बगल से निकलकर जो रेखा ठुडडी तक चली गई है वहक्रमश: गहरी होती जा रही है। मेरे लिए दुआ माँग रहा है। दुआ? भीख ?…नहीं उन्हेंभीख नहीं माँगने दूँगा। उस दिन उनसे बात करने के समय मैं मुस्कुराया नहींइसीलिए वे आज दुआ माँग रहे हैं। दामन पसारकर भीख माँगते हुए नेहरू कीकल्पना…कितनी बुरी ?

बिगुल फूँकते हुए नेहरू…धू…तू…धूतू…तैयार! हजारों-हजारजवानों की टोलियाँ कूच को तैयार! मार्च…।

नेहरू मुस्कुराता…।

किसी ने छिपकरउनकी पीठ में छुरा भोंक दिया। वे गिरे…वे गिरे…खून से लथपथ छटपटा रहे हैंछि: क्या सब सोच रहा हूँ। कुवत लार्ऊँ अपने अन्दर…लेकिन नेहरू की लाश तड़परही है…हजारों जवानों की लाशें तड़प रही हैं…गाँव जल रहे हैं औरतें चीख रही हैंबच्चे जलाए जा रहे हैं…गर्भ चीरकर निकाले हुए बच्चे…कोटि-कोटि गरीबों की दुनियाजल रही है…कालीं फौज बढ़ रही है…।

हम सब घाटियों में छिप रहे हैं…। वह रहारामपत ठनठनियाँ…मिस्टर वर्मा…। ठनठनियाँ नहीं…मुसोलिनी… । मिस्टर वर्मा…उसकी सूरत हिटलर-जैसी हो रही है…काली वर्दी…। सब साथ हैं…निशाना साधताहूँ…हिटलर गायब हो जाता है…शराफत हुस्सैन पठान…निशाना साधता हूँ…पठानगायब…हिन्दूप्राण… पठान…छोटे-से हिरण के बच्चे को भेड़िए ने पकड़ा…छौनाछटपटा रहा है…निशाना साधता हूँ भेड़िया मुझे अपने जबड़ों से दबोच लेता है…तेजदाँत…दर्द…दर्द…डॉक्टर हैं।

बड़े डॉक्टर छोटे डॉक्टर भीड़। मैं शायद बेहोश हो गया था।

खून दे रहेहैं। दिलबहादुर अपने बेड पर बैठा मुझे आश्चर्य से घूर रहा है। मुझे क्या होगया?…खून दे रहे हैं डॉक्टर…डॉक्टर के गले में स्टेथस्कोप की नली धीरे-धीरे मोटीहोती जाती है…अजगर…भागो एलिस…एलिस की आँखें पीली पुतलियाँ…मेरी पलकेंभारी हो रही हैं…मोहे नींद सतावे…।

‘विक्टरी डे’ के दिन लल्लन बाई नाच रहीथी…मोहे नींदा सतावे…कोहिमा कैम्प में चर्चिल का भाषण सुनतें समय मैं ऊँध रहाथा…जवाब-तलब…प्रधानमन्त्री की आवाज की बेइज्जती…जुर्म…देंह में आग लगगई…गर्मी…गर्मी…डॉक्टर…डॉक्टर…झुरीदार चेहरा…माँ की तरह…माँ जब हैंसती थीचेहरे पर झुर्रियों की जाली खिल पड़ती थी…माँ माँ…“ठीक हो जाएगा कमजोरी है-डॉक्टर कह रहा है शायद। मेरी नसों मैं गर्म-गर्मखून दौड़ रहा है। मैं जी पडैँगा।

ठीक हो जाऊँगा। ज्योत्स्ना…?

नहीं एलिस!

लिसकी आँखें…पीली पुतली गोल…पलकें भारी हो रहीं हैं…लल्लन बाई…हरी…साड़ी…मुस्क्राती है…लाल होंठ…एलिस…सुफेद एप्रेन…सुफेद…लाल…हरा… तिरंगा…गोलपुतली…तिरंगा…15 अगस्त…दिल्ली…बैंड…परेड…झंडा…सलामी…पंडितजी…चेहरे पररेखा गम्भीर…गहरी…।

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