मेरे बेटे का नाम चोर

गोनू झा की आर्थिक स्थिति अच्छी हो गई थी। पंडिताइन भी बहुत दिनों से मायके नहीं गई थीं तो इस बार खूब सज-धजकर आठ दिन रहकर आई। गोनू झा केपास धन की कोई कमी नहीं रह गई। ठगों के घर से ढेर सारा धन मिला था तो रोज मिठाइयां खाते और खास मित्रों को खिलाते।

और उनकी सम्पन्नता पर कुछ चोरों की नजर गड़ गई। चोरों ने योजना बनाई कि आधी रात के बाद गोनू झा के घर में कूदकर उनके मुंह पर लखलखा (प्राचीन क्लोरोफार्म) रखकर बेहोश कर देगें और आराम से सारा माल समेटकर चल पड़ॆगें। गिनती में चोर चार थे और अपने फन के शातिर थे। कभी गांव में चोरी की नहीं थीतो कभी पकड़ में आए नहीं थे। पहली बार ज्यादा माल के लालच ने पकड़ लिया। मंगल मांझी नाम का चोर उनका सरदार था।

‘गुरु हमने पहले कभी गांव में चोरी नहीं की। गांव वाले हमें सज्जन कहते हैं और मजदूरी करके खाने कमाने वाले समझते हैं।’ एक चोर ने कहा।

“अरे तो क्या हुआ? हम तो जानते हैं कि हम कितने सज्जन हैं।’

‘भाई हम गांव में चोरी करने की गलती कर रहे हैं। गुरु लोग कहते हैं कि ऎसे काम गांव से बाहर करो। गांव में सज्जन ही बने रहो।’

‘तो तू अपने घर जा।’

भैये मेरी बात समझो। गोनू झा बड़ा चतुर खलीफा है। जंगल के ठगों को भगाकर ही उनका पिंड छोड़ा।’

‘अरे हम भी कुछ कम नहीं हैं। हमारे पास लखलखा है जिसने आज तक हमें सफलता दिलाई है। तुझे चलना है तो ठीक। गाल मत बजा।’

‘चलूंगा तो मैं जरूर। कितने दिनों से तुम लोगों के साथ हूं। तुम्हारे ही साथ रहकर परिवार पाल रहा हूं। अब जरा से खतरे पर पीछे थोड़े ही हट जाऊंगा। जो सबके साथहोगा वह मेरे साथ होगा।’

“अरे कुछ भी नहीं होगा। हीरन बता रहा था कि गोनू झा ने उन ठगों के घर में झाडू फेर दिया था। बीस साल से वे ठग उस घर में थे। अब सोच बीस साल में कम मालसमेटा होगा उन्होंने। सारा गोनू झा झटके लाया। और अगर हम उसे झटक लें तो दलिद्दर दूर हो जाएं।”

“अगर बिना किसी बखेड़े के झटक लाएं तो।”

‘तू हमारे साथ मत जा भाई। तुझे गोनू झा प्रेत दिखता है।’ मंगल ने गुस्से से कहा-‘हमें तो लाभ ही है। पांच की जगह चार हिस्से होंगे। अब तू घर जा। किसी से कोईजिक्र मत करना।”

“अरे यार गुस्सा क्यों होता है। चल रहा हूं न!”

“तो आराम से चल।”

पांचों चल पड़े। मंगल को अपनी जेब में रखी लखलखा की डिबिया पर बड़ा अभीमान था। आज तक उसी के भरोसे उसने सफलता पाई थी।

सारा गांव सोया पड़ा था। पांचों दबे पांव गोनू झा के घर के पिछवाड़ॆ पहुंच गए और एक जने की पीठ पर चढकर दूसरा छत पर चढ गया। फिर उसने रस्सी डाल दी। सब के सब छत पर जा चढे।

पर यह क्या! गोनू झा तो शायद जाग रहे थे।

‘पंडिताइन सो गई क्या?’ गोनू झा की आवाज आई।

“नींद तो आ ही रही है। सफर में थकान हो गई थी।” पंडिताइन की नींद भरी आवाज आई।

‘आठ दिन में मैके से आई हो। दो-चार बातें भी न करोगी।’

‘अब तक बातें ही तो कर रहे हैं। अब सो भी जाइए।’

“पर मैनें वह ज्योतिषी वाली बात तो तुम्हें बताई ही नहीं।’

‘कौन सी बात?’

