गोनू झा और लालची ढोलकदास

बात उन दिनों की है जब गोनू झा राजदरबार में थे।

मिथिला नरेश ने उन्हें एक हफ्ते के लिए राजसी मेहमान बनाकर रोक लिया था।

गाँव में गोनू झा की पत्नी और भाई भोनू झा थे।

घुरिया और उसके साथी हवालात में बंद थे। घुरिया का एक मित्र था। उसका नाम छुट्ट्न पासी था।

वह भी चोर था। वह पड़ोस के गांव का था।

उसे अपने मित्र घुरिया के बारे में पता चला तो वह गुस्से में भर उठा। उसने ठान लिया कि अपने मित्र के शत्रु को अवश्य सबक सिखाएगा।

यही विचारकर उसने अपने तीन साथियों को अपने साथ मिला लिया।

अब पासी हर रात भरौरा जाता और गोनू झा के घर के पास जाकर अवसर ढूंढता। पर रात भर उसे गोनू झा की पत्नी की आवाज सुनाई देती रहती जो अपने देवर को लम्बी-लम्बी कहानियां सुनाती रहती थी।

पर एक दिन पासी ने आधी रात के बाद अवसर पा लिया। वह अपने साथियों सहित घर के पिछवाड़े आया और कच्चे मकान की पिछली दीवार में छेद करने लगे।

उधर पंडिताइन सोई नहीं थी। वह तो आज भी जाएगी हुई थी।

रोज की तरह आज भोनू जल्दी सो गया था तो वह कहानी किसे सुनाती। वह जानती थी कि गोनू झा के न होने से शत्रुदल अवसर समझकर घात लगा सकता था तो वह बहुत सावधान रहती थी। आज भी वह जाएगी हुई थी तो पिछवाड़े उसे कुछ हलचल सुनाई पड़ी।

वह उस कमरे में पहुंची जो घर की पिछली दीवार से जुड़ा था।

वह जान गई कि चोर पिछली दीवार में रास्ता बना रहे थे। कहते हैं कि संगति का असर होकर रहता है। गोनू झा की पत्नी भी अपने पति की संगत में रहकर चतुर और साहसी हो गई थी।

वह तो शोर मचा देती और चोर नौ दो ग्यारह हो जाते लेकिन वह अपने हाथों से उन चोरों को सबक सिखाना चाहती थी जो समझते थे कि गोनू झा की अनुपस्थिति में उसके घर में चोरी कर सकते थे।

वह आँगन में आई और मोंगरा उठाया। मोंगरा बहुत भारी था। वह उस कमरे में आई और सतर्क खड़ी हो गई।

चोरों ने सुरंग बना दिया था। एक अंदर आया तो पंडिताइन ने मोंगरे का भरपूर वार उसकी कनपटी पर किया। चोर बिना आवाज किये वहीं जमीन पर लुढ़क गया। दूसरा आया तो उसका भी यही हाल हुआ।

तीसरे और चौथे का भी यही हाल हुआ।

तब पंडिताइन ने दिया जलाया और देखा। वह अपने काम में तो सफल रही थी पर एक गड़बड़ फिर भी हो गई थी। चरों चोर मोंगरे के घातक वार से मर गए थे। एक बार तो पंडिताइन घबरा गई।

उसके हाथों से हत्याएं हो गई थी। किसी को पता चल गया तो पुलिस आती और गोनू झा की प्रतिष्ठा को धक्का पहुंचता।

पंडिताइन ने बड़ी हिम्मत दिखाते हुए चारों लाशों को एक कोने में डाल दिया और मिटटी सानकर कूमल को बंद कर दिया। यद्यपि वह सारी रात सोई नहीं।

लाशों के बारे में सोचकर वह परेशान थी कि उनसे कैसे पीछा छूटे। सारा दिन गुजर गया और शाम को गोनू झा आ गए। पंडिताइन ने उन्हें सारी बात बताई तो वह चकित रह गए।

तुमने……… तुमने चोर को मार डाला।

मर तो वो अपने आप गए। मैंने तो कुछ और ही सोचा था। मैंने सोचा कि बेहोश हो जाएंगे तो हाथ-पैर बांधकर डाल दूंगी और सारे गांव को जगाकर उनकी धुनाई कराऊंगी।

और यह भी सोचा कि गाँव भर में तुम्हारी बहादुरी की चर्चा भी हो जाएगी। लोग कहेंगे कि गोनू झा ही नहीं पंडिताइन भी कम नहीं हैं।

सोचा तो यही था पर हो कुछ और ही गया। शुक्र करो की घोर सर्दी है वर्ण अब तक तो लाशों में से बदबू उठ जाती।

अब समस्या यह है कि लाशों को कैसे ठिकाने लगाएं।

यही तो मेरी तो कुछ समझ नहीं आ रहा है।

हूँ मैं सोचता हूँ कुछ। गोनू झा सोचने लगे।

ढोलकदास एक पाखंडी और क्रोधी लालची साधु था जो गाँव-गाँव घूमता था और भरौरा के जंगलों में एक पुराने मंदिर में रहता था। गोनू झा उसके पास पहुंचे और उसे प्रणाम किया।

