गोनू झा और पड़ोसी का बछड़ा

गोनू झा का एक पड़ोसी था। उसका नाम गोनउरा था। गोनउरा एक सीधा-सादा युवक था। वह बहुत गरीब था जो मजदूरी करके अपना पेट पालता था। उसकेमाता-पिता का देहांत हो चुका था। कुछ दिनों बाद गोनउरा का विवाह हो गया। उसकी पत्नी सोनावती एक सुंदर और सुशील स्त्री थी। गरीब गोनउरा अपनी सुंदर पत्नीको सभी सुख-सुविधाएं देना चाहता था। पर घोर निर्धनता उसे कुछ नहीं करने देती थी। वह इसी सोच में दुबला होता जाता था।

“आप हर समय किस सोच में डूबे रहते हैं।” एक दिन सोनावती ने पूछा।

“सोना!” गोनउरा ने उदासी से कहा-मैं हमेशा तुम्हारे बारे में सोचता हूं। मैं तुम्हें कोई सुख नहीं दे पा रहा। मैं तुम्हारी सुंदरता को गहनों से वस्त्रों से नहीं सजा पा रहा। तुम्हारा सौंदर्य जिन आभूषण और प्रसाधनों का अधिकारी है वह मैं तुम्हें नहीं दे पा रहा।”

“नाथ यह आप क्या सोच रहे है ।” सोनावती ने प्रेम से कहा – “स्त्री का आभूषण तो उसकी मांग का सिन्दूर होता है । उसका सुख तो उसके स्वामी के होंठों के हंसीमे होता है । आप अकारण स्वयं को दुखी करके मुझे भी दुखी कर रहे हैं । मैं आपके साथ बहुत प्रशन्न हूं और संसार के सब सुख मुझे आपके प्रेम के रूप मे प्राप्त हैं।”

गोनोउरा अपनी पत्नी की बातो से जरा संतुष्ट तो हुआ पर उसके अन्दर यह कसक अभी भी थी पर वह क्या कर सकता था । खाने-पीने का गुजारा ही मुश्किलसे हो पाता था । अंदर ही अंदर कुढता गोनउरा अपने जीवन की गाड़ी खींच रहा था। दिन भर मजदूरी करता और शाम को थाका-हारा आता। सोनावती को देखता तोमुरझा जाता और जाने क्या-क्या सोचने लगता।

एक बार करवाचौथ का त्योहार आने वाला था। गोनउरा अपने साथिंयो के साथ एक महाजन के खेत में मगदूरी कर रहा था। दोपहर को सब पेड़ के नीचे बैठे थे।

“यार ये करवाचौथ भी ना भाई जेब ढीली करने आता है।” गणेश ने कहा-“मेरी बीवी इस बार जरी की साड़ी मांग रही है।”

“बीवी तो मेरी भी साड़ी मांग रही है।” मोहन बोला -मैंने तो चार महीने से पैसे इकट्ठे करके रखे हैं। अब साड़ी लेने जाऊंगा ।”

भैई बीबी को साल मे इस दिन ही साड़ी मिलती है । साधुराम ने कहा ।

गोनउरा चुपचाप वहाँ से खड़ा हो गया और फावड़े से जा लगा । उसके दिमाग मे अभी भी सोनावती की तस्वीर घूम रही थी । इस करबाचौथ पर सबकी बीवियाँनई साड़ी पहनेगी । गणेश की काली-कलूटी बीवी जब नई साड़ी पहन कर निकलेगी तो उसकी हूर-सी बीवी फटी-पुरानी साड़ी मे कैसा महसूस करेगी ।गोनउरा की आँखो मे आँसू आ गए ।

अचानक गोनउरा को एक उपाय सूझ गया । उसके पास एक सुन्दर सा तन्दरुस्त बछड़ा था । अगर उसे पैंठ मे बेच दे तो निश्चय ही एक अच्छी साड़ी की कीमत मे बिक जाएगा । फिर वह भी अपनी सुन्दर पत्नी को करवाचौथ पर नई साड़ी मे देख सकेगा । यह विचार आते ही उसने उसी दिन महाजन से अगले दिन की छुट्टी ले ली।

अगले दिन सुबह सवेरे वह बछड़े को लेकर चल पड़ा ।

“कहाँ जा रहे ?” सोनावती ने पूछा ।

“इस बछड़े को बेचने जा रहा हूँ ।”

“क्यों ? ऎसी क्या जरुरत आ पड़ी ?” वह चौंकी ।

“है कोई जरुरत । आकर बताता हूँ ।”

सोनावती ने ज्यादा कुछ न पूछा । वह रात से ही देख रही थी कि उसका पति किसी उलझन में है। गोनउरा चाहता था कि वह साड़ी लाकर पत्नी को देगा तो वह कितनी खुश होगी । उसका वही खुशी भरा चेहरा तो वह देखना चाहता था । वह चल पड़ा ।