‘मुझे एक प्रकांड ज्योतिषी मिला था। उसने मेरे हाथ की रेखाएं देखी और बताया कि हमारे पांच पुत्र होंगे।’

‘सच!’ अब पंडिताइन भी जाग गई।

‘और क्या झूठ! देख लेना उस ज्योतिषी की बात सच निकलेगी। उसी ने तो मुझे एक माह पहले बताया था कि मुझे कहीं से कोई धन मिलने वाला है। और यह बातसच ही हुई।’

‘फिर तो यह भी सच ही होगा जी।’

“हां। गोनू झा के पांच बेटे होंगे। पांच बेटॆ का मतलब पांच लाठियां। फिर गांव में कौन मुझसे टक्कर ले सकेगा।”

‘अरे अभी तो बेटे पैदा भी नहीं हुए। घमंड अभी से करने लगे।’

‘घमंड कैसा? जो निश्चित है उस पर तो घमंड किया ही जा सकता है।’

‘पर जी पैदा होते ही तो आपके बेटे लाठी लेकर न निकल पड़ेगे।’

मंगल मांझी और उसके साथी चुपचाप अगल-बगल छत पर लेटे उनकी बातें सुन रहे थे।

‘गुरु!’ मंगल का साथी कान में फुसफुसाया-“यह तो सोया ही नहीं।”

“अरे पतुरिया आठ दिन बाद घर आई है। तू सो जाता ऎसॆ में। थक हार कर सो ही जाएगा।”मंगल हंसकर फुसफुसाया।

‘क्या पता सारी रात ही जागता रहे।’

मंगल ने उसका कान उमेठा।

“धीरे गुरु चीख पडूंगा।”

‘तो मूरख सारी रात तो दूल्हे भी नहीं जागते। यह कुछ ही देर की बात है। अभी आधी रात है।’

‘तब तक हम भी सो लेते।’

“तो तू सो। हम तुझे जगा लेगें।”

उधर गोनू झा का वार्तालाप अभी जारी था।

‘पंडिताइन ये तो सोचो कि पांचों बेटों के नाम क्या रखेंगे।’ गोनू झा बोले।

‘यह काम तो आप ही करें। मिश्रा जी से कराएं।’

‘अरे मैं खुद कर लूंगा। एक का नाम फीरन झा दूसरे का नाम पलटन झा तीसरे का नाम किशोर झा चौथे का नाम मोर झा पांचवें का नाम चोर झा।’

“चोर झा। यह भी कोई नाम हुआ। भला कोई ऎसे नाम रखता है।”

“मूर्ख! नाम लेने में सरलता है। और सबका नाम एक-दूसरे की तुक लगाता हो तो अच्छा लगता है।”

“आप भी बस! अब मुझे तो सोने दें। अब आपकी बात सुनने की हिम्मत नहीं हो रही। आंखे बंद हुई जा रही हैं।”

“तुम क्यों सुनोगी। पर मेरे बेटे तो सुनेंगे। खेत पर से आवाज दिया करूंगा तो दौड़ॆ चले आएंगे।”

‘अब सो भी जाइए।’

“देखो कैसे आवाज दूंगा। अरे ओ फीरन।” गोनू झा जोर से चीखे-“अरे ओ पलटन अरे ओ किशोर अरे ओ मोर आ रे चोर!

उनकी आवाज इतनी बुलंद थी कि सारा गांव जाग गया। लोग लाठी ले-लेकर दौड़ॆ आए। तब तक गोनू झा द्वार पर आ गए।

‘क्या हुआ गोनू झा।’ पलटन मिश्रा जी ने पुछा।

‘मेरी छत पर चोर!’ गोनू झा पीछे की तरफ दौड़ पड़ॆ।

मंगल-मंडली के होश उड़ गए। कूदकर भागने के अलावा कोई चारा न था। पर देर हो चुकी थी। चारों तरफ से घिर गए थे और इतनी मार खाई कि नानी याद आ गई।

हीरन झा पलटन मिश्र किशोर मांझी और मोर झा तो सब उनके पड़ोसी थे जो उनकी पुकार सुनते ही दौड़ॆ चले आए थे। चोर मंडली पकरकर बांध ली गई और सवेरेहवालात भेज दी गई।

पंडिताइन को अब जाकर पता चला कि क्यों गोनू झा रात को बच्चा-पुराण पढ रहे थे। उन्हें चोरों की भनक लग गई थी।

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