मुकाबले की भावना

तिलक के सभी साथियों के पास अपनी-अपनी साईकिल थी ।

वे अकसर किसी न किसी मित्र के साईकिल के पिछले हिस्से पर बैठकर धूम मचाते हुए स्कूल जाते ।

उन का रोज का यही क्रम था । तिलक सदा विजय के पीछे बैठा करता था ।

एक दिन विजय ने मजाक में उसे से कहा देखो तिलक आज मेरे साईकिल में हवा नहीं है इसलिए तुम पैदल ही आ जाना ।

यह कहकर वह आगे बढ़ गया ।

तभी तिलक ने देखा कि विजय की साईकिल के पहियों में पूरी हवा थी ।

उसे बड़ा गुस्सा आया । वह सोचने लगा शायद विजय को अपने पास साईकिल होने का घमंड हो गया है ।

थोड़ी दूर जा कर तिलक ने देखा की विजय साईकिल रोके खड़ा है ।

यह देख तिलक रुका नहीं । वह उस के पास से होता हुआ गुजरा तो विजय ने पीछे से आवाज दी अरे तिलक ठहरो तो ।

तुम तो पैदल ही जा रहे हो । मैंने तो मजाक किया था । आओ बैठो मेरे पीछे ।

तिलक नहीं रुका । वह गुस्से में जो था ।

उस दिन वह पैदल ही स्कूल गया ।

शाम को घर आते ही उसने अपने पापा से कहा पापा मुझे भी साइकिल ला दीजिये । मेरे सभी साथी अपनी-अपनी साईकिल पर स्कूल जाते हैं ।

चारपांच दिनों के बाद तिलक के पाप ने उसे नई साईकिल ला दी ।

अब तिलक और विजय दोनों अकेले-सकेले अपनी-अपनी साईकिल पर स्कूल जाने लगे ।

तिलक के मन में अब भी विजय के लिए गुस्सा था इसलिए वह विजय को नीचा दिखाने के चक्कर में रहने लगा ।

एक दिन तिलक ने मन ही मन यह फैसला कर लिया कि उसे अपनी साईकिल सदा विजय से आगे रखनी चाहिए ।

दोतीन दिन बाद विजय भी उस की इच्छा को भांप गया ।

अब जब यह टोली स्कूल जाती तो तिलक और विजय में होड़ सी लगी जाती ।

दोनों ही अपनी साईकिल एक दूसरे से आगे निकालने की कोशिश में रहते ।

कभी तिलक आगे निकल जाता तो कभी विजय । कुछ दिनों तक इसी तरह चलता रहा ।

एक दिन सभी मित्र स्कूल से घर आ रहे थे । वर्ष के कारण सड़क पर काफी फिसलन थी । जब वे सड़क का मोड़ मुड़ने लगे तो विजय से आगे रहने की कोशिश में तिलक की साईकिल का पहिया फिसल गया और वह धड़ाम से एक और गिर गया ।

तिलक को गिरते देख कर सभी मित्र रुक गए ।

विजय ने भी अपनी साईकिल रोकी । उस ने आगे बढ़ कर तुरंत तिलक को उठा लिया । उसे अधिक चोट तो नहीं आई थी फिर भी कुछ जगह से खाल छिल गई थी ।

यह देखकर विजय ने कहा यह सब हमारी मुकाबले की भावना के कारण ही हुआ है ।

यदि हम दोनों में एक दूसरे से आगे रहने की होड़ नहीं होती तो तुम्हें यह चोट नहीं लगती ।

आज के बाद सदा तुम ही आगे रहना । मैं तुम्हारे पीछे ही रहा करूँगा ।

विजय की बात सुनकर तिलक का मन पसीज गया ।

शर्मिंदा हो कर उस ने कहा नहीं विजय गलती तो मेरी ही थी ।

मेरे मन में ही यह भावना आई थी कि मैं सदा तुम से आगे रह कर तुम्हें नीचा दिखाऊं ।

मैं यह भूल गया था कि सड़क पर मुकाबले की भावना रख कर साईकिल नहीं चलानी चाहिए ।

अब मेरी आँखे खुल गई हैं । मुझे माफ कर दो ।

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