अँधा अफसर

खोजा का एक दोस्त था।

बचपन में दोनों में दांत काटी दोस्ती थी। बाद में वह दोस्त राजधानी में एक बड़ा अफसर बन गया।

यह जानकार खोजा बहुत खुश हुआ था।

जब खोजा बादशाह के कहने पर राजधानी में आकर रहने लगा तब उसने एक बार अपने उस दोस्त से मिलने का मन बना लिया।

जब से खोजा का दोस्त अफसर बना था तब से खोजा की न तो कभी उससे मुलाकात ही हुई थी और न ही शायद उसे यह खबर था कि उसके बचपन का दोस्त वह गरीब घर का लड़का ही आज का मशहूर खोजा नसरुद्दीन कहलाता है।

खैर एक दिन खोजा अपने जाने-पहचाने लिबास में अपने दोस्त अफसर के घर जा पहुंचा।

अफसर के दरबान के पूछने पर खोजा ने बताया कि मेरा नाम नसीर है। मैं अफसर के गाँव का रहने वाला हूँ।

दरबान ने खोजा को सिर से पाँव तक गैर से देखा।

उसे पहली नजर में तो यही मालूम हुआ कि हो न हो जो उसके सामने खड़ा है वह खोजा नसरुद्दीन है पर खोजा ने अपना जो परिचय दिया उसके बाद यही मानना पड़ा कि नहीं यह तो कोई और नसीर है जो अपने-आपको खामखां उसके अफसर मालिक का बचपन का दोस्त बता रहा है।

दरबार ने खोजा को दरवाजे के बाहर रोका और खुद भीतर अफसर को उसके आने की खबर देने चला गया। दरबान से सुचना पाते ही अफसर खुद बाहर आया।

उसकी नजर एक अजीब-से आदमी पर पड़ी अफसर ने मन ही मन अपने-आपसे कहा लगता है नासिर अब भी कंगाल का कंगाल ही है।

उसके मन में यह डर भी पैदा हुआ कि एक गरीब किसान का दोस्त कहलाने से कहीं उसकी इज्जत धूल में न मिल जाए इसलिए उसने खोजा से किसी अजनबी जैसा सलूक करते हुए पूछा तुम्हारा नाम क्या है ?

मुझसे क्यों मिलना चाहते हो ?

यह सुनते ही खोजा को बड़ा गुस्सा आया। उसने तुरंत उत्तर दिया मैं नसीर उर्फ़ नसरुद्दीन हूँ।

तुम्हारे बचपन का पक्का दोस्त। मैंने सूना है तुम्हारी आँखें खराब हो चुकी हैं इसलिए तुहारी देखभाल करने आया हूँ।

कौन जानता था कि अफसर बनने के बाद तुम अंधे हो जाओगे ?

खोजा की फटकार और खरी-खरी बात सुनते ही उसका अफसर दोस्त बहुत शर्मिंद हुआ और माफ़ी मांगता हुआ उसे जबरन अपनी हवेली के भीतर ले गया।

दरबान ने जो यह हाल देखा तो उसे यह समझते देर नहीं लगी कि हो न हो यह जरूर खोजा नसरुद्दीन हो है।

भला और किसमें हिम्मत है जो अफसर को यूँ मुंह तोड़ सबक सिखाए।

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