रास्ते में उसे एक बकरी चराने वाला मिला जो अपनी तीन-चार बकरियों को चरा रहा था । उस गडरिए ने गोनउरा को देखा ।

“अरे भई इस बकरे को कहां ले जा रहे हो?” गडरिया बोला ।

“तुम्हारी आंखों में कोई खराबी लगती है।” गोनउरा ने गोनउरा ने हंसकर कहा-“इतना सुंदर और तंदुरुस्त बछड़ा तुम्हें बकरा नजर आ रहा है ।”

“खराबी मेरी आंखों में नहीं तुम्हारे दिमाग में लगती है । साफ दिख रहा है कि यह बकरा है । तुम कहीं भांग तो नहीं पी आए ।”

गोनउरा उलझन में पड़ गया । उसने बछड़े को देखा ।

“लगता है तुम्हें मेरी बात झूठ लग रही है ।” गड़रिया बोला-“अच्छा ऎसा करते हैं कि किसी और से पूछ लेते हैं । फिर तो तुम्हें तसल्ली हो जाएगी ।”

“हं… हां ।” गोनउरा धीरे से बोला । उसे खुद शंका हो रही थी ।

गड़रिया और गोनउरा बछड़े को लेकर आगे चल दिए । कुछ दूर चलने पर उन्हें एक बूढा आदमी हुक्का गुड़गुड़ाता मिला।

“अरे भई इस बकरे को कहां ले जा रहे हो।” बूढा बोला।

अब गोनउरा को कोई शक न रहा कि उसका बछड़ा किसी भूत-प्रेत के साए में आ गया था और बकरा बन गया था।

“इस बकरे को बेचते हो?” गड़रिए ने पूछा-“मेरे पास चार बकरियां हैं । एक बकरा भी होना चाहिए न। तुम दे जाओ। अब यह तो तुम जान ही चुके हो कि यह बछड़ा नहीं बकरा है। यह बूढा आदमी झूठ थोड़े ही बोलेगा।”

“ठीक कह रहे हो।” गोनउरा उदास हो गया।

“तो बेचोगे?”

“बेच दूंगा। बेचने ही ले जा रहा था।”

ठीक है। क्या मांगते हो?”

“साठ रुपया दे दो।”

“ठीक है। क्यों बाबा क्या कहते हो?”

साठ रुपया। हां भई ठीक ही मांग रहा है। पर शून्य का तो कोई अर्थ ही नहीं होता। साठ में से शून्य तो निकालनी पड़ेगी।” बूढा बोला।

“फिर तो बचा छह रुपया। यह लो भई।”

“यह….यह क्या?” गोनउरा हक्का-बक्का रह गया।

“अब रख भी लो भई।” बूढा बोला-“सौदा तो हो ही गया है। अब बात से पीछे हटना तो मर्द का काम नहीं।”

गोनउरा छह रुपए लेकर दुखी मन से चल पड़ा घर की ओर। वह क्या जानता था कि उसे दो ठगों ने बड़ी चतुराई से ठग लिया था।

वह बुरी तरह टूट गया था। बस जोर से रोने का दिल कर रहा था। घर पहुंचा और पस्त होकर बैठ गया।

“क्या…क्या हुआ? इतना थके-थके क्यों हो?” सोनावती घबरा गई। और गोनउरा के धैर्य का बांध टूट गया। वह बच्चों की तरह बिलख-बिलखकर रो परा। सोनावतीने उसे बच्चे की तरह भुजाओं में भर लिया।

“क्या हुआ? तुम कुछ बताते क्यों नहीं?” वह घबराकर पूछने लगी।

तब गोनउरा ने सारी बात बता दी। सोनावती अपने पति के प्रेम पर बलिहारी हो गई और भोलेपन पर मुस्कराई। उसके पति को ठगों ने ठग लिया था। अब उसे गोनू झासे ही मदद मांगनी चाहिए।

आप फिक्र क्यों करते हैं।’सोनावती बोली-“आपको सीधा और भोला जानकर उन ठगों ने आपको ठग लिया है। पर उन्हें यह नहीं पता कि दुनिया में उनसे भी शातिरलोग हैं। आप गोनू झा के पास चलें। वही हमें बताएंगे कि अब हमें क्या करना चाहिए।”

गोनउरा की आंखो में उम्मीद की किरण चमकी। फिर दोनों जने गोनू झा के पास पहुंचे और अपनी व्यथा सुनाई।

हूं। इस दुनिया में ऎसे लोग बहुत हैं जो दूसरों को मूर्ख बनाने की कला जानते हैं और भोले-भाले लोगों को हानि पहुंचाते हैं। तुम चिंता मत करो गोनउरा। कल मेरे साथचलना।” गोनू झा ने कहा।

