मुँहमाँगा इनाम

राजा के दरबार में मगध का एक पंडित शास्त्रार्थ के लिए पहुँचा। उसने भरे दरबार में चुनौती दी।

राजा ने राज की प्रतिष्ठा के रक्षार्थ विहंगम दृष्टि डालते हुए घोषणा की ‘शास्त्रार्थ में अपने राज का जो व्यक्ति विजयी होगा उसे मुँहमाँगा इनाम दिया जाएगा। फिर भीकिसी ने उत्साह नहीं दिखाया। राजा ने गोनू झा की ओर आशा-भरी दृष्टि से देखा। गोनू झा ने राजा की मनःस्थिति भाँपते हुए कहा ‘महाराज मैं इनकी चुनौती सहर्षस्वीकार करता हूँ।

राजा की छाती प्रसन्नता से सूप-सदृश चौड़ी हो गई। उसने राहत की साँसें लेते हुए दूसरे ही दिन शास्त्रार्थ के लिए समय निर्धारित कर दिया।

शास्त्रार्थ के स्थान पर अन्य लोगों का आगमन हो चुका था किंतु गोनू झा का कहीं अता-पता नहीं।

किसी कारण वश उन्हें आने में देर हो गई। द्वार बंद होते देख अत्यंत घबरा गए। द्वारपाल से अनुरोध किया किंतु वह ईर्ष्या और लोभवश आनाकानी करने लगा। अंततः उन्होंने प्रलोभन देते हुए कहा ‘भाई आज का पुरस्कार तुम्हें ही दे दूँगा।

उसने शर्त नहीं भूलने का स्मरण कराते हुए द्वार खोल दिया। गोनू झा ने उस पंडित को शास्त्रार्थ में पानी पिला दिया। राजा ने प्रसन्न होकर तुरंत एक सहस्र स्वर्ण मुद्राप्रदान करने का आदेश दिया; किंतु उन्हें खुश न होते देख पुरस्कार की राशी दूनी कर दी। फिर भी गोनू झा उदास ही रहे। अंत में राजा ने विस्मय से पूछा ‘गोनू झाआप चाहते क्या हैं?

उन्होंने दुःखी होने का स्वाँग भरते हुए कहा ‘महाराज मुँहमाँगा इनाम देने की घोषणा हुई थी?

राजा ने याद करते हुए कहा हाँ-हाँ हुई थी; बोलिए आप क्या चाहते हैं? गोनू झा ने सहजता से कहा ‘महाराज आज मुझे पुरस्कार में बीस कोड़े दिए जाऍं।’

सभासद चौंके किंतु गोनू झा अपनी बात पर अडिग रहे। अंततः कोड़े लगानेवाला आया। गोनू झा ने सहज भाव से कहा ‘महाराज शर्त के अनुसार आज के पुरस्कारका हकदार द्वारपाल है; विश्वास न हो तो उससे पूछ लिया जाए।’

उससे पूछा गया। उसने हामी भर दी। राजा ने चकित होते हुए पूछा गोनू झा यह कौन-सी पहेली है?

गोनू झा ने खुलासा करते हुए कहा ‘महाराज मुझे यहाँ कुछ पहले पहुँच जाना चाहिए था किंतु खेद है कि पहुँचते-पहुँचते दरबाजा बंद होने की घड़ी आ गई। तदर्थ मैं क्षमाप्रार्थी हूँ लेकिन द्वारपाल ने मेरे मना करने के बावजूद आनन-फानन में द्वार बंद कर दिया। फिर शर्त रखी कि आज का पुरस्कार उसे ही देना पड़ेगा।

तभी महाराज ने टोकते हुए कहा और आज का पुरस्कार बीस कोड़े हुए।

फिर क्या था! गिनकर कोड़े पड़े। उसके बाद फिर द्वारपाल की नानी न मरे कि गोनू झा के मार्ग में रोड़ा अटकाने की कोशीश करे।

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