तीसरी चेतावनी

रात के आकाश की गहरी नीलिमा में से प्रभात ने झांक कर देखा किएक युवक तेजी के साथ संकेत की तरह उठे हुए पर्वत की ओर चला जारहा है।

उसका हृदय समस्त संसार की गति से स्पंदित था।

बिना तनिकसी भी चिंता किए हुए वह समतल मैदान पर घंटों ही चलता रहा। जबवह जंगल के निकट पहुंचा तो उसे एकदम समीप और सुदूर से आतीहुई एक बड़ी ही रहस्यमय सी ध्वनि सुनाई पड़ी “युवक! अगर तुम हत्यानहीं करना चाहते तो इस जंगल में होकर मत जाओ!”

युवक आश्चर्य से स्तंभित खड़ा रह गया।

चारों तरफ घूमकर देखापर उसे एक चिड़िया भी नज़र नहीं आई। तब उसे निश्चय हो गया किकोई प्रेत बोल रहा था। किंतु उसके जन्मजात साहस ने विचित्र चेतावनीकी ओर ध्यान नहीं देने दिया।

पर उसने अपनी चाल जरा धीमी ज़रूरकर दी और बिना किसी भय के अपने रास्ते पर चल दिया। संज्ञा उसकीजागृत थी और राह में मिलनेवाले किसी भी अज्ञात शत्रु का सामना करनेके लिए पूरी तरह से सतर्क भी।

पेड़ों की घनी परछाई में से निकल करवह बाहर खुले में आ पहुंचा किंतु उसे कोई भी संदेह भरी ध्वनि फिर सुनाईनहीं पड़ी और न कोई ललकार ही!

अब वह एक बड़े पेड़ के नीचे आ पहुंचा था। वहां विश्राम करनेके लिए वह बैठ गया। उसकी आंखें अपने सामने पड़े हुए बड़े मैदान परतिरती हुई पर्वत की उस नग्न और सुरेख चोटी तक पहुंची जो उसकागंतव्य थी।

पर उस स्थान से वह उठे उठे कि दुबारा वही भेद-भरीसुनाई पड़ी-एकदम समीप से-एकदम सुदूर से आती हुईं कप याकहीं अधिक गंभीरता के साथ“युवक! इस मैदान को पार मत कर जाना अगर अपनी मातृभूमिपर आफृत नहीं बुलाना चाहते होतो!”

इस बार युवक के स्वाभिमान ने उसे कोई परवाह नहीं करने दीऔरस्वयं उस अर्थहीन तथा मूर्खतापूर्ण चेतावनी पर जिसमें जैसे कुछ भारी भेदभरा हो मुस्करा पड़ा और तेजी से चल दिया। मालूम नहीं कि अशांतिया आकुलता किसने उसके पैरों में गति भर दी थी।

जब वह पर्वत के नीचे अपने गंतव्य के निकट पहुंचा शाम का गीलांधुंध मैदान पर छा चुका था। पत्थर पर वह पूरी तरह से अपना पैर भीनहीं रख पाया था कि वही ध्वनि फिर गूंजने लगी–एकदम समीप से एकदमसुदूर से-रहस्यमय-किंतु इस बार वह अधिक डरावनी थी-“युवक और आगे कृदम मत रखो वरना मार डाले जाओगे!”

युवक जोर से हंसा और बिना जल्दबाजी या हिचकिचाहट के अपनी- राह पर चलता ही गया।

और जैसे-जैसे वह ऊपर चढ़ता जाता था अंधेरा होता जाता था किंतुउसका उत्साह बढ़ता ही गया। जिस समय वह ऐन शिखर पर पहुंचा उसकेमस्तक को सूर्य की अंतिम किरण ने चूमकर ज्योतित कर दिया।

“लो मैं आ पहुंचा!” उसने विजयोल्लास से भर कर कहा “ओ बुरेया भले अज्ञात प्रेत! यदि तू मेरी परीक्षा लेना चाहता था तो मैं सफलहो गया! किसी भी हत्या का पाप मेरी आत्मा पर नहीं है; मेरी मातृभूमि. नीचे चैन से शांत लेटी हुई है और मैं अभी भी जीवित हूं। तू जो कोईभी हो मैं तुझसे अधिक शक्तिशाली हूं क्योंकि मैंने तेरी आज्ञा का उल्लंघन<करके अपने कर्तव्य का पालन किया है!”

पर्वत में से जैसे कड़ककर बिजली फट पड़ी-“युवक तू भूलता है!”इन शब्दों के अति दुर्वह बोझ के नीचे युवक दब सा गया।

चट्टान के किनारे पर बैठकर वह जैसे आराम करने के लिए लेटने लगा और ओठों को मरोड़ कर चाबा और बड़बड़ाया-“तो मालूम होताहै कि मैंने अनजाने ही कोई हत्या कर डाली!”