अगले दिन सवेरे ही दोनों चल परे। गोनउरा ने रास्ते में वह जगह दिखाई जहां गड़रिया बकरी चरा रहा था। फिर वह जगह भी वहां बूढा पंच मिला था। आज वहां कोईनहीं था।

“यहां तो कोई नहीं है।” गोनउरा उदास हो गया।

“यहां कौन होता। यहां उनका घर थोड़े हि है। आओ हम मेले में चलते हैं। वहां शायद दोनों ठग मिल जाएं।’

दोनों मेले में पहुंचे। सैकड़ोॱ पशु मेले में थे। लोग मोल-भाव कर रहे थे। पशुओं को जांच परख रहे थे। वे दोनों भी घूमने लगे।

“पंडित जी वह रहा मेरा बछरा।’ एकाएक गोनउरा उत्साह से बोला-“और वे दोनों भी वहीं हैं।”

“अच्छा! तुम यहीं ठहरो। जब मैं इशारा करूं तो आ जाना। ”

गोनू झा उन ठगों के पास पहुंचे और बछड़े को इधर-उधर से देखने लगे। दोनों ठगों ने उन्हें ग्राहक जाना।

“बड़ा प्यारा खरगोश है भाई। कहां से पकड़ लाए?” गोनू झा बोले।

“खरगोश!” बुड्ढा भड़क गया-“इतना लम्बा चौड़ा बछड़ा तुम्हें खरगोश दिखाई देता है। मति मारी गई है तुम्हारी या भांग-धतूरा खा गए।”

“बछड़ा। यह बछड़ा है? लगता तो नहीं।”

“अरे पागल आदमी आगे बढ।”

“क्यों भई! इस खरगोश को बेच नहीं रहे?”

“अरे देखो तो सही। कैसा अजीब आदमी है। चल भाग।” बूढा चीखा।

बूढे की चीख सुनकर आसपास कई लोग जमा हो गए।

“क्या बात है भई?”

“भाई मैं इस बछड़े को खरीदना चाहता हूं पर यह बाबा गुस्सा कर रहे हैं। अरे जब बेचना ही नहीं था तो बाजार में क्यों लाए।” गोनू झा बोले।

“यह हमारे बछड़े को खरगोश बता रहा था।” युवा ठग बोला।

“भई वाह तुम भी कमाल करते हो। तुम इसे बकरा बता सकते हो और मैं खरगोश भी नहीं कह सकता। कीमत बोलो इसकी।”

“हां हां बोलो।” कई और लोगों ने कहा।

ठगों को खतरे की गंध आने लगी थी।

“दो सौ रुपया है इसकी कीमत।’ बूढा जल्दी से बोला।

“अच्छी बात है। अब गणित में शून्य का तो कोई अर्थ होता ही नहीं। ऎसा तुम्हीं ने कहा था। तो दो सौ में से दोनों शून्य निकालो। बचा दो रुपया। लो और बछड़ा मेरेहवाले करो।” गोनू झा ने दो रुपए निकाले।

“अरे यह क्या कह रहा है लोगों। ये हमें ठगना चाहता है।”

“और तुम जो किसी को ठगकर लाए हो। आओ गोनउरा। आकर सबको बताओ कि इन दोनों ने तुम्हारे साथ क्या किया था।’

गोनउरा दौड़कर आया। दोनों ठग घबरा गए। अब उनकी पोल खुलने वाली थी। दोनों भागने को हुए तो भीड़ ने पकड़ लिया।

“बताओ क्या बात है?” एक पहलवान ने पूछा।

दोनों ठगों ने अपना अपराध कबूल कर लिया। फिर तो भीड़ ने दोनों में इतनी मार लगाई कि उन्हें नानी याद आ गई। कोई वहां सैनिकों को बुला लाया। सैनिकों को सारी बात बताई गई तो उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

गोनउरा को उसका बछड़ा मिल गया जिसे उसी समय गोनू झा ने एक व्यापारी को दो सौ रुपए में बेच दिया। गोनउरा की आंखें छलक उठीं। उसने कृतज्ञता से गोनू झाके चरण पकड़ लिए।

फिर वे दोनों गांव की तरफ वापस चल पड़े। गोनउरा बहुत खुश था। अब वह अपनी पत्नी के लिए अच्छी-सी साड़ी भी खरीद सकता था और अन्य सौंदर्य प्रसाधन भी।सोनावती ने जब जाना कि गोनू झा की कृपा से उसका बछड़ा मिल भी गया और अच्छे दामों में बिक भी गया तो वह बहुत खुश हुई।

वह गोनू झा की प्रशंसा सारे गांव में करती फिर रही थी।

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