सती

बुंदेलखंड की पहाड़ी पर सती चिंतादेवी का मंदिर है ।

दो शताब्दियोंसे मंगलवार के दिन हजारों स्त्री-पुरुष यहाँ मेला लगाते हैं ।

सती कीपूजा करते हैं ।

कालपी की इस वीर सती की बड़ी दारुण कहानी है ।

वहकेवल तेरह साल की बालिका थी जब उसके माँ-बाप उसे बीहड़पहाड़ियों में अकेला छोड़ गए थे ।

पर इस वीर बालिका ने अपने वीर पिता के मार्ग पर ही चलते हुए शत्रुओं से युद्ध करना ही अपनाजीवन-लक्ष्य बना लिया ।

वह आजन्म कुँवारी रहने की ही ठाने हुएथी किन्तु एक वीर योद्धा रत्नसिंह की कर्त्तव्य-निष्ठा प्रेम औरश्रद्धा से वह प्रभावित हो गई ।

रत्नसिंह ने एक रात अपनी जान परखेलकर शत्रु के षड्यंत्रपूर्ण आक्रमण से उसकी रक्षा की ।

इस कांडमें घायल हुए रत्नसिंह के गले में चिंता ने भाव-विह्वल और प्रेम-विभोरहोकर जयमाल डाल दी ! वह रत्नसिंह से अथाह प्रेम करने लगी |

रत्नसिंह भी उसके रूपाकर्षण और प्रेम में डूब गया ।

हजारों की संख्या में मराठा सेना कालपी हथियाने के लिए जुटआई ।

संकट की इस घड़ी में रत्नसिंह ने रात के अंधेरे में ही मराठोंपर छापा-मार युद्ध का विचार किया ।

वह अपने गिने-चुने योद्धाओंको साथ लेकर मोर्चे पर पहुँचा ।

योद्धा अंधाधुंध जूझ पड़े । शत्रु सेनाअपार थी ।

इधर बुंदेला योद्धाओं ने देखा कि उनके नायक रत्नसिंहका कहीं कोई पता नहीं ।

योद्धा उसके आदेश-निर्देश की प्रतीक्षा हीकरते रहे आखिर नेतृत्व के अभाव में सब-के-सब कट मरे-एकभी नबचा।

चिंता को खबर मिली कि सब खत्म हो गया !

अब मराठेसरदार यहाँ पहुँचकर दुर्ग पर कब्जा करने वाले हैं और रत्नसिंह काकहीं पता नहीं ।

चिंतादेवी ने सती होने के लिए अपनी चिता चिनवाई ।

वहचिता में प्रवेश करके आग की लपटों से लिपट गई ।

इतने में आवाजआई- प्रिये निकलो मैं तो जिंदा हूँ सती क्यों हो रही हो ?’

चिंताने मुँह फेर लिया।

वह समझ चुकी थी कि यह रत्नसिंह मुझनव-विवाहिता के मोह में पड़कर चुपचाप युद्ध से खिसक कर लौटाहै ! रत्नसिंह ने फिर पुकारा-‘ मैं तुम्हारा रत्नसिंह ही हूँ प्रिये क्यातुम मुझे पहचानती नहीं ?’

खूब पहचानती हूँ ! तुम मेरे रत्नसिंह नहीं मेरा रत्नसिंह सच्चाशूर था ।

वह आत्मरक्षा के लिए इस तुच्छ देह को बचाने के लिएअपने क्षत्रिय धर्म का यों परित्याग न कर सकता था ।

वह रणक्षेत्रसे भाग आने वाला कायर नहीं था ।

‘ और इस कथन के साथ ही उसपरम सती की चिता धू-धूकर जल उठी !

आत्मग्लानि और शोक सेठंडी साँसें भरते हुए रत्नसिंह भी सबके देखते धधकती चिता में कूदपड़ा ।

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