“तेरे लापरवाह कृदमों ने एक कीड़े को कुचल दिया-” प्रत्युत्तरप्रतिध्वनित हुआऔर युवक ने फिर अन्यमनस्क होकर उत्तर दिया-“ओह ! अब समझा !कोई बुरा या भला प्रेत मुझमें नहीं बोल रहा था बल्कि एक ऐसा प्रेत जोमजाक भी करना जानता है। मुझे नहीं मालूम था कि इस मृत्युलोक मेंभी ऐसे विचित्र प्राणी रमण किया करते हैं।

अंधेरी में मिटती हुई द्वाभा में जो वे ऊंची-ऊंची पर्वत श्रेणियां खोईजा रही थीं उन्हीं में से फिर प्रत्युत्तर प्रतिध्यनित हुआ-“क्या तुम अबभी वही युवक हो जिसकी आत्मा प्रातःकाल विश्व-संगीत से स्पंदित थी?क्या तुम्हारी आत्मा इतनी गिर गई है कि वह एक कीड़े के भी दुख दर्दसे द्रवीभूत नहीं हो सकती ?”

“क्या यही तुम्हारा मतलब था?” युवक ने माथे में बल डालते हुएपूछा “तब क्‍या मैं उन्हीं असंख्य जीवों की तरह हज़ारों लाखों गुना हत्याराहूं जिनके पैरों तले अनजाने ही अनगिनती कीड़े-मकोड़े कुचल जाते हैं?”

“सो हो या न हो पर इस विशेष जीव की हत्या न करने के लिएतुम्हें पहले ही चेतावनी दे दी गई थी। क्‍या तुम जानते हो कि सृष्टि केशाश्वत विधान में इस कीड़े का क्‍या महत्त्व था?”

सर झुकाकर युवक ने उत्तर दिया-“क्योंकि न तो मैं इस बात कोजानता ही था और न जान ही सका था इसलिये तुम्हें विनयपूर्वक यहमानना ही पड़ेगा कि मैंने उन अनेक संभाव्य हत्याओं में से जिन्हें तुम रोकनाचाहते थे केवल एक ही की है। किंतु मैं यह जानने के लिए बहुत उत्सुकहूं कि आखिर उस मैदान को पार करके मैंने अपनी मातृभूमि पर कैसे आफृतबुला ली है।”

“युवक! तुमने वह रंगीन तितली देखी” एक फुसफुसाहट सी युवकके कान में हुई “जो एक बार तुम्हारी दाहिनी तरफ उड़ रही थी?

“तितलियां तो बहुत सी देखीं और वह भी जिसका जिक्र तुमने किया ।”

“बहुत सी तितलियां! और बहुत सी तितलियों को तेरी सांस ने उनके ठीक रास्ते से उड़ाकर भटका दिया है; किंतु अभी मैंने जिसका जिक्र कियाहै वह पूर्व की ओर चली गई है और बहुत दूर तक उड़ती-उड़ती राजमहतके उपवन में पहुंच गई। अब उस तितली का जो बच्चा होगावह अगलेवर्ष ग्रीष्म की एक तपती दोपहरी के बाद निद्रा की गोद में सोई हुई गर्भवतीसुकुमारी युवती राजरानी की श्वेत सुकोमल ग्रीवा पर रेंग कर उनको यकायकइतनी जोर से जगा देगा कि उनका हृदय धक से रह जाएगा और अजातशिशु गर्भ में ही मर जाएगा।

इस प्रकार राज्य का शासक उचित उत्तराधिकारीन होकर राजा का भाई होगा। और उचित उत्तराधिकारी की हत्या के कारणतुम्हीं हो। राजा का भाई क्रूर निर्दयी अन्यायी और अत्याचारी है। उसकेशासन से निराश होकर प्रजा पागल हो जाएगी और तब अपनी जान बचानेके लिए वह राजा समस्त देश में एक भयानक युद्ध खड़ा करवा देगा जिससेतेरी प्यारी मातृभूमि का सर्वनाश हो जाएगा!

और इस सबका दोष तेरे सिवायऔर किसी के सिर न मढ़ा जाएगा और इस सबका कारण है तेरी सांससे उस तितली का पूर्व की ओर राजमहल के उपवन में उड़ जाना!”

युवक ने अपने कंधे उचकाए “हे अद्दृष्ट प्रेत! मैं यह कैसे मना करसकता हूं कि जो कुछ भविष्यवाणी तुमने की है वह सब नहीं होगी क्योंकिइस पृथ्वी पर एक चीज़ से ही दूसरी चीज़ उत्पन्न होती है और अक्सरही अत्यंत भयानक घटनाएं अत्यंत तुच्छ घटनाओं के कारण हो जाती हैंऔर इसी तरह अत्यंत तुच्छ घटनाएं भी अत्यंत विकराल घटनाओं के कारणहो जाती हैं?

और फिर मैं इसी भविष्यवाणी में क्‍यों विश्वास करूं जबकि मेरी मृत्यु के विषय में तुमने कहा था कि वह तुम्हारे चोटी पर पहुंचतेही हो जाएगी सो अभी तक नहीं हुई है!”