क्या है ? वह भुनभुनाया।

महाराज खीर पूड़ी और रायते के साथ हलवे की दावत का कार्यक्रम है। साथ ही पैदा और लड्डू भी हैं। और सौ रुपया दक्षिणा भी है।

कहाँ है इतना सारा माल ? ढोलकदास की आँखे चमक उठी।

मी घर है महाराज। कल ब्रह्म मुहूर्त में मैं अपने घर ब्रह्मा की पूजा कर रहा हूँ जिसमें इतना सारा खाना-पीना बनेगा। एक ही ब्राह्मण को जिमाने की श्रद्धा है इसलिए सोचा कि आपसे ही पूछूं।

इसमें पूछना क्या है ? मैं तैयार हूँ। ढोलकदास जल्दी से बोला।

पर प्रभु कुछ नियम भी तो मानने होंगे।

कैसे नियम ?

ब्रह्म मुहूर्त में स्नान करके गाँव के जागने से पहले आपको इक्कीस बार गायत्री मन्त्र पढ़ना होगा। गुप्त पूजा है। किसी से चर्चा न करें तो आप मेरे घर भोजन के लिए पधारें अन्यथा मैं किसी और से पूछू।

अरे मैं हूँ न! किसी और की क्या आवश्यकता। गायत्री मन्त्र को शुद्ध और सस्वर बोलना सबको नहीं आता। मेरा तो अभ्यास ही यही है।

इसलिए मैं आपके पास आया था।

जय हो! मैं समय पर पहुंच जाऊंगा।

गोनू झा लौट आए और पत्नी की सहायता से एक मुर्दे को दीवार के सहारे खड़ा कर दिया। रात्रि हुई और दोनों सो गए।

रात के तीन बजे ही ढोलकदास ने द्वार खटखटाया।

पंडिताइन तत्काल चूल्हे में आग जलाने बैठ गई। गोनू झा ने दरवाजा खोला और ढोलकदास को अंदर किया।

मई आपके ही प्रतीक्षा कर रहा था। गोनू झा बोले – कोई आपके साथ तो नहीं आया। आपके चेले बहुत हैं।

कोई नहीं आया सब सोते रह गए। चेलों का क्या करना है।

गोनू झा उसे कमरे में बिछे आसान पर लाए।

अरे महराज यह दूसरा कौन है ?

किसे ले आए आप ?

कहाँ ? कौन ? ढोलकदास घबराए।

वह खड़ा कोने में। मेरी पूजा का नाश हुआ जाता है।

ढोलकदास ने अपनी लाठी उठाई और क्रोध में भरकर कोने में खड़े आदमी पर दे मारी। आदमी गिर पड़ा। दुष्ट इतनी सावधानी पर भी पीछे आ मरा।

महाराज मर ही गया लगता है। गोनू झा ने भयभीत होकर कहा।

मर गया ? ऐं! ढोलकदास ने नब्ज टटोली तो सन्न रह गए।

यह क्या अनर्थ कर दिया महाराज। गोनू झा रुआंसे हो गए – मेरी पूजा में तो विघ्न हुआ ही अपने लिए फांसी की व्यवस्था कर ली।

फांसी ? मुझे….. मुझे बचाओ गोनू झा। ढोलकदास आर्तनाद कर उठे।

अभी गाँव सो रहा है। इसे उठाकर नदी में फेंक आइए।

तुम किसी से न कहना।

राम-राम! मैं ऐसा आदमी हूँ ?

तुम बहुत भले आदमी हो। ढोलकदास ने लाश कंधे पर उठाई और चले गए। गोनू झा ने दूसरी लाश को खड़ा कर दिया। ढोलकदास लौटे।

अब जल्दी पूजा और भोजन का कार्यक्रम शुरू करो।

पर आपके तो सारे चेले ही यहाँ आ गए लगते हैं। फिर उसी कोने में कोई खड़ा है। महाराज आपके तो बुलाना भी व्यर्थ रहा।

ढोलकदास ने कोने में देखा खड़ा तो था कोई। क्रोध में भर उठे। फिर मार गिराया और कंधे पर लादकर चलते बने। अब उनकी बुद्धि ठिकाने रहती। दिन निकलते-निकलते चरों लाश नदी में फेंक आए और हांफते-हांफते बैठ गए। महाराज पूजा का समय तो निकल गया। अब तो किसी और दिन शुभ मुहूर्त देखेंगे। भोजन तैयार है कीजिये। गोनू झा बोले।

लाओ दक्षिणा भी गई हाथ से। ढोलकदास भन्नाया।

भोजन परोसा गया। .दाल चावल और गुड़।

पूजा ही नहीं हो रही तो पकवान कैसे बनते। गोनू झा ने स्पष्ट किया।

ढोलकदास ने मरे मन से खाना खाया। जाते वक्त गोनू झा ने उनकी शानदार दावत छीनी थी। उन्हें तो खैर सजा मिल गई। शुक्र तो गोनू झा का जिन्होंने उसे निश्चित फांसी से बचा लिया। गोनू झा और उनकी पत्नी ने चैन की साँस ली।

एक बड़े संकट से पीछा छूट गया था। पति-पत्नी दोनों मुस्करा उठे थे।

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