भाँग का नशा

रात में गोनू झा कहीं से घूम-फिरकर आए और अपने आँगन में चक्कर लगाने के बाद पर्नी से बोले ‘आज बड़ी गर्मी है; खटिया आँगन में ही लगा दीजिए। हाट पर टेकटार गाँववाले मिसर मिल गए; वहीं उन्होंने बहुत भाँग पिला दी है।’

पत्नी ने बीच अँगने में खटिया डाल दी। अँगने के एक कोने में तुलसी की झाड़ी थी गोनू झा ने वहाँ खटिया लगाने को कहा।

ओझाइन ने चौंकते हुए कहा ‘जंगल झाड़ के पास क्यों सोइएगा ? कीड़े-मकोड़ों का डर रहता है।’

गोनू झा ने सहज भाव से कहा ‘कीड़े-मकोड़ों से कितना डरिएगा ? कीड़ॆ-मकोड़ो से कितना डरिएगा? कीड़े-मकोड़ो से कितना डरिएगा ? कीड़े-मकोड़े अभी तकगोनू झा को नही पहचान सके हैं तो उन्हे सबक सिखाना जरुरी है ।’

और खटिया खींचकर वहीं ले गए जहाँ तुलसी की झाड़ी थी ।

पत्नी ने सहजता से कहा ‘खैर जब आप अपनी मति मे ही नहिं हैं तब बहस क्या करना ?

गोनू झा ने खटिया पर बैठकर प्रेमपुर्वक खैनी लगाई । उसे निचले होठ मे दबाया और फिर अंँगने की उसी तुलसी की झाड़ी मे थूकने लगे ।

तुलसी कहीं भी हो पवित्र ही रहती है उस तुलसी वन पर पति को थुकते देख पत्नी भला-बुरा कहने लगी और नशा उतारने के लिए दही नीबू आदि का शरबत पिलाकर उपचार किया। किंतु उनका नशा उतर ही नहीं रहा था।

पत्नी ने हाथ जोड़ते हुए बहुत मनाया किंतु गोनू झा अपनी करनी से बाज ही नहीं आ रहे थे। अंततः ओझाइन ‘हाय दैवा’ कह जोर-जोर से विलाप करने लगीं किइनकी मति मारी गई है।

रोने कलपने की आवाज सुनकर आसपास के लोग जुटने लगे। पड़ोसियों ने गोनू झा को भाँति-भाँति से समझाना शुरू किया किंतु उन पर कोई असर नहीं। अंत में पुरोहित ने विस्मय से कहा ‘तुलसी में लक्ष्मी बसती हैं; इन्हें प्रायश्चित स्वरूप ब्रह्मभोज कराना होगा।

गोनू झा के माथे पर लोटा पर लोटा ठंडा पानी पड़ने लगा और वह नहाते रहे। तब तक कई लोग और जुट गए। जब गोनू झा ने अपने आसपास देखा तो सॅंभलते हुएकहा ‘ठीक है जब आप लोगों ने स्नान करा ही दिया तब मैं भी प्रायश्चित कर ही लूँ।

यह कहते हुए गोनू झा ने बाल्टी भर पानी झाड़ी में एक ही जगह उलीच दिया। बेचैनी से एक आदमी फुरफुराकर उठा। जब तक वह सॅंभलता तब तक गोनू झा ने उसकॆ बाल कसकर पकड़े और उसे बाहर खींच लिया। अन्य चोर भी पकड़े गए। खूब धुनाई हुई।

चोरों के नेता को पहचानकर सब स्तब्ध रह गए। वह तो अयोध्या चोर था किंतु गोनू झा के चतुराई के आगे मात खा गया। चोरों ने माफी माँगते हुए कहा ‘पंडितजीगलती हो गई। इस बार माफ कर दीजिए।

सरदार ने कहा ‘पंडितजी अब मैं भी आपको पहचान गया; आइंदा इस गाव में हम कभी पाँव न रखेंगे।

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