“जो चढ़ता है उसे लौटकर भी जाना ही होगा; अगर वह फिर अपनेमानव भाई बंधुओं के साथ रहना चाहता है” वह भयावह आवाज गूंजउठी “क्या तुमने कभी यह भी सोचा था।”

युवक यकायक रुका और उसने सोचा कि वह सुरक्षित रास्ते से नीचेउतर जाएगा किंतु रात का अभेद्य अंधकार उसे अपने अंदर पहले ही बंदीकर चुका था ओर जब तक प्रभात न हो उसका छुटकारा असंभव था।इतने खतरनाक रास्ते को तय करने के लिए दिन का उजाला अनिवार्य रूप

से अपेक्षित था ही। वह दिन कल सवेरे आएगा ही और तब पूरे साहसके साथ वह अपनी राह चल देगा-यह सोचकर वह वहीं चट्टान पर लेटकरविश्वांतिदायक नींद को बुलाने की चेष्टा करने लगा।

वहां अविचल वह लेट रहा। मन में तरह-त्तरह की भावनाएं उठ उठकर उसे सोने नहीं दे रही थीं! आखिर उसने अपनी मुंदी हुई आंखों केआरी पलकों को खोला पर अपने चारों ओर देखते ही डर के मारे उसकादिल और रोम-रोम सिहर उठे! एक काला कगार उसे दीख पड़ रहा थाकेवल जिसके ऊपर ही होकर नीचे पृथ्वी पर जीवित लौटने के लिए एकराह थी। अभी तक अपने पथ की पूर्ण जानकारी का विश्वास उसे थापर अब संदेह उसके मन में उपजा और बढ़ता ही चला गया यहां तककि फिर वह इतनी भीषण परेशानी में परिवर्तित हो गया कि युवक उसेसह सकने में सर्वथा असमर्थ हो गया। इसलिये अनिश्चितता की दुविधामें पड़े रह कर सवेरे की प्रतीक्षा में परेशान रहने की अपेक्षा उसने तत्कालही अपनी राह पकड़ने का संकल्प किया क्योंकि लौटना तो उसे था ही।

दिवस के वरदान स्वरूप प्रकाश के बिना ही उस अज्ञेय मार्ग पर जानेके लिए वह कमर कसकर खड़ा हो गया पर उसने एक पग ही आगे बढ़ायाथा कि उसे ऐसा प्रतीत हुआ मानो अटल न्याय उसकी भर्त्सना कर रहाहै और उसके भाग्य का निपटारा बस अब होने ही वाला है।

क्षुब्ध और क्रोधित वह शून्य में ही चीत्कार कर उठा-“हे अदृष्ट प्रेत!तू कौन है? मेरे प्राण लेने से पहले मुझे बतला तो सही। तेरी आज्ञाओंकी अभी तक मैं अवहेलना करता रहा हूं पर अब तेरे सामने मैं अपनीहार स्वीकार करता हूं-सर झुकाता हू-पर मुझे बतला कि आखिर तू हैकौन?”

एकदम समीप से-एकदम सुदूर से फिर एक ध्वनि गूंज उठी।

“आज तक किसी भी जीवन ने मुझको नहीं जाना है। मेरी अनेकसंज्ञाएं हैं! धर्ममीरु मुझे “नियति” के नाम से पुकारते हैं मूर्ख मुझे “भाग्य!कहते हैं और पवित्रात्मा मुझे परमात्मा के रूप में पहचानते हैं। जो अपनेको बुद्धिमान समझते हैं उनके लिए मैं वह शाश्वत शक्ति हूं जो आदिकालसे उपस्थित है और अंतकाल तक रहेगी?”

तब मैं अपने जीवन की इन अंतिम घड़ियों में तुझें आप देता हूँ मौत की कटुता से भरे हुए युवक के हृदय ने चीत्कार की “यदि वास्तवमें तू वही शक्ति है जो सृष्टि के आदि काल में थी और अ मृत ही अंतकालतक रहेगी तब तो जो कुछ हुआ है वह पहले ही नियत था-कि मैं जंगलमें होकर जाऊं और अनजाने ही एक हत्या कर डालूं कि मैं मैदान कोपार करने से ही अपनी मातृभूमि के सर्वनगाश का कारण बन जाऊं औरकि मैं इस पर्वत के शिखर पर आकर मृत्यु को गले लगाऊं-यह सबहुआ तेरी चेतावनी दे देने पर भी!

पर यदि तेरी चेतावनी मेरी कोई भीसहायता करनेवाली थी तब वह मुझे व्यर्थ ही परेशान करने के लिए सुनाईक्यों गई? और क्‍यों-हे व्यंगों के भी क्रूर व्यंग मैं अपने इस अंतिम समयमें भी तुझ से वह प्रश्न पूछ रहा हूं?”

एक कठोर और भयानक भेद भरे अट्टहास से गूंजता हुआ उत्तरमहाशून्य की अज्ञात अपरिचित सीमाओं से टकरा कर प्रतिध्वनित हो उठा!

जैसे ही युवक उस प्रतिध्वनि को सुनने और समझने के लिए प्रस्तुत हुआजमीन हिली और उसके पैरों तले से खिसक गई!

वह गिरा और काल केकराल वातायन में से उच्चकती हुई अनादि अनंत रात्रियों के अमिट अंधकारमें होता हुआ असंख्य अतल गर्तों से भी कहीं नीचे गिरता चला गया…

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