चमत्कारी जल

एक बार तेनालीराम के पड़ोस में रहने वाली एक महिला उससे मिलने आयी।

उसने बताया कि उसकी सास उसे बहुत तंग करती है।

लगभग रोज ही दोनों के बीच कहासुनी होती है। इस कारण उनके घर की शांति भांग हो चुकी है।

वह तेनाली राम से इस मुसीबत से बाहर निकलने का कोई सरल उपाय जानना चाहती थी।

तेनालीराम ने उस महिला की सारी बातें ध्यान से सुनी। फिर वह उठ कर भीतर गया और उसे पानी से भरी एक बोतल लाकर देते हुए बोला इस बोतल में चमत्कारी जल भरा है।

जब भी तुम्हारी सास तुम्हें कुछ कहें तो चुल्लू भर जल अपने मुंह भर लेना और ध्यान रखना कि दो मिनट तक वह जल मुंह में ही रहे न तो उसे पीना और न ही उसे थूकना।

दो मिनट पूरे होने के बाद उस जल को पी लेना। फिर तुम बातचीत कर सकती हो जल्दी ही तुम्हारी सारी तकलीफें दूर हो जायेंगी।

वह महिला तेनाली का शुक्रिया अदा करके और जल की बोतल लेकर ख़ुशी-ख़ुशी अपने घर चली गयी।

अगले हप्ते वह महिला पुनः तेनालीराम से मिलने आयी। इस बार वह काफी खुश लग रही थी।

उसने तेनाली को बताया कि अब उसके घर में अपार शांति है। की दिनों से उसका अपनी सास से बिल्कुल भी झगड़ा नहीं हुआ है।

उसने तेनाली से उस चमत्कारी जल की एक और बोतल देने की प्रार्थना की।

तेनालीराम उठ कर भीतर गया और बोतल और लाकर उस महिला को दे दी। इसी प्रकार एक महीने तक चलता रहा।

वह महिला आ कर तेनालीराम से चमत्कारी जल से भरी नयी बोतल ले जाती।

हर बार वह उस जल की प्रशंसा करती और तेनाली का धन्यवाद करती। चार हप्ते बीतने के बाद जब वह महिला पांचवी बोतल लेने आयी तो तेनालीराम ने कहा अब तुम्हें हर हप्ते यहां आकर जल की बोतल लेने की कोई आवश्यकता नहीं है।

अब से तुम इस बोतल को अपने ही घर में कुँए से भर सकती हो। महिला को कुछ समझ नहीं आया।

वह आश्चर्यचकित होकर तेनाली का मुहं ताकने लगी। तब तेनाली ने महिला को समझाया उस बोतल के जल में चमत्कार नहीं था चमत्कार हुआ है तुम्हारे चुप रहने से। मुँह में भरे जल के कारण तुम अपनी सास को शीघ्र ही पलट कर करारा जवाब

देने में असमर्थ थी। जब तक तुम वह जल पीकर बोलने लायक होती तब तक वह पल बीत चूका होता और तुम्हारी और तुम्हारी सास दोनों का गुस्सा ठण्डा हो चूका होता।

यही कारण है कि अब तुम्हारे घर में सुख-शांति का वास है।

अब वह महिला अपनी भूल समझ चुकी थी। उसने तेनाली का शुक्रिया अदा किया और चुपचाप अपने घर चली गयी।

उस दिन के बाद उस महिला के घर से कभी लड़ाई-झगड़े की आवाज नहीं आयी। वह संयम का अर्थ समझ चुकी थी